कोरोना का असर:घरों में रहकर मनाई जाएगी डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की 130वीं जयंती

डोंगरगढ़8 महीने पहले
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आदर्श बौद्ध महासभा नागसेन बुद्ध विहार डोंगरगढ़ के तत्वावधान में संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की 130 वीं जयंती 14 अप्रैल को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाना निश्चित किया गया था, परंतु कोरोना महामारी के कारण शासन के द्वारा दिए गए आदेशानुसार जयंती के अवसर पर आयोजित होने वाले सभी कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया गया है।

आयोजन समिति के प्रजेश सहारे ने बताया कि इस वर्ष आयोजित किए गए सभी प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम व रैली के कार्यक्रमों को परिस्थिति सामान्य होते तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। स्थिति सामान्य होने पर जोर-शोर से मनाए जाने की बात कही। सभी अपने-अपने घरों को लाइटों से सजाएं व जयंती के दिन शाम को मोमबत्ती जला कर घरों को रोशन करें व वंदना कर सभी के मंगल कामना करें।

पहली बार 1976 में निकाली गई थी रैली
डोंगरगढ़ में सर्व प्रथम बौद्ध समाज द्वारा रैली निकालने की शुरुआत की गई। इसमें मुख्य भूमिका शिवनाथ टेंभुरकर, सुखलाल टेंभुरकर, गुहन लाल, कचरु सहारे, गीताराम सहारे, हेतराम जनबंधु आदि ने निभाई। उस समय रिक्शा में फोटो लगा कर बैंड बाजा की धुन में रैली निकाली गई थी।

आयोजन में सर्व धर्म एकता की दिखती है झलक
नगर भ्रमण के दौरान नगर का भाईचारा देखते ही बनता है जगह जगह पर सभी धर्मों के लोगों द्वारा बाबा साहब की मूर्ति का माल्यार्पण कर स्वागत किया जाता है। इसके अलावा जगह-जगह विभिन्न समितियों द्वारा जलपान की व्यवस्था की जाती है। अन्य आयोजन भी समाज द्वारा किए जाते थे।

यहां पर हर वर्ष ऐसे होता था दो दिवसीय आयोजन
आदर्श बौद्ध महासभा नागसेन बुद्ध विहार के तत्वावधान में हर वर्ष दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था। जिसमें 13 अप्रैल को विशाल मोटर साइकिल रैली व रात को महाराष्ट्र व छग के कलाकारों द्वारा प्रस्तुति दी जाती थी। वहीं रात 12 बजे केक काटकर व आतिशबाजी के साथ जयंती की शुरुआत की जाती थी। 14 अप्रैल को सुबह बुद्ध विहार में परित्राण पाठ कर तहसील परिसर में स्थित बाबा साहब की प्रतिमा पर माल्यापर्ण किया जाता था।

साथ ही नगर पालिका परिसर, रेलवे मजदूर कांग्रेस द्वारा आयोजित रेल्वे परिसर में कार्यक्रम में शामिल होने के पश्चात शाम पांच बजे विशाल रैली की शुरुआत होती थी। इसमें नगर के सभी नागरिक के साथ बौद्ध उपासक-उपासिका, दुर्ग व राजनांदगांव के कारीगरों द्वारा निर्मित झांकी व छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को प्रदर्शित करते कलाकारों के साथ नगर भ्रमण कर वापस बुद्ध विहार में पहुंच कर समापन होता है।

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