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कोरोना का असर:बिकेगी या नहीं इसकी गारंटी नहीं, इसलिए सिर्फ गणेशजी की छोटी मूर्तियां ही बना रहे

दल्लीराजहराएक महीने पहले
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  • काेराेना के संकट काल में गणेशाेत्सव काे लेकर मूर्तिकाराेें के साथ समितियां भी असमंजस में
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काेराेना संक्रमण के चलते इस साल गणेशाेत्सव काे लेकर मूर्तिकाराेें के साथ समितियां भी असमंजस्य की स्थिति में है। मूर्तिकार भी समय काे देखते हुए छाेटे आकार की गणेश प्रतिमा बना रहे हैं। बड़े गणेश की प्रतिमा बनाने का ऑर्डर नहीं मिला है। कुछ मूर्तिकार इस साल मर्ति बनाने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है कि खरीदार नहीं मिला ताे मेहनत पर पानी फिर जाएगा। कुछ मूर्तिकार जरूर छाेटे आकार का मूर्ति बना रहे हैं। मूर्तिकार भी दुविधा में हैं कि वे मूर्ति बनाए कि नहीं, क्योंकि अभी तक मूर्तिकार के पास गणपति मूर्ति बनाने के लिए ऑर्डर का इंतजार कर रहे हैं और अगर बिना ऑर्डर के यदि मूर्ति बनाते हैं तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।
काेलकाता निवासी युधिष्ठिर पाल व कृष्णा पाल माइंस ऑफिस मार्ग पर 1996 से मूर्तियां बनाते आ रहे हैं, लेकिन इस तरह की परेशानी आज तक कभी भी नहीं आई। पहली बार ऐसा होगा कि उन्हाेंने एक भी मूर्ति नहीं बनाई है। कोरोना वायरस के कारण 4 महीने से घर पर ही बैठे हैं। किसी भी प्रकार का कोई काम नहीं मिला है। हर साल दोनों भाइयों की दुकानों में छोटी बड़ी लगभग 2 से ढाई हजार मूर्तियां काली मिट्टी से बनाकर बेची जाती है। जिसकी कमाई लगभग 20 लाख तक होती है। इसके अलावा विश्वकर्मा, दुर्गा, सरस्वती आदि मूर्तियां तैयार की जाती हैै। मूर्तियों की अधिक ऊंचाई 8 फीट होती है और मध्यम 4 फीट तक बनाई जाती है। बड़ी मूर्ति की कीमत करीबन 4 हजार तक होती है। 
रोजी-रोटी का संकट: घरों में रखने के लिए छोटी मूर्ति जिसकी कीमत 300 से लेकर 500 रुपए तक होती है। यहां से आसपास के भानुप्रतापपुर, कच्चे, डौंडी, महामाया, बिटाल, गोटाटोला, खड़गांव, मानपुर, डौंडीलोहारा तक मूर्तियां ले जाते थे। लेकिन इस साल कोरोना वायरस के कारण रोजी-रोटी की समस्या अा गई है। इस कमाई से लेकर घर लौट कर पूरे साल भर परिवार का भरण पोषण करते हैं। गणेशोत्सव के एक से डेढ़ माह पहले ही तैयारी शुरू हो जाती थी।

हर साल 12 से 13 लाख की मूर्तियाें का कारोबार 
इसके लिए लगभग 2 महीने पहले से तैयारी की जाती है। नगर में लगभग 12 से 13 लाख की मूर्तियां विभिन्न पंडालाें में स्थापित की जाती रही है। इसके अलावा 27 वार्डों मेें कई उत्सव समितियों द्वारा भी मूर्तियों की स्थापना की जाती है। इसके साथ झांकी प्रदर्शनी लगाई जाती है। विसर्जन के समय भारी बड़े शहरों राजनांदगांव, भिलाई, रायपुर से ढोल, धुमाल, शहनाई के माध्यम से भारी उत्साह के साथ रात के समय लाइटिंग व्यवस्था कर विसर्जन किया जाता है।

विश्वकर्मा की मूर्तियों की भी नगर में होती है स्थापना
राजहरा नगरी लौह नगरी होने के कारण यहां पर विश्वकर्मा मूर्तियों की स्थापना अधिक संख्या में होती है। जोकि बीएसपी के लगभग सभी डिपार्टमेेंट एवं भारी वाहन मरम्मत के सभी गैरेज व नगर के सभी लोहा कारोबारियों की दुकानों पर स्थापना की जाती है। मांइस क्षेत्र के बीआर शाॅप, लोको शेड, फायर ब्रिगेड, राजहरा सिविल, दल्ली सिविल, दल्ली एमआर शाॅप, राजहरा क्वारी सहित माइंस के अन्य जगहों पर स्थापित की जाती है।

इस साल मूर्तिकारों के घरों पर सन्नाटा पसरा
इस साल मूर्तिकारों के घरों पर सन्नाटा पसरा है। पहले की तरह इनके पास ऑर्डर ही नहीं आ रहे हैं। समितियों ने तो तैयारी ही शुरू नहीं की है। बड़ी समितियां मूर्तिकारों के संपर्क में रहते थे और अपनी पसंद के अनुसार बड़ी मूर्तियां तैयार करवाते थे। मूर्ति कलाकार युधिष्ठिर ने कहा कि यदि मूर्ति बना दिए और यदि मूर्ति बिकेगी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। जिससे लगाई गई पूंजी की भरपाई नहंीं हो पाएगी। इसलिए जोखिम उठाने बच रहे हैं।

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