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घर में इलाज भगवान भरोसे:मैं होम आइसोलेट हूं: ऑक्सीजन लेवल डाउन हो रहा, क्या करूं?; हेल्पडेस्क: रिस्पांस टीम बनी ही नहीं है, हम कुछ नहीं कर सकते

राजनांदगांवएक महीने पहले
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  • भास्कर टीम ने खुद मरीज बनकर फोन किया तो खुली स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल

हैलो....मैं होम आइसोलेट हूं और मेरा ऑक्सीजन लेवल डाउन हो रहा है, क्या करूं ? मुझे कितने देर में मदद मिलेगी? हेल्प डेस्क - सर यहां तो रिस्पांस टीम ही नहीं हैं। मैं किसे बताउं। अस्पताल में बेड मिलेगा कि नहीं? हेल्प डेस्क- हमें पता नहीं है सर कितना बेड हैं। ऑक्सीजन की सुविधा मिल जाएगी क्या? हेल्प डेस्क -इसके बारे में हमें कुछ नहीं पता सर। यह हाल है स्वास्थ्य विभाग के हेल्प डेस्क का जहां होम आईसोलेट मरीजों की हालत बिगड़ने पर भी कोई रिस्पांस नहीं मिल रहा। ऐसे मरीजों के लिए कोई रिस्पांस टीम बनाई ही नहीं गई है। भास्कर ने बुधवार की रात करीब 10 बजे स्वास्थ्य विभाग के हेल्प लाइन और रिस्पांस टीम को लेकर मौके पर पहुंचकर पड़ताल की तो यह सच्चाई सामने आई है। अगर होम आइसोलेट किसी मरीज की हालत बिगड़ती है तो उसे तत्काल राहत मिल पाना मुश्किल है। स्वास्थ्य विभाग के हेल्प डेस्क नंबर 7000210932 में कॉल रिसीव करने वाले कर्मचारियों ने बताया कि जानकारी ड्यूटी डॉक्टर को देते हैं।

दो कर्मचारियों की ड्यूटी
हेल्पलाइन डेस्क में दो कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। इन कर्मचारियों से पूछा गया कि कोविड अस्पताल में कितने बेड खाली हैं, क्या तत्काल ऑक्सीजन की सुविधा मिल सकती है। किसी पॉजिटिव को भर्ती कराना है तो क्या करना होगा? हेल्प लाइन टीम को पता ही नहीं है कि अस्पताल में बेड है या नहीं। यहां तक ऑक्सीजन की सुविधा कैसे मिलेगी? यह भी नहीं बताए। दो जूनियर डॉक्टर तैनात थे।

एक भी रिस्पांस टीम नहीं
शहर में होम आईसोलेट मरीजों के लिए एक भी रिस्पांस टीम स्वास्थ्य विभाग ने नहीं बनाई हैं। बेड की कमी के चलते बड़ी संख्या में लोग घरों में ही आइसोलेट हैं। इन मुद्दे को लेकर स्वास्थ्य विभाग तीन से चार बार बैठक कर चुकी हैं। इसमें रिस्पांस टीम बनाए जाने पर भी चर्चा हुई। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जा सका। होम आइसोलेशन में मौजूद मरीजों की हालात बिगड़ी तो समस्या गंभीर हो सकती हैं।

फोन नहीं उठाते जिम्मेदार
हालात देखने के बाद तत्काल सीएमएचओ डॉ. मिथलेश चौधरी को कॉल किया गया, लेकिन उन्होंने भी फोन रिसीव नहीं किया। इसके बाद मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. रेणुका गहिने से संपर्क करने का प्रयास किया, उन्होंने भी फोन नहीं उठाया। जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था का कमांड इन्हीं के पास हैं। ऐसे में इन जिम्मेदारों की ऐसी गंभीर लापरवाही भी कोरोना काल में मरीजों के लिए संकट खड़ा कर सकती हैं।

टीम घरों में नहीं पहुंच रही
सैकड़ों की संख्या में मरीज होम आइसोलेट हैं। नियम तय हुआ था कि होम आइसोलेट करने से पहले मेडिकल टीम घर का मुआयना करेगी। हवादार, अलग से लेट-बॉथ की सुविधा होने पर ही होम आइसोलेट करेंगे पर यहां तो अस्पताल में बेड नहीं होने की वजह से दो या तीन कमरों वाले मकान में भी संक्रमित परिवार के लोग रह रहे हैं। मेडिकल टीम ने इन घरों का मुआयना किया ही नहीं। यह चिंता की बात है।

खुद युवाओं ने पहुंचाया ऑक्सीजन सिलेंडर
बुधवार की रात कामठी लाइन निवासी एक बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ी। सांस लेने में परेशानी हो रही थी। मेडिकल टीम का रिस्पांस तो नहीं मिला पर शहर के जागरूक युवाओं ने रात को 1.3 मिनट पर उक्त बुजुर्ग के घर पर ऑक्सीजन सिलेंडर पहंुचाया। इसके बाद मरीज को कुछ राहत मिल सकी। ये स्थिति बताती है कि होम आईसोलेट मरीज किस खतरे के बीच इस व्यवस्था से गुजर रहे हैं। इसे तत्काल सुधारे जाने की जरूरत है।

जिले भर में 1699 मरीज होम आइसाेलेशन में
जिले में 1699 मरीज घर पर रहकर कोरोना का इलाज करा रहे हैं। इनमें से ज्यादा बिना लक्षण वाले हैं। दावा तो यह है कि अगर इनकी हालत बिगड़ी तो कॉल सेंटर के माध्यम से मदद ली जा सकती है। लेकिन व्यवस्था दावों के उलट हैं। कॉल सेंटर नाममात्र की हैं। ऐसी स्थिति में किसे सूचना देना हैं, ये तक यहां के कर्मचारी नहीं जानतें। कोई कोई गंभीर समस्या मरीजों में सामने आई तो मदद कब तक मिलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं हैं।

होम आइसोलेट का प्रोटोकॉल यह है
पॉजिटिव आने पर स्वास्थ्य विभाग की टीम 24 घंटे के भीतर मरीजों से संपर्क करेगी। होम आइसोलेशन में रहने के लिए अलग हवादार कमरे और शौचालय होना अनिवार्य है। होम आइसोलेशन में सिर्फ बिना लक्षण वाले मरीजों को रखा जाना है। इन मरीजों द्वारा प्रोटोकाल का पालन करना अनिवार्य है।

कलेक्टर बोले- मरीजों को फोन लगा रहे
कलेक्टर टीके वर्मा का कहना है कि मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है। मैदानी अमला सभी से संपर्क करने में जुटा है। काल सेंटर से भी लगातार फोन लगा रहे हैं। हालांकि रिस्पांस टीम नहीं बनी है। घर में रह रहे मरीजों को खुद ही एक डॉक्टर की निगरानी में रहना है। डॉक्टर का वे खुद ही चयन करेंगे।

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