जागरूकता शिविर आयोजित:शरीर व मन से कोमल होने के कारण बच्चे होते हैं शोषण के शिकार: जज

दुर्ग12 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजेश श्रीवास्तव के निर्देशन में आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत पैन इंडिया आउटरीच कार्यक्रम के तहत शासकीय स्कूलों में न्यायाधीशों द्वारा विधिक जागरूकता शिविर आयोजित किया। इसमें अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश मधु तिवारी, राकेश वर्मा, नीरू सिंह , ममता भोजवानी ने बताया कि बच्चे शरीर और मन से कोमल होने की वजह से आसानी से शोषण का शिकार हो जाते हैं। इसी वजह से उनकी हिफाजत करने के लिए कानूनों में ढेरों प्रावधान किए गए हैं। उन्होंने छात्राओं को उनके अधिकारों की जानकारी दी।

देश में 6 से 14 साल तक के बच्चे को फ्री शिक्षा देने का
बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार है और इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत प्रावधान है कि 6 साल से 14 साल के बच्चों को शिक्षा अनिवार्य तौर पर दी जाए। एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मां को निर्देश दिया था कि बच्ची को स्कूल से वापस न लें। स्कूल से बच्चों को वापस लेना एक अपराध है।

प्राइवेट स्कूलों को 25 फीसदी सीटें कमजोर तबके के लिए रिजर्व
राइट आफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कंपलसरी एजुकेशन एक्ट 2009 के तहत नियम बच्चों की बेसिक एजुकेशन के लिहाज से बनाया गया है। अगर कोई स्कूल इन नियमों को नहीं मानता तो उसके खिलाफ संबंधित शिक्षा विभाग से शिकायत की जा सकती है। वहां भी सुनाई न होने पर हाई कोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है। इस कानून में कहा गया है कि हर प्राइवेट स्कूल अपनी 25 फीसदी सीटें समाज के कमजोर तबके के बच्चों और विकलांग बच्चों को एडमिशन देने का प्रावधान है। जिसका उल्लंघन नहीं हो सकता।

7 साल सेे कम उम्र के बच्चे पर केस नहीं चलाया जा सकता, प्रावधान
आईपीसी के सेक्शन 82 के तहत अगर बच्चे की उम्र 7 साल काम है तो उस पर किसी अपराध के लिए कहीं भी केस नहीं चलाया जा सकता। आईपीसी के सेक्शन 83 में बताया गया है कि 7 से 12 साल की उम्र तक अपराध होने पर जज यह तय करें कि वह मानसिक रूप से कितना मेच्योर है। अगर जज उनके तो मानसिक तौर पर मेच्योर पाता है तो जज जेजे एक्ट के तहत उस पर कार्रवाई हो सकती है। नाबालिग अगर अपराधी साबित हो जाता है तो जेल न भेजकर अधिकतम 3 साल के लिए सुधार गृह में भेजा जाता है।

खबरें और भी हैं...