कुम्हड़ा लुढ़काने के साथ दोहा बोलते थिरके यदुवंशी:मातर उत्सव; जिले के 40 से ज्यादा गांवों के गौठान में दिवाली के दौरान खुड़हर और पशुधन की हुई पूजा

बालोदएक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
शनिवार को भेड़िया नवागांव में कुम्हड़ा लुढ़काने की परंपरा हुई। - Dainik Bhaskar
शनिवार को भेड़िया नवागांव में कुम्हड़ा लुढ़काने की परंपरा हुई।

दीपावली पर्व मनाने के बाद शनिवार को ग्राम भेड़िया नवागांव, कोड़ेवा, परसवानी, खपरी, लाटाबोड़, पसौद, परसतराई, कांदुल सहित जिले के लगभग 40 गांवों में मातर उत्सव मनाया गया। सभी गांव में बरसों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन किया गया। गांवों में दोहा पारते हुए वाद्य यंत्रों की धुन में थिरकते राऊत समाज के लोगों ने मातर उत्सव में नई उमंग, उत्साह भरने का काम किया।

दोपहर में गांव के प्रमुख गलियों से होते हुए यादव समाज के लोग नाचते हुए गौठान में मवेशियों के माध्यम से रस्म निभाकर कुम्हड़ा फोड़ते नजर आए। इसे छत्तीसगढ़ी में कुम्हड़ा ढुलाना के नाम से जाना जाता है। सभी गांवों में लोगों की भीड़ में छत्तीसगढ़ी परंपरा दिखी। हर साल भाईदूज के साथ मातर उत्सव के मौके में लोग रिश्तेदार के घर पहुंचते है। साहड़ा देव की पूजा अर्चना की गई।

ग्वाले अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सजे थे
इस दौरान समाज के प्रमुख दोहे पारते रहे कि पूजा परे पुजेरी के, धोवा चाउंर चढ़ाई रे, पूजा होवत है मोर सहाड़ा देव के अरा ररा भाई रे....... अधिकांश गांवों में लोगों की भीड़ में ग्वाले पारंपरिक अपने वेशभूषा में सजे थे। बांहों में बांहकर, पेटी, कौड़ी से बने साजू, रंगबिरंगी पगड़ी उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। हाथों में फुलेता (फूलों से सजी लाठियां) लिए हुए थे और पांव में घुंघरू बज रहे थे। गौठान में इष्टदेव की पूजा अर्चना के बाद लाठी लेकर सभी ग्वाले दोहा पारते हुए नाचते, झूमते रहे।

डांड़ खेल को देखने ग्रामीणों में उत्सुकता
सुबह से देर शाम तक गांवों में भाईदूज के साथ ही मातर उत्सव को लेकर लोगों में उत्साह दिखा। छत्तीसगढ़ी परंपरा अनुसार गांवों में ग्वालों ने गांव के गौठान में खुड़हर की पूजा की और पशुधन को सोहाई बांधी गई। रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। इसके पहले गौठान में कुम्हड़ा, लौकी को पशुओं के पैर से लुढ़काया गया। पशुओं के डांड़ खेल को देखने ग्रामीणों में उत्सुकता रही। गौठान में खुड़हर देव, सांहड़ा देव, पशुधन और सोहाई की पूजा अर्चना की गई। गौठान में पूजा अर्चना व डांड़ का खेल दोपहर तक चला।

महाशिवरात्रि तक चलेगा मंडई का सिलसिला
दिवाली के दूसरे दिन से गांवों में मातर उत्सव के साथ मंडई मनाने का सिलसिला शुरु हो जाता है।गांवो में मातर, मेला मंडाई छत्तीसगढ़ की संस्कृति है। यहां सुरहोती (दीपावली) के बाद आने वाली द्वितीया तिथि को मातर का पर्व मनाते है। मातर पर्व में मड़ई जगाने का कार्य भी होता है। साथ ही यहां मड़ई-मेला का एक लंबा दौर शुरू हो जाता है, जो महाशिवरात्रि तक चलता है। मातर को मिनी मड़ई भी कहा जाता है।

खबरें और भी हैं...