जांच लैब में खेल:153 पैथोलॉजी लैब में 31 हजार से ज्यादा टेस्ट लेकिन किसी को भी नेशनल एक्रिडिएशन बोर्ड की मान्यता नहीं

भिलाई2 महीने पहले
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सरकारी अस्पतालों के आसपास ज्यादा पैथोलॉजी लैब संचालित हैं। - Dainik Bhaskar
सरकारी अस्पतालों के आसपास ज्यादा पैथोलॉजी लैब संचालित हैं।
  • हर महीने लैब की एक्सटर्नल क्वालिटी की जांच जिले के सिर्फ तीन लैब करा रहे

जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में कुल 153 लैब संचालित हैं। सभी ब्लड और यूरीन के नमूनों से रोज 31000 जांच हो रही है। लेकिन किसी एक की भी रिपोर्ट एनएबीएल (नेशनल एक्रिडिएशन बोर्ड आफ टेस्टिंग एंड केलिब्रेशन लैबोरेट्री) के मानक अनुसार नहीं है। क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा स्थापित इस संस्था का प्रमाण-पत्र अब तक किसी को नहीं मिला है।

डाइग्नोस्टिक सेंटर और अस्पताल को लेकर 3 ने आवेदन किया है। तीनों स्वयं के यहां लगी मशीनरी का इंटर्नल क्वालिटी असेसमेंट टेस्ट के साथ ही एनएबीएल द्वारा निमित संस्थानों से क्वालिटी चेक करवा रहे हैं। शेष द्वारा सिर्फ स्वयं से इंटर्नल क्वालिटी चेक किया जा जा रहा है। इस चेंकिंग के लिए जिला या राज्य स्तर पर कोई एजेंसी भी नहीं है। भारत सरकार द्वारा नामित एजेंसी से खुद की क्वालिटी चेक नहीं करवाने वाले 150 लैब में जिला अस्पताल सहित 40 सरकारी लैब हैं। भास्कर की पड़ताल में यह खुलासा हुआ है।

जानिए मरीजों को होने वाले नुकसान के बारे में

रिपोर्ट सही नहीं होने की आशंका
लैबोरेटरी का एक्सटर्नल क्वालिटी एस्योरेंस टेस्ट नहीं होने से रिपोर्ट गलत आने की आशंका बनी रहती है। चूंकि, अधिकतर डॉक्टर क्लीनिकली आधार की बजाय रिपोर्ट के आधार पर इलाज करते हैं, इसलिए मरीज को दवाएं खाते रहने के बाद भी आराम नहीं होता है।

2- ओवरडोज दवा दिए जाने का डर
रिपोर्ट के आधार पर दवाएं दी जाती हैं, इसलिए रिपोर्ट अमानक होने की दशा में दवाओं का ओवरडोज होने की आशंका बनी रहती है। दवाओं को ओवरडोज से सेहत को ज्यादा नुकसान होता है, इसलिए जांच लैब का एक्सटर्नल क्वालिटी चेक जरूरी होता है।

एक टेस्ट दो बार कराने की जरूरत
अमानक रिपोर्ट होने से विशेषज्ञ डॉक्टर मरीज को दोबारा जांच कराने को बोलते हैं। इससे मरीज के ऊपर अधिभार पड़ता है। सेम जांच के लिए उसे डबल पैसे खर्च करने पड़ जाते हैं। मानक को पूरा करने में शुल्क 15 % ज्यादा ही लगेगा।

एनएबीएल के बारे में तय किए मानक, जानिए
क्वॉलिटी काउंसिल आफ इंडिया ने 1988 में एनएबीएल का गठन किया था। इसका मूल काम रक्त व यूरीन से होने वाली जांच के लिए ब्लड कलेक्शन से लेकर रिपोर्ट जारी करने की सही प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित कराना है। इसके आवेदन के लिए संबंधित लैब को भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त लैब से एक्सटर्नल क्वालिटी एस्योरेंस टेस्ट कराना होता है। इसके लिए मानक भी तय किए गए हैं। इसका पालन नहीं हो रहा है।

एक साल की रिपोर्ट पर जारी होते हैं सर्टिफिकेट
क्वॉलिटी एस्योरेंस टेस्ट में भारत सरकार द्वारा नामित एजेंसियां (एम्स दिल्ली और सीएमसी वेल्लूर आदि) स्वयं की लैब में जांचा हुआ सैंपल आवेदन करने वाली लैब को हर महीने देती हैं। लैब उस सैंपल को अपने यहां जांच कर रिपोर्ट, एजेंसी को भेजती है। उसके बाद एजेंसी अपनी रिपोर्ट से मिलान करती है। मानक के आसपास होने से गुड या एक्सिलेंट, नहीं तो चेतावनी जारी करती है। इसके आधार पर क्वालिटी तय होती है।

इधर जिला अस्पताल की हमर लैब में एनएबीएल मानक पूरा करने का दावा, शुरू करने की तैयारी
हमर लैब योजना के तहत जिला अस्पताल की लैब को अपग्रेड किया जा रहा है। ब्लड और यूरीन के नमूनों से कुल 114 प्रकार की जांच करने की योजना बनी है। अभी मात्र 64 प्रकार की जांच की जा रही है। सिविल सर्जन डॉ. पी बाल किशोर का कहना है कि जांच की गुणवत्ता से पहले उनके लैब टेक्नीशियन कंपनियों द्वारा दिए गए इंटर्नल क्वालिटी कंट्रोल टेस्ट से जांच करा ली गई है।

जांच की गुणवत्ता के लिए एक्सटर्नल क्वालिटी एस्योरेंस टेस्ट जरूरी है। क्योंकि इससे टेस्ट के लिए नमूने लेने से रिपोर्ट जारी करने तक अपनाई गई प्रक्रिया का आंकलन हो जाता है। सही इलाज के लिए रिपोर्ट सही होनी चाहिए।
-डॉ. कृतिका ग्यानचंदानी, विशेषज्ञ

हर लैब में अलग-अलग कंपनियों की मशीनें होती हैं। सभी की इंटर्नल क्वालिटी टेस्ट किट से जांच शुरू करने से पहले टेस्ट करना होता हैं। ऐसे में एक ही सैंपल की अलग-अलग रिपोर्ट आ जाती है। टेस्ट जरूरी है।
- डॉ. गोपीनाथ, विशेषज्ञ चिकित्सक

लैब संचालकों को जांच की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कठिन रिपोर्टिंग वाली जांच काे देश के एनएबीएल मान्यता प्राप्त लैब में भेज देनी चाहिए। इससे अधिकतम 15 प्रतिशत के करीब ही शुल्क में बढ़ोत्तरी होगी।
-डॉ. ताबीस अख्तर, विशेषज्ञ

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