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  • Instead Of Burning An Effigy Here, 7 Times, Dussehra Is Celebrated After Bursting A Pot Full Of Water By Dropping Fire On The Idol Of Ravana Made Of Concrete.

दशहरा पर्व विशेष:यहां पुतला जलाने के बजाय 7 बार कांक्रीट से बनी रावण की मूर्ति पर अग्निबाण छोड़ पानी से भरा मटका फोड़ने के बाद मनाते हैं दशहरा

बालाेद2 महीने पहले
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1947 में नेवारी कला में बनी है कांक्रीट के रावण की यह मूर्ति - Dainik Bhaskar
1947 में नेवारी कला में बनी है कांक्रीट के रावण की यह मूर्ति
  • 1937 से रामलीला की शुरुआत इसी नेवारीकला गांव से हुई, इस बार दो दिवसीय रामलीला, 16 को मनेगा पर्व

जिला मुख्यालय से 12.5 किमी दूर बालोद-दुर्ग मुख्य मार्ग पर स्थित ग्राम नेवारी कला में इस बार का दशहरा खास रहेगा। 15 व 16 अक्टूबर को दो दिवसीय रामलीला होगी। वहीं बरसों पुरानी परंपरा को निभाएंगे। यहां पुतला जलाने के बजाय सात बार अग्नि बाण छोड़कर पानी से भरे मटके को फोड़कर दशहरा मनाने का रिवाज है।

1947 से बने सीमेंट (कांक्रीट) के रावण की पूजा होती है। पर्यावरण प्रदूषण को रोकने व अन्य कारणों से आजादी के बाद चंदे के पैसे से ग्रामीणों ने मूर्तिकार से रावण की मूर्ति बनवाई है। तांदुला नदी के किनारे बसे नेवारी कला में रामलीला की शुरुआत आजादी के पहले अंग्रेज शासनकाल में 1937 में हुई थी। जिले में यहां की पहचान रामलीला और सीमेंट से बने रावण की मूर्ति से होती है। जो दोनों एक-दूसरे के पूरक है। रावण की नाभि का अमृत मानकर फोड़ते है मटका: गांव के हेमराज सोनकर माली ने बताया कि रावण की नाभि में जो अमृत रहता है, उसको भगवान राम पहले अग्नि बाण छोड़कर सुखाते है फिर वध करते है।

इसी तर्ज पर यहां भी मूर्ति के साइड में पानी से भरे मटका को रखते है। रावण के नाभि का अमृत मानकर 7 बार अग्नि बाण मूर्ति में छोड़कर, मटका को फोड़ते है। जिसके बाद पानी जो फर्श में बिखरा रहता है, उसको परंपरा के अनुसार कई लोग पीते भी है। तब माना जाता है कि रावण दहन हो गया। अधिकांश गांवों में पुतला दहन आग जलने के बाद माना जाता है, लेकिन यहां का रिवाज विपरित है। एक-दो साल को छोड़ दे तो अधिकांश साल रामलीला का मंचन होता आ रहा है। एलेंद्र यादव, तुकाराम सोनकर ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के अलावा बुजुर्गो ने यहां मूर्ति स्थापित इसलिए किया है क्योंकि रामलीला सहित अन्य जानकारी नई पीढ़ी के लोग भी जान सकें।

योगीराज ने बुजुर्ग होने तक यह परंपरा निभाई
गांव के दाऊ योगीराज यादव (84) ने बचपन से लेकर बुजुर्ग होने तक यहां की परंपरा निभाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टीम बना सभी को जिम्मेदारी दी। उन्होंने बताया कि अब ज्यादा चल नहीं पाते तो युवा वर्ग जिम्मेदारी संभाले है, परंपरा को बरकरार रखें है। एकादशी के दिन दशहरा मनाते है। रामलीला समिति बनी है। जिसके अध्यक्ष गोपेंद्र यादव, उपाध्यक्ष झुमुक साहू, संगीत पक्ष प्रमुख हेमंत साहू, रमेंद्र साहू, संचालक एलेंद्र यादव, हेमराज माली हैं।

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