ये धांधली है:शव वाहन की सेवा मुफ्त लेकिन सुविधा शुल्क के नाम पर वसूल रहे 300 रुपए

भिलाई5 महीने पहले
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आम जन को फ्री एम्बुलेंस व डेड बॉडी वाहन उपलब्ध कराने स्वास्थ्य विभाग ने जिन ड्राइवर को रखा है, वही अपनी निजी एम्बुलेंस चला रहे हैं। इन कर्मचारियों की निजी एम्बुलेंस जिला व लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल सुपेला में चल रही हैं। इसे दोनों अस्पतालों के आसपास खड़े कभी भी देखा जा सकता है। जैसे ही कोई गंभीर केस अस्पतालों में पहुंचता है, इन निजी एम्बुलेंस के ड्राइवर वहां पहुंचकर अटेंडेंट को गुमराह करने लगते हैं।

पेशेंट की स्थित गंभीर बताकर उसे हायर सेंटर ले जाने को राजी करते हैं। अगर अटेंडेंट सरकारी एम्बुलेंस (108) की डिमांड करता है तो उसे सरकारी एम्बुलेंस आने में देरी बता दी जाती है। जैसे-तैसे शुल्क लेकर मरीज को निजी सेंटर ले जाते हैं। दैनिक भास्कर की पड़ताल में इसका खुलासा हुआ है। मरीज के अटेंडेंटर ने भी इसकी जानकारी दी है। इतना ही नहीं नियम विरुद्ध इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग के दो नियमित और एक संविदा ड्राइवर अपनी निजी एम्बुलेंस को ऑपरेट कर रहे हैं। भास्कर स्टिंग में इन कर्मचारियों ने स्वयं की निजी एम्बुलेंस चलाना स्वीकारा है। भास्कर के पास इन कर्मचारियों की वीडियो और ऑडियो रिकार्डिंग मौजूद है। इस मामले में सिविल सर्जन ने जानकारी के बाद जांच के निर्देश दिए हैं। साथ ही कहा है कि यदि गड़बड़ी सामने आती है, तो कार्रवाई भी की जाएगी।

एम्बुलेंस से ड्यूटी आते हैं, फिर ड्राइवर से अपने निजी एम्बुलेंस को चलवाते हैं...
लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल सुपेला में पदस्थ विनोद नाम का ड्राइवर निजी एम्बुलेंस संचालित करने के मामले में ही जिला अस्पताल में अटैच किए गए हैं, फिर भी सुपेला अस्पताल में सक्रिय हैं। पहले अपनी एम्बुलेंस सीजी 07 सीसी 8688 का संचालन करते थे। भंडाफोड़ होने के बाद सीजी 07 सीई 0658 का संचालन कर रहे हैं। यह एम्बुलेंस प्रकाश घनघोरकर नाम से दर्ज है। वह सुपेला में पदस्थ ड्राइवर ज्ञानेश्वर घनघोनकर के रिश्तेदार है।

बॉडी उठाने सुविधा फ्री, सुविधा शुल्क ले रहे, 300 से 500 रुपए की वसूली
सरकारी अस्पतालों से डेड बॉडी उठाने मुफ्त में सरकारी मुक्तांजलि सुविधा है। टोल फ्री नंबर 1099 डॉयल करने से इसका लाभ लिया जा सकता है। जिले में 5 ऐसे वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। रोस्टर के हिसाब से ये जिला व सुपेला अस्पताल सहित अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में खड़े कराए जाते हैं। इन वाहनों में से एक रंजित नाम का चालक पदस्थ है। इनकी निजी एंबुलेंस दिन भर जिला अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के पास खड़ी रहती है। निजी एम्बुलेंस देने के लिए चार्ज करते हैं। सरकारी एम्बुलेंस से जाने पर सुविधा शुक्ल के नाम पर 300 से 500 रुपए तक ले रहे हैं। जिम्मेदारों को भी इसकी जानकारी है।

औसतन 5 मरीज व शव के लिए एम्बुलेंस का उपयोग
सरकारी वाहनों को चलाने के लिए रखे गए रेगुलर और संविदा ड्राइवरों ने जिला अस्पताल से लेकर सुपेला अस्पताल तक एक रैकेट बनाकर रखा है। रोज सभी औसतन 5 मरीजों को और डेड बॉडी को अपने निजी एम्बुलेंस से पहुंचाते हैं। इसमें विनोद नाम के ड्राइवर के पहले भी शिकायत हो चुकी है। कोई कार्रवाई नहीं होने से दूसरों के हौसले बुलंद हैं। जिम्मेदार भी चुप्पी साधे हुए हैं।

निजी एम्बुलेंस चलाने के मामले में चालक बर्खास्त
जिला अस्पताल का चालक राजू खुद की निजी एम्बुलेंस चलाने के मामले में ही बर्खास्त किया गया था। जिला अस्पताल की जीवनदीप समिति में रहते हुए वह अपनी दो-दो एम्बुलेंस का संचालन करता था। जिला अस्पताल के मरीजों को निजी अस्पताल ले जाने की करतूतों का खुलासा होने के बाद उसके विरुद्ध कार्रवाई की गई थी। इसके बाद व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ।

कैजुअल्टी में संपर्क होने से चल रहा यह पूरा खेल
जिला अस्पताल और लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल सुपेला की कैजुअल्टी में इनके बेहतर संपर्क हैं। जैसे ही कोई गंभीर केस पहुंचता है, इन्हें जानकारी मिल जाती है। डेड बॉडी ढोने वाली जिले में अधिकतर सरकारी वाहन जिला अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के पास ही खड़े रहते हैं। वहीं से लोगों को जाल में फंसाते हैं। इस प्रकार जिला अस्पताल में पूरा रैकेट इसे लेकर सक्रिय है।

कोरोना में कमाई देख खरीदी अपनी एम्बुलेंस
कोरोना की पहली लहर के बाद अस्पताल में पदस्थ तीन ड्राइवर ने एम्बुलेंस खरीद ली। उस समय पॉजीटिव मरीजों को शहर में ही एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने के लिए 5-5 हजार रुपए लिए हैं। अस्पताल में रहते ये सीधे मरीज के संपर्क में हरे हैं, इसलिए पहले बिचौलिए का काम किया है।

एम्बुलेंस चालक से हुई बातचीत, जानिए

रंजीत जी क्या एम्बुलेंस मिल जाएगी?
कहां जाना है, पहले यह बताइए?

अहिवारा से आगे डेड बॉडी ले जाना है, जिला अस्पताल में डेथ हुई है।
मैं तो अभी घर में हूं। पानी गिरत हे। बाइक से आहूं। थोड़ा समय लगी भाई।

ठीक है, आ जाओ कितना चार्ज लगेगा।
नहीं, गाड़ी नि: शुल्क है, आपकी जो इच्छा है, वो दे देना है।

आप तो सरकारी बता रहे, आपकी कोई निजी एम्बुलेंस है, जिससे जल्दी हो जाए?
शव वाहन तो सरकारी ही है, निजी भी मिल जाएगी, मैं शव वाहन चलाता हूं, निजी एम्बुलेंस को अस्पताल नहीं ले जाता हूं।

इस बारे में जांच की जाएगी दोषी पर कार्रवाई होगी
जिला अस्पताल परिसर में निजी एम्बुलेंस खड़ी करने के लिए मैने स्पष्ट मनाही की है। साइकिल स्टैंड वाले को उसका ठेका तक निरस्त करने की चेतावनी दिया हूं। इसके बाद भी अगर कोई निजी एम्बुलेंस खड़ी रहती है, तो मैं इसको दिखवाता हूं। सुपेला के लिए वहां के प्रभारी को सख्ती के लिए निर्देशित करता हूं।
-डॉ. पी बालकिशोर, सिविल सर्जन जिला अस्पताल दुर्ग

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