छत्तीसगढ़ की ईको फ्रेंडली राखियों की देशभर में डिमांड:यहां बन रही है कपड़े, धान-चावल और रेशों से राखियां, दिल्ली-साउथ इंडिया तक डिमांड

बालोद/जांजगीर-चांपा/रायपुर4 महीने पहले

छत्तीसगढ़ में इस बार ईको फ्रेंडली राखियां बहुत डिमांड में हैं। यहां की राखियों को देशभर में भी लोग पसंद कर रहे हैं। चाहे बालोद में प्राकृतिक रंगों और हैंडलूम कपड़ों से बनाई जा रही राखियां हों या फिर रायपुर में बीज वाली राखियां। फिर चाहे जांजगीर-चांपा में कमल के फूल के डंठल के रेशे, भाजियों, केले और धान-चावल का इस्तेमाल करके बनाई जा रही राखियां हों।

सबसे पहले बात करेंगे बालोद की, जहां के एक छोटे से गांव में बनी राखियों की डिमांड उत्तर से लेकर दक्षिण तक है। जिले के ग्राम हथौद में सब्जियों और अन्य चीजों से प्राकृतिक रंग तैयार कर ये ईको फ्रेंडली राखियां तैयार की जा रही हैं। महिलाओं ने स्थानीय बुनकरों से कपड़े मंगाकर उसमें गोदना और कसीदाकारी कर राखियां तैयार की हैं, जिसकी डिमांड न सिर्फ स्थानीय मार्केट में बल्कि दिल्ली, असम और साउथ इंडिया के राज्यों तक है।

बालोद जिले के ग्राम हथौद में काफी संख्या में बुनकर रहते हैं। हथकरघा उद्योग यहां के सैकड़ों लोगों की आजीविका का साधन है। इसे देखते हुए जिला प्रशासन ने यहां की महिलाओं को गोदना और कसीदाकारी की ट्रेनिंग दिलवाई और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त करने का प्रयास किया।

असम, दिल्ली और दक्षिण भारतीय राज्यों से आई डिमांड

प्रशिक्षण लेने के बाद इन महिलाओं और युवतियों ने राखी का त्योहार देखते हुए कुछ नया करने का सोचा। उन्होंने बुनकरों से कपड़े मंगवाए और इस पर गोदना और कसीदाकारी कर ऐसी राखियां तैयार कीं, जो हाथोंहाथ बिक गईं। इन राखियों की ऑनलाइन बिक्री के लिए इन्हें पोर्टल पर भी अपलोड किया गया, जिसके बाद असम, दिल्ली और साउथ के कई राज्यों से डिमांड आई।

कलेक्टर ने की तारीफ

अब कलेक्टर ने इन महिलाओं के काम की सराहना करते हुए इसे गर्व का विषय बताया है। कलेक्टर गौरव कुमार सिंह ने कहा कि ऐसी परियोजनाओं के माध्यम से शासन-प्रशासन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। जो महिलाएं सिर्फ चूल्हे-चौके तक सिमटी हुई हैं, उनके अंदर की प्रतिभा को निखारकर उन्हें आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाया जाता है।

राखियों की कीमत 90 रुपए

इन राखियों की कीमत करीब 90 रुपए है, क्योंकि इसमें शुद्ध कपड़ों और नेचुरल कलर का इस्तेमाल कर बनाया गया है। ये राखियां गौठानों के माध्यम से तैयार की जा रही हैं।

लाभ में महिलाएं

डिजाइनर सुरभि गुप्ता ने बताया कि यहां पर कुल 60 महिलाएं प्रशिक्षण ले रही हैं और 20 महिलाओं की इस काम में हिस्सेदारी है। इस तरह कुल 80 महिलाएं इस काम में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पहले यहां पर कुछ स्थानीय बुनकरों से कपड़े मंगाए गए और एक सैंपल बनाया गया। फिर उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित किया गया। जिसके बाद इनकी काफी डिमांड आने लगी। अभी तक सभी राखियां बिक चुकी हैं और महिलाएं प्रॉफिट कमा रही हैं।

अनार के छिलकों, गेंदे के फूल समेत इन चीजों का इस्तेमाल

महिलाएं और युवतियां जो राखियां तैयार कर रही हैं, उसमें वे वेजिटेबल कलर का इस्तेमाल कर रही हैं। ये राखियां पूरी तरह से ईको फ्रेंडली हैं। इसमें किसी भी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। राखियों को बनाने के लिए अनार के छिलके, गेंदे के फूल, लोहे और गुड़ के मिश्रण, गोंद, चायपत्ती, हिना, कत्था का प्रयोग किया जा रहा है, जो सप्तरंगी छटा बिखेरते हैं। इन्हें इस तरह से लगाया जाता है कि ये पक्के रंग में तब्दील हो जाए।

गेंदे के फूल से पीला रंग बनाया जाता है। गुड़ और लोहे को मिलाकर काला रंग बनता है, मेहंदी से हरा रंग मिलता है। इस तरह से प्राकृतिक रंग बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल राखियों को बनाने में किया जाता है। राखियां काफी रंग-बिरंगी हैं और प्रिंटिंग भी खूबसूरत है, जो लोगों को तुरंत लुभा लेती हैं।

पार्सल के माध्यम से भेजी जा रही हैं राखियां

इस छोटे से गांव के लिए सबसे बड़ी बात तो ये है कि पोस्ट ऑफिस नहीं होते हुए भी ऑनलाइन सामग्रियां पार्सल के माध्यम से नई दिल्ली, असम और साउथ इंडिया के कई राज्यों में भेजा जा रहा है।

गांव में बारहों महीने मिलते हैं हैंडलूम कपड़े

इस गांव में हैंडलूम कपड़े बनाए जाते हैं। सामान्यतः यह कपड़े प्लेन होते हैं, लेकिन अब यहां पर महिलाओं को जिस तरह से प्रशिक्षण दिया जा रहा है, वे इन कपड़ों पर रंग-बिरंगी प्रिंटिंग, गोदना और कसीदाकारी कर रही हैं। जिससे इन कपड़ों की वैल्यू बढ़ गई है और ये बेहद पसंद भी किए जा रहे हैं। यहां आपको हाथों से बने और प्राकृतिक रंगों से सजे कपड़े बारहों महीने मिल जाएंगे।

महिलाओं की रुचि लाजवाब

प्रिंटिंग और गोदना का प्रशिक्षण दे रहे मदन मोहन चौधरी ने बताया कि यहां की महिलाएं और लड़कियां काफी एक्टिव हैं। उन्होंने कम समय में नेचुरल कलर बनाना, उसे कपड़ों पर पहुंचाना और इनसे तरह-तरह के सामान बनाना सीख लिया है।

जांजगीर-चांपा में भी बनाई जा रही ईको फ्रेंडली राखियां

जांजगीर-चांपा जिले में बिहान समूह से जुड़ी महिलाओं के द्वारा कमल के फूल के डंठल के रेशे से राखियां तैयार की जा रही हैं। इसके अलावा केले के तने के रेशे, अलसी, भिंडी और भाजियों के रेशे से भी राखियां तैयार की जा रही हैं, जिनकी भारी डिमांड है। इस बार 11 अगस्त को राखी का त्योहार मनाया जाएगा।

रेशमी धागों, मोती, रूद्राक्ष और रंगीन पत्थर का भी इस्तेमाल

जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा और बम्हनीडीह ब्लॉक में अलग-अलग ग्राम पंचायत में समूह की महिलाएं रेशम के धागों, छोटे-बड़े मोती, चावल के दाने, अलग-अलग रंगीन कपड़े, छोटे-छोटे रूद्राक्ष, रंगीन पत्थर को मार्केट से खरीदकर घर में उसे तैयार कर बाजार में बेच रही हैं, इससे उन्हें भारी मुनाफा मिल रहा है।

इन राखियों को बेचने के लिए जनपद पंचायत स्तर पर स्टॉल लगवाया जा रहा है। गंगे मैया समूह की अध्यक्ष लक्ष्मीन यादव और सचिव पुष्पा यादव ने इसकी जानकारी दी। इसके अलावा जनपद पंचायत बम्हनीडीह के मां शारदा स्व सहायता समूह परसापाली के द्वारा भी प्राकृतिक उत्पादों का इस्तेमाल कर राखियां बनाई जा रही हैं।

रायपुर में बीजों से बनीं ईको फ्रेंडली राखियां

रायपुर में भी ईको फ्रेंडली राखियां तैयार की जा रही हैं, जो लोगों को खूब पसंद आ रही हैं। जिला प्रशासन इन राखियों को तैयार करने और इनकी बिक्री में महिला स्वसहायता समूह की मदद कर रहा है।

राखी में सब्जियों के बीज

ये राखियां धरसीवां विकासखंड के तहत ग्राम पंचायत सेरीखेड़ी में तैयार की जा रही हैं। इन राखियों की खासियत ये है कि ये बीज से बनाई जा रही हैं। राखियों में धनिया, तोरई, कद्दू, धान, धनिया जैसे बीजों को डाला गया है, जिन्हें लोग अपने गार्डन में उगा सकेंगे।

अपने किचन गार्डन में उगाएं पौधे

भाई इन्हें राखी के दिन पहनने के बाद इनके बीजों को गमले में डाल सकते हैं। बीजों से जो पौधे निकलेंगे, वे भाई-बहन के स्नेह के प्रतीक होंगे और हमेशा इस दिन की याद दिलाएंगे। साथ ही ये राखियां पर्यावरण को बेहतर रखने में अपनी भूमिका निभाएंगी। इन्हें बिहान योजना के आजीविका केन्द्र कल्पतरू मल्टी यूटिलिटी सेंटर में समूह से जुड़ी महिलाएं बना रही हैं।

इन जगहों पर उपलब्ध है राखियां

इनकी कीमत 25 रुपए से शुरू है। रायपुर के सुभाष स्टेडियम स्थित सी मार्ट में यह राखियां उपलब्ध हो रही हैं। यहां आम लोग जाकर इन्हें खरीद सकते हैं। इसके अलावा रायपुर के मैग्नेटो मॉल स्थित बिहान सेंटर में भी इन राखियों को डिस्प्ले किया गया है।