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ऐसा दर्द:लॉकडाउन में पसिया पेज खाने की मजबूरी; हर माह राशन लेने 40 से 45 किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता है बैगा आदिवासियों को

राजनांदगांव2 महीने पहले
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संकट की घड़ी में यह मुस्कान सुकून देती है: बच्चों को जब नए कपड़े मिले तो इनके चेहरे पर दिवाली और ईद सी खुशी झलक रही थी। - Dainik Bhaskar
संकट की घड़ी में यह मुस्कान सुकून देती है: बच्चों को जब नए कपड़े मिले तो इनके चेहरे पर दिवाली और ईद सी खुशी झलक रही थी।
  • संकट में सूखा राशन का पैकेट व नए कपड़े मिले तो खिल उठे चेहरे
  • सौर ऊर्जा का सहारा: छुईखदान ब्लॉक के जंगल में नवागांव पंचायत के टोला तक नहीं पहुंची बिजली

कोरोना महामारी से बचाव के लिए लगाए गए लॉकडाउन के बीच शहरी लोगों तक तो राहत के हर सामान आसानी से पहुंच जा रहे हैं, लेकिन बीहड़ जंगल में बसे लोग हर एक चीज के लिए तरस रहे हैं। छुईखदान ब्लॉक के अंतर्गत जंगल में बसे नवागांव पंचायत के टोला में रहने वाले बैगा परिवार के सदस्य इस लॉकडाउन में बेहद परेशान हैं।

ये रहते तो राजनांदगांव में हैं पर राशन कार्ड कवर्धा जिले के बोड़ला क्षेत्र के नाम से बना है। इसलिए इन्हें हर माह राशन लेने 40 से 45 किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता है। लॉकडाउन के चलते ये राशन लेने नहीं जा पा रहे हैं। इसलिए पसिया, पेज खाकर जिंदगी गुजार रहे। शुक्रवार को बर्फानी सेवा समिति के पदाधिकारियों ने संकट से जूझ रहे इन परिवारों तक सूखा राशन और कपड़े पहुंचाए तो इनके चेहरे खिल उठे।

वैक्सीन लगाने कोई पहुंचा ही नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि कोरोना संक्रमण को तो जानते हैं। टोला में बसे एक भी ग्रामीण को वैक्सीन नहीं लगी है। ग्रामीणों ने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला ही नहीं है। शौचालय निर्माण के लिए भी राशि नहीं दी गई है। मनरेगा के तहत काम भी नहीं दिया जाता। स्थानीय जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के वक्त आते हैं। टोला तक पहुंचने सड़क तक नहीं है। पगडंडी से होकर टोला पहुंच सकते हैं।

आर्थिक तंगी, मदद जरूरी
कोरोना महामारी के बीच तेंदूपत्ता तोड़ाई और संग्रहण भी बंद है। मनरेगा का काम भी नहीं चल रहा। इसलिए आर्थिक रूप से इतने परेशान हैं कि घर पर एक ही समय भोजन बन पा रहा है। हरी सब्जी तो ये जानते ही नहीं। बताया कि कोदो-कुटकी, पसिया के सहारे ही भूख शांत कर रहे हैं। बताया कि वनोपज का संग्रहण कर कुछ कमाई कर लेते थे पर कोरोना के चलते यह भी बंद है। इस कारण आर्थिक तंगी का दौर चल रहा है।

बर्फानी सेवा आश्रम समिति के अध्यक्ष राजेश मारू, पत्रकार कमलेश सिमनकर ने अभावों में जिंदगी जी रहे इन बैगा परिवारों को सूखा राशन का पैकेट दिया तो सभी की आंखें डबडबा गईं। ग्रामीणों ने बताया कि आर्थिक तंगी के चलते आटा, तेल खरीद नहीं पा रहे हैं। रोज केवल पसिया, पेज ही बनाकर खाते आ रहे हैं पर लंबे समय बाद सूखा राशन में आटा, तेल, मिर्च, नमक और अन्य सामान देख कर राहत मिली।

इसलिए यहां आ गए
बच्चे तो कपड़े पाकर इतने खुश थे कि जैसे इनकी आज दिवाली या ईद है। छुईखदान ब्लॉक के बूढ़ानभाठ, देवरचा के आगे स्थित नवागांव पंचायत के टोला में बैगा परिवार के लोग निवास करते हैं। घास, फूस की झोपड़ी बनाकर यहां रहे हैं। बारिश होने पर ये सो तक नहीं पाते। इन्हें यहां बसे तीन से चार साल हो रहे हैं। पहले से बोड़ला क्षेत्र में रहते थे पर जीवन-यापन में तकलीफ हुई तो कवर्धा से सटे राजनांदगांव के जंगल में ही बस गए। गांव में बिजली नहीं है। सोलर सिस्टम लगा है पर यह भी ज्यादा असरकारक नहीं है।

आसान नहीं था पहुंचना
छुईखदान से छिंदारी और यहां से देवरचा होते हुए टीम आगे बढ़ी। इसके बाद का रास्ता इस कदर खतरनाक है कि बाइक चालक आए दिन दुर्घटना का शिकार होते रहते हैं। रपटा नाला तक ठूट-फूट गए हैं। सड़क उखड़ी हुई है। बिखरे पड़े नुकीले पत्थर बता रहे हैं कि अफसर यहां झांकते तक नहीं हैं। ग्रामीणों ने भास्कर को बताया कि बारिश के दिनों में गांव तक ही सीमित रहते हैं।

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