दिखाई एकजुटता:मिट्टी से बने गौरा-गौरी की पूजा-अर्चना कर निकाली शोभायात्रा, तालाब में किया विसर्जन

बालोद25 दिन पहले
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  • एक साल बाद कोरोना के केस सिर्फ 4 इसलिए उत्साह के साथ लोगों ने मनाई दिवाली

एक साल बाद इस बार दीपावली में कोरोना का साया नहीं रहा। जिले में सिर्फ 4 केस एक्टिव थे। जिला प्रशासन की ओर से बंदिश नहीं थी इसलिए दीप पर्व पर गांवों में उत्साह दिखा। बरसों से जारी परंपरा बरकरार रही। साथ ही इस दौरान कई गांवों में जागरूकता भी दिखी।

बालोद शहर के अधिकतर वार्डाें के अलावा ब्लॉक के ग्राम मेड़की, बघमरा, ओरमा, खरथुली, भोथली, जगन्नाथपुर, सांकरा, जुंगेरा, घुमका, कोहंगाटोला, सोहतरा, नेवारीकला, परसदा, झलमला, मालीघोरी, लाटाबोड़ सहित अधिकांश गांवों में गौरी-गौरा की पूजा अर्चना कर शुक्रवार को शोभायात्रा निकाली गई। कुंवारे लड़के व कुंवारी लड़कियां सिर पर कलश रखकर मोहल्ले-गांव का भ्रमण किया। इस दौरान कई लोग झूमते नजर भी आए। पिछले साल मेड़की सहित अधिकांश गांवों में घर-घर प्रसाद बांटने पर रोक लगी थी।

साथ ही गोवर्धन पूजा के बाद शाम को एक-दूसरे पर तिलक भी नहीं लगाया गया था। लेकिन इस बार लोगों ने परंपरा निभाई। इसके पहले लक्ष्मी पूजा के बाद जनसहयोग से गौरी गौरा की मूर्ति बनाने से लेकर विसर्जन का सिलसिला जारी रहा। शहर सहित गांवों में उत्साह का माहौल रहा। दफड़ा मोहरी बाजे के साथ बारात और शोभायात्रा निकाली गई। गौरी-गौरा की पूजा, शोभायात्रा व तालाब में विसर्जन के बाद गोवर्धन पूजा, मवेशियों को खिचड़ी, रोटी खिलाने की रस्म निभाई गई।

आदिवासी समाज के लोगों ने मूर्तियां बनाई
आदिवासी समाज के प्रमुखों ने तालाब के समीप की कुवांरी मिट्टी से गौरी-गौरा की मूर्तियां तैयार की। इसके बाद गौरा की बारात निकाली। इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक गौरी-गौरा गीत गाकर पूरे माहौल को भक्तिमय बनाया। गाैरा को राजा और गौरी को रानी मानकर ग्रामीण उनके स्वागत के लिए पहले से तैयार रहते हैं।

डांग के साथ गली भ्रमण कर थिरकते रहे लोग
शुक्रवार को गांवों में लोगों ने गौमाता को नहलाकर दोपहर में पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना कर खिचड़ी खिलाई। घर में ही गोबर का एक गोला बनाकर गाय के पैर से उसका स्पर्श कराया गया। इसके बाद आरती उतारकर पूजा-अर्चना की गई। फिर खिचड़ी, भात खिलाया गया। दोपहर से शाम तक यादव समाज के लोगों व ग्रामीणों ने डांग, डोरी निकालकर गली भ्रमण कर गौठान में गोवर्धन पूजा की। इसके बाद गोबर का तिलक लगाकर बड़ों का आशीर्वाद लेकर सुख, शांति, समृद्धि की कामना की गई।

जात-पात का भेदभाव मिटाकर किया सहयोग
आदिवासी समाज के दुलार नेताम, मूलचंद ठाकुर, पुनऊ, पूर्व सरपंच अमरसिंह, झगरू, सुखराम, बैगा नन्दकुमार साहू मेड़की ने बताया कि अब जात पात का भेदभाव मिटाकर एक ही समाज ही नहीं बल्कि पूरे गांव के लोग जनसहयोग कर पर्व को उत्साह से मनाते हैं। बरसों से जारी यह परंपरा पिछले साल कोरोनाकाल में भी बरकरार रहा और इस साल भी। गौरी गौरा की मूर्ति बनाने से पहले हर घर में पहुंचे तो लोगों ने इच्छानुसार राशि दान स्वरूप दिए। किसी ने स्वेच्छा से साम्रगी वितरित की। परंपरा अनुसार लगातार 8 रात तक समाज की महिलाओं ने रतजगा करके गौरा काे सुलाया।

उन पर फूल खोंचे। सुरहोती (लक्ष्मी पूजा) उन्हीं गौरा गौरी के साक्षात प्रकट होने का दिन माना जाता है, उनकी परघनी होती है। पर्व के एक दिन पहले पवित्र स्थान से मिट्टी लाई जाती है। गाड़ा बाजा, ढोलक, डमरू, डफली, माेहरी की स्वर लहरियों के साथ मिट्टी गौरा चौरा पर लाकर चौरा की परिक्रमा की की गई। मूर्ति बनाने के दौरान वैसे तो कुम्हार को मूर्तियाें को रंग बिरंगे कागज से सजाने का जिम्मा सौंपा जाता है लेकिन यह काम भी अधिकांश गांवों में आदिवासी समाज के लोग ही करते आ रहे है। इस बार भी ऐसा नजारा दिखा। गौरा गौरी के आसन पर बीच-बीच में धान की बालियां रोपी गई थी।

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