जन संकल्प से हारेगा कोरोना:पहले ही मांसपेशियों की शिथिलता की बीमारी से ग्रसित रहा, कोरोना से पूरा परिवार संक्रमित हो गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी, अब सब स्वस्थ

भिलाई6 महीने पहले
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  • गंभीर कोरोना संक्रमण होने के बावजूद अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से कोरोना को हराने वालों की जांबाज कहानियां, पढ़िए आज चौथी कड़ी- ऑक्सीजन लेवल 60 तक पहुंचा, फिर जीत गए कोरोना से जंग

हम शांतिनगर सुपेला में रहते हैं। मेेरी उम्र 58 वर्ष है। घर में सबसे पहले मुझे कोरोना हुआ। मैं मायस्थेनिया ग्रेसिव नामक बीमारी से पहले ही ग्रसित हूं। मांसपेशियों में कभी भी अचानक शिथिलता आ जाती है। शरीर के कुछ हिस्से काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे में कोरोना का संक्रमण। जान बचाना मुश्किल था।

10 अप्रैल को रेपिड टेस्ट निगेटिव रहा और आरटीपीसीआर टेस्ट करवाने के चार दिन तक रिपोर्ट नहीं आई। हालत बिगड़ने लगी। न्यूरो मस्कुर्लर डिस्आर्डर और मायस्थेनिया ग्रेसिव की भी बीमारी है। इसलिए मांसपेशियां काम नहीं कर रही थी। श्वांस लेने में दिक्कतें आने लगी। मैं और पूरा परिवार दहशत में थे। रोजाना किसी न किसी परिचित व करीबी के कोरोना से मौत की खबर आती। हमने देरी करना उचित नहीं समझा। मेरे बेटे शुभंम ने हिम्मत बंधाई। रिपोर्ट का इंतजार करने के बजाय अस्पताल में भर्ती कराने ले गया।

इस बीच बेटे, उसकी मम्मी शीलू देवी और नानी तारादेवी में भी लक्षण आने लगे। तीनों ने घर पर ही होम आइसोलेशन में रहकर कोविड गाइडलाइन का पालन करना तय किया और बाद में स्वस्थ भी हुए, लेकिन मेरी तबीयत बिगड़ते गई। हमें प्राइवेट अस्पताल नहीं मिल रहा था। आखिर में जिला अस्पताल मिला। यहां के डॉक्टरों ने ट्रीटमेंट शुरू किया। वहां भी स्थिति नहीं संभल रही थी, डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। उन्होंने बड़े हॉस्पिटल में भर्ती कराने कहा। हमने उम्मीद नहीं छोड़ी, लगातार एक अस्पताल से दूसरे में बेड का पता करते रहे। अंत में शंकराचार्य मेडिकल कॉलेज में बेड मिला। वहां इलाज शुरू हुआ और उनकी जान बच गई। मैं बीत गए उस समय को कभी नहीं भूल सकता, लेकिन इससे मैने एक बात सीखी, कि कोशिश कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

जब तक जान है तब तक कोशिश जारी रखनी चाहिए। मेरे बेटे ने भिलाई के चार निजी अस्पतालों में बेड की जानकारी ली। जहां कोविड का इलाज होता है। उन्होंने यह कहकर भर्ती नहीं लिया कि कोरोना रिपोर्ट पाजीटिव चाहिए। दो दिन तक घूमते रहे। रिपोर्ट नहीं मिलने से अस्पताल में भर्ती नहीं कर रहे थे, लेकिन संक्रमण को पांच दिन हो चुके थे। ऑक्सीजन लेवल 60 तक पहुंच गया। सरकारी अस्पताल में जैसे-तैसे भर्ती कराया। ऐसे नाजुक हालात को देखते हुए यहां के डॉक्टरों ने मुझे 16 अप्रैल को श्रीशंकराचार्य कोविड हॉस्पिटल में रेफर किया। मेरा पांच दिन तक शंकराचार्य हॉस्पिटल में इलाज हुआ। इलाज के दौरान सीटी स्कोर 20 तक पहुंच गया था। डॉक्टरों ने हमें बताया कि मायस्थेनिया ग्रेसिव बीमारी की वजह से मांसपेशियां शिथिल हो गई है।

जानकारी के बाद भी मैने हौसला नहीं खोया। हमारा परिवार कई कठिन दौर से गुजर चुका है। यह जिंदगी का कटु अनुभव है। कोरोना, न्यूरो मस्कुर्लर डिस्आर्डर और मायस्थेनिया ग्रेसिव तीनों बीमारी का इलाज चला। इंजेक्शन, दवाएं और डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई। 21 अप्रैल को मैं स्वस्थ्य होकर घर लौट आया। मेरा मानना है कि कोरोना से बचाव के लिए गाइडलाइन का पालन जरूरी है। पहले तो घबराएं नहीं। लक्षण दिखने के साथ ही डॉक्टरी परामर्श शुरू कर दें। उनके कहे अनुसार दवा लें। आप जल्दी स्वस्थ हो जाएंगे।

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