बस्तर में गोंचा महापर्व का जश्न:तुपकी से सलामी देकर 615 साल पुरानी परंपरा निभाई गई, राजा ने चांदी की झाड़ू से रस्म अदा की

जगदलपुर5 महीने पहले
रथ खींचते भक्त।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में शुक्रवार को भगवान जगन्नाथ की भव्य रूप से रथ यात्रा निकाली गई। साल की लकड़ी से बने 20 फीट लंबे और 14 फीट चौड़े अलग-अलग तीन रथों में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र सवार होकर नगर की परिक्रमा पर निकले। वहीं बस्तर वासियों ने रथ को बांस से बनी तुपकी से सलामी देकर 615 साल से चली आ रही परंपरा निभाई। बस्तर के राजा कमलचंद्र भंजदेव और 360 घर आरण्यक ब्राम्हण समाज ने पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की। राजा ने चांदी के झाड़ू से छेरा पोरा की रस्म अदा की। इसे पूरे विधान को ही गोंचा पर्व कहा जाता है।

बस्तर में धूमधाम से गोंचा पर्व मनाया गया।
बस्तर में धूमधाम से गोंचा पर्व मनाया गया।

बस्तर के राजा ने कहा कि, सन 1400 में महाराज पुरुषोत्तम देव पैदल जगन्नाथ पुरी गए थे। वहां से प्रभु जगन्नाथ की मूर्तियां लेकर आए थे। जिसे जगदलपुर के जगन्नाथ मंदिर में स्थापित किया गया था। जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर ही यहां रथ यात्रा निकाली जाती है। सालों से चली आ रही परंपरा के अनुसार प्रभु जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभद्र रथारूढ़ हुए। साथ ही राजा और यहां का माटी पुजारी होने के नाते मैंने चांदी के झाड़ू से छेरा पोरा रस्म अदा की। जगन्नाथ पुरी में सोने के झाड़ू से इस रस्म की अदायगी के बाद ही बस्तर में यह रस्म अदा की गई।

रथ यात्रा में हजारों की संख्या में भक्त जुटे।
रथ यात्रा में हजारों की संख्या में भक्त जुटे।

यहां से गुजरा प्रभु का रथ
जगदलपुर के सिरहासर भवन के सामने से रथ यात्रा शुरू की गई। यहां से तीनों रथ की नगर परिक्रमा शुरू कर गोल बाजार होते हुए दंतेश्वरी मंदिर और फिर से सिरहासर भवन तक लाया गया। इस दौरान हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने प्रभु का दर्शन किया। जिन-जिन जगहों से रथ की नगर परिक्रमा करवाई गई वहां पर लोगों ने भव्य रूप से स्वागत किया। पिछले साल रथ यात्रा में कोरोना की वजह से ज्यादा लोग शामिल नहीं हो पाए थे। लेकिन, इस साल दूर-दराज से भी भारी संख्या में भक्त पहुंचे हैं।

बांस की बनी तुपकी, इसी से सलामी दी जाती है।
बांस की बनी तुपकी, इसी से सलामी दी जाती है।

तुपकी से सलामी देने का भी है रिवाज
राजा कमलचंद्र भंजदेव ने बताया कि, रथ को तुपकी से सलामी दी गई है। यह परंपरा भारत देश में केवल बस्तर में ही निभाई जाती है। गोंचा पर्व में तुपकी का भी एक अलग ही महत्व है। गर्मी के बाद जब बारिश का मौसम आता है तो कई तरह की बीमारियां होती है। तुपकी में जिस पेंग का इस्तेमाल किया जाता है वह एक औषधि के रूप में होता है। उसकी महक लाभदायक होती है। पेंग की सब्जियां भी बनाई जाती है।

अलग-अलग तीन रथ निकाले गए थे।
अलग-अलग तीन रथ निकाले गए थे।

यह भी जानिए
बस्तर महाराजा पुरुषोत्तम देव कृष्ण भक्त थे। 1400 में लंबी यात्रा कर वे जगन्नाथ पुरी पहुंचे थे। देवकृपा से उन्हें रथपति की उपाधि देकर 16 पहियों वाला रथ प्रदान किया गया था। उन दिनों बस्तर की सड़कें इतनी अच्छी नहीं थीं कि 16 पहियों वाला रथ सुगमता से खींचा जा सके। इसलिए सुविधा अनुसार 16 पहिये वाले रथ को तीन हिस्सों में बांट दिया गया था। चार पहिया वाला पहला रथ गोंचा के अवसर पर खींचा जाता है। वहीं चार पहियों वाला दूसरा रथ बस्तर दशहरा में फूल रथ के नाम से 6 दिनों तक खींचा जाता है। 8 पहियों वाला तीसरा रथ भीतर तथा बाहर रैनी के दिन खींचा जाता है।