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ऐसे कैसे खेलेगा इंडिया- कैसे बढ़ेंगी बेटियां?:चंडीगढ़ की रितु ने नेशनल लेवल पर बॉक्सिंग में जीता मेडल, स्टेट लेवल पर भी किए कई मेडल अपने नाम, अब काटती है पार्किंग की पर्चियां

चंडीगढ़4 महीने पहले
चंडीगढ़ की रितु का कहना है कि किस्मत उसे इस मोड़ पर ले आई।

इस वक्त टोक्यो ओलिंपिक्स का खुमार सभी के सिर चढ़ कर बोल रहा है। देश की बेटियां पदक लेकर अपना और देश का नाम ऊंचा कर रही हैं और सरकारें भी उनके लिए इनाम घोषित कर रही हैं। वहीं इन सब के बीच एक ऐसी बेटी भी है जो बॉक्सिंग,रेसलिंग और वॉलीबॉल में नेशनल और स्टेट तक खेल चुकी है। लेकिन अब कड़कती धूप और बारिश में पार्किंग की पर्चियां काटने पर मजबूर है। किस्मत साथ देती तो शायद वो भी इस वक्त ओलिंपिक खेल रही होती।

परिवार की मजबूरियों के आगे उसने अपने शौक, अपनी इच्छाएं खत्म कर दीं। लेकिन आज भी उसकी उम्मीदें बरकरार है। सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें,वीडियो और कहानी वायरल होने के बाद उसकी आस जगी है कि शायद उसे कोई प्रमोट करने के लिए आगे आएगा और वह अपने सपने पूरे कर सकेगी। 23 साल की रितु के परिवार में उसके अलावा मां बाप, बड़ा भाई जो एक हॉस्पिटल में कुक और दो छोटे भाई हैं जिन्होंने हाल ही में 12वीं की पढ़ाई पूरी की है।

नेशनल लेवल पर खेली बॉक्सिंग के सर्टिफिकेट दिखाती रितु।
नेशनल लेवल पर खेली बॉक्सिंग के सर्टिफिकेट दिखाती रितु।

चंडीगढ़ के धनास निवासी रितु ने अपने खेल की शुरुआत 10 साल की उम्र में सेक्टर-35 मॉडल से की और फिर सेक्टर-20 मॉडल में इसे आगे बढ़ाया। साल 2014 से लेकर 2017 तक उसने तीनों सपोर्ट में कई टूर्नामेंट भी खेले। 2017 में 60-62 वेट कैटागरी में तेलंगना में नेशनल स्कूल गेम्स में बॉक्सिंग में ब्रॉन्ज मेडल जीता।

वॉलीबॉल में भी नेशनल खेली और रेसलिंग में नेशनल खेलने के बाद सर्टिफिकेट मिला। स्टेट लेवल पर वॉलीबॉल और बॉक्सिंग में 1-1 गोल्ड और 1-1 सिल्वर पदक जीता तो रेसलिंग में 1 गोल्ड मेडल जीता। खेल की दुनिया में और आगे बढ़ने के सपने संजो ही रही थी कि इस बीच पिता बीमार हो गए। वे रिक्शा चलाते थे।

उन्हें शुगर और मोतियाबिंद हो गया जिसके बाद उसे अपनी स्पोर्ट्स और पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। स्पोर्ट्स टीचर परमजीत सिंह के कहने पर 12वीं की पढ़ाई ओपन बोर्ड से की और उसके बाद छोटा-मोटा काम करने लगीं। पिछले एक साल से वह सेक्टर-22 की शास्त्री मार्केट में पार्किंग की पर्चियां काट रही हैं। वह आर्मी में जाना चाहती है और उसके लिए फॉर्म भी भरा है।

अपने जीते हुए मेडल्स के साथ रितु।
अपने जीते हुए मेडल्स के साथ रितु।

बदतमीजी से भी करते हैं लोग बात

भावुक होते हुए कहती हैं कि मैं मैरीकॉम और खेलो इंडिया खेलो से इंस्पायर्ड थी। हो सकता है कि अब ओलिंपिक्स भी खेल रही होती। लेकिन किस्मत इस मोड़ पर ले आई है कि कभी-कभी लोग भी बदतमीजी से बोलते हैं। तुम कुछ नहीं कहतीं उन्हें‌? ये पूछने पर रितु कहती है- क्या बोलूंगी दीदी? पर बुरा बहुत लगता है। उसे यहां 350 रुपए एक दिन के मिलते हैं और पिता की दवा का खर्च महीने का 10 हजार रुपए है।

परिवार ने तो किया सपोर्ट पर…

रितु को उनके माता-पिता और साथियों ने भी पूरा सपोर्ट किया था लेकिन सरकार द्वारा कोई मदद नहीं मिलने के कारण वह पिछड़ गईं। वह एक बार स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स सेक्टर 42 में भी गई पर उसे कहा गया कि उसकी स्कॉलरशिप की तारीख निकल गई है। रितु का कहना है कि खिलाड़ियों को समय पर स्कॉलरशिप मिलना चाहिए ताकि वह अपनी खेलें कंटीन्यु रख सकें और देश का नाम रोशन कर सकें।बता दें कि अकेली रितु ही नहीं, देशभर में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जो अपने परिवार को पालने के चक्कर में अपने सपने को बीच में छोड़कर ठोकरे खाने को मजबूर हैं।

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