जज्बे को सलाम:10 किमी पैदल सफर तय कर नक्सल प्रभावित गांव पहुंचीं स्वास्थ्यकर्मी, आदिवासियों का किया इलाज

अंबिकापुरएक महीने पहले
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चट्‌टानों को पार कर पहाड़ से नीचे उतरतीं हुई कर्मी। - Dainik Bhaskar
चट्‌टानों को पार कर पहाड़ से नीचे उतरतीं हुई कर्मी।

बलरामपुर जिले के कुसमी ब्लाॅक के नक्सल प्रभावित सबाग ग्राम पंचायत में झलवासा पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवाओं की ऐसी बस्ती है जहां जाने के लिए 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, लेकिन यहां स्वास्थ सुविधाएं पहुंचाने के लिए कलेक्टर कुंदन कुमार के निर्देश पर स्वास्थ्य अमला ढाई घंटे पैदल चलकर पहुंच ही गया।

गांव में लोगों का इलाज कर फिर दूसरे रास्ते से वे दो घंटे पैदल चलकर वापस लौटे। सबाग की स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता हलमी तिर्की और सुचिता सिंह का उत्साह और मेहनत देख कलेक्टर ने उनकी तारीफ की है और कहा कि सभी को इनसे सीख लेकर काम करने की जरूरत है।

बलरामपुर जिले में कलेक्टर कुंदन कुमार ने राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन के तहत 220 ऐसे बसाहटों को चिन्हित किया गया है, जहां राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पहाड़ी कोरवा व पंडो जनजाति के लोग रहते हैं। इन बसाहटों में बारिश से पहले लोगों की स्वास्थ टीम द्वारा जांच व उपचार कराया जा रहा है, उन्हें जरूरी दवा भी उपलब्ध कराई जा रही है।

इसी कड़ी में स्वास्थ्य अमला इस गांव में पहुंचा। स्वास्थकर्मी सुचिता सिंह ने बताया कि वहां जाने के लिए वे दोपहर ढाई बजे निकले और शाम पांच बजे गांव पहुंचें, जहां पहाड़ी कोरवा के 20 परिवार व आठ यादव जाति के लोग रहते हैं। बसाहट में लोगों का स्वास्थ जांच व उपचार के बाद पैदल नदी वाले दूसरे रास्ते से 7 किमी पैदल चलकर वापस आए। जांच व इलाज में पता चला कि यहां तीन पहाड़ी कोरवा महिलाएं गर्भवती हैं, जिन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी किया गया।

पहाड़ी व नदी के बीच बस्ती इसलिए सड़क बनाना मुश्किल: झलवासा गांव में बिजली नहीं है लेकिन सौर ऊर्जा से चलने वाले बल्ब लगें हैं। वहीं आंगनबाड़ी है तो प्राथमिक स्कूल गांव से एक किमी दूर में देवाडांड नामक जगह पर है। बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ ब्लाक के बुद्धूडीह का बचवार गांव भी खाई में हैं, सड़क बनाना मुश्किल है।

पहाड़ी के रास्ते वन्य प्राणियों का रहता है खतरा: सबाग में ड्यूटी कर रहीं हलमी तिर्की कहती हैं कि ड्यूटी तो ड्यूटी है, वे दो बार पहले भी वहां जा चुकी हैं। नियमानुसार वहां एक पुरुष स्वास्थ कार्यकर्त्ता होना चाहिए, लेकिन हलमी व सुचिता दोनों महिला स्वास्थ कार्यकर्त्ता हैं। वे बताती हैं कि वहां जाने में हमेशा जंगल में वन्य प्राणियों का डर बना रहता होता है।

खाई में बसा है गांव, राशन के लिए 10 किमी जाने की मजबूरी
सबाग पंचायत का आश्रित बस्ती झलवासा गांव खाई में बसा हुआ है। यहां के लोग राशन लेने के लिए 10 किमी पैदल चलकर सबाग आते हैं, लेकिन लोगों की आदत हो गई है।

वे राशन लेने खाली हाथ पहाड़ी को चढ़ते हैं और फिर राशन ढोकर नीचे उतरते हैं। वहीं यहां से निकलने का एक रास्ता नदी की तरफ से है। जिस रास्ते से होकर चिटनिया गांव निकलते हैं। हालांकि बरसात के दिनों में नदी में बाढ़ आने से यह रास्ता बंद हो जाता है।

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