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जज्बा जो मिसाल है:शव उठाने नहीं आए कर्मी तो पार्षद ऋषि ने निभाई जिम्मेदारी, मरच्यूरी से शव को बाहर निकालने तक के लिए कर्मी नहीं,

राजनांदगांव14 दिन पहले
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पार्षद ऋषि शास्त्री ने खुद पीपीई किट पहनकर शव उठाया। - Dainik Bhaskar
पार्षद ऋषि शास्त्री ने खुद पीपीई किट पहनकर शव उठाया।
  • परिजनों को खुद ही भीतर दाखिल होकर उठाने कह रहे

जिला अस्पताल के मरच्यूरी से शव बाहर निकालने कोई भी कर्मचारी नियुक्त नहीं है। परिजनों को खुद ही भीतर दाखिल होकर शव बाहर निकालने और शव वाहन तक चढ़ाने की बात कही जा रही है। अगर कोई परिजन अकेले रहे तो उसे शव निकालने के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ रही है।

ऐसा ही मामला सोमवार को भी सामने आया। खैरागढ़ निवासी कोरोना संक्रमित की रविवार रात इलाज के दौरान मौत हो गई। उनके शव को मरच्यूरी में रखा गया था। सुबह 9.30 बजे परिवार का एक ही सदस्य शव लेने पहुंचा। पहले तो उन्हें दूसरे शवों का पीएम होने की बात कहकर तीन घंटे इंतजार कराया गया। इसकी जानकारी मिलते ही बसंतपुर वार्ड के पार्षद ऋषि शास्त्री मौके पर पहुंच । कर्मचारी मौजूद नहीं होने की स्थिति में पार्षद शास्त्री ने खुद ही पीपीई किट पहना, अपने एक अन्य सहयोगी को भी पीपीई किट पहनाकर तैयार किया, इसके बाद पार्षद शास्त्री खुद मरच्यूरी में दाखिल हुए, जहां से शव बाहर निकालकर शव वाहन में चढ़ाया।

आईबी ग्रुप ने शव पहुंचाने मुफ्त में वाहन की व्यवस्था की।
आईबी ग्रुप ने शव पहुंचाने मुफ्त में वाहन की व्यवस्था की।

शव ले जाने नहीं मिला वाहन आईबी ग्रुप ने की व्यवस्था
शव को खैरागढ़ तक ले जाने के लिए मुक्तांजलि वाहन की भी सुविधा नहीं मिल पा रही थी, परिजन बार-बार वाहन के लिए फोन कॉल करते रहे। लेकिन आधे घंटे एक घंटे में वाहन उपलब्ध होने का जवाब मिलता रहा । परेशानी को देखते हुए आईबी ग्रुप ने नि: शुल्क वाहन की व्यवस्था कराई। जिसके माध्यम से मृतक के शव को खैरागढ़ तक पहुंचाया गया। आईबी ग्रुप ने ऐसी ही विषय परिस्थितियों में मदद के लिए चार नि: शुल्क शव वाहन की व्यवस्था की है।

मौत रात में फिर भी दूसरे दिन दोपहर को दे रहे शव
मरच्यूरी की बदहाल व्यवस्था का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि अगर रात में भी किसी मरीज की मौत हो जाए तो उसका शव दूसरे दिन दोपहर बाद ही दिया जा रहा है। ऐसी स्थिति क्यों बन रही है, इसके लिए कर्मचारी कुछ नहीं बता पा रहे। सुबह 10.30 के बाद ही मरच्यूरी से शव बाहर निकाला जाता है। कोरोना संकट काल में भी इस अव्यवस्था को सुधारा नहीं जा सका है। मृतक के परिजनों को घंटों तक मरच्यूरी के बाहर ही शव लेने के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।

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