एंबुलेंस में ही दम तोड़ा:पत्थर दिल सिस्टम; 9 घंटे में 9 अस्पताल ले गए, हेड मास्टर को कहीं भी नहीं मिला इलाज

राजनांदगांव7 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
नंदकुमार साहू। - Dainik Bhaskar
नंदकुमार साहू।
  • 6 अप्रैल को टीका लगवाने के बाद से लगातार बिगड़ती गई नंदकुमार की तबीयत, एक अस्पताल प्रबंधन ने तो एंटीजन रिपोर्ट तक को नहीं माना, मांगते रहे आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट
  • मास्टर जी, हमें माफ करना... क्योंकि पढ़-लिखकर सिस्टम में जिम्मेदारी निभाने वाले लोग इंसानियत का पाठ ही भूल गए हैं

महज 9 घंटे में नौ अस्पताल लेकर गए। लेकिन कहीं भी इलाज नहीं मिल पाया। आखिर में संघर्ष के बाद एंबुलेंस में ही सांसें उखड़ गई। यहां मरीज की किस्मत खराब नहीं थी, खराब तो सिस्टम था। जिसने उसका इलाज नहीं किया।

शायद कोई इलाज करता तो उसकी जान बच जाती। बुचीभरदा निवासी नंदकुमार साहू ‘साकेत’ ..., जिन्हें बेहतर इलाज की आस में उनके परिजन राजनांदगांव से भिलाई-दुर्ग के अस्पताल लेकर पहुंचे। लेकिन उन्हें क्या पता ये यहां का सिस्टम वहां से ज्यादा खराब है। नंदकुमार साहू “साकेत’ बुचीभरदा के हेडमास्टर थे। उनके छोटे भाई प्रकाश साहू बताते हैं कि, 6 अप्रैल को नंदकुमार साहू को कोरोना टीका लगा। उसके बाद से उनकी तबीयत बिगड़ गई। 18 अप्रैल को तबीयत ज्यादा बिगड़ी। मुझे बुलाया गया। मैं फौरन पहुंचा।

बुचीभरदा के एचएम के छोटे भाई के हवाले से जानिए पूरी कहानी

प्रकाश बताते हैं कि सबसे पहले उन्हें सुंदरा स्थित जीवन रेखा अस्पताल लेकर गए। संडे का दिन था। हमें यह कहकर लौटा दिया कि रविवार को दोपहर 3 बजे के बाद पेशेंट नहीं लेते। अस्पताल में बेड नहीं है। हम वहां से सीधे भिलाई आए। उन्होंने बताया कि खुर्सीपार स्थित आईएमआई अस्पताल लेकर गए। वहां भी हमें बेड नहीं होने का हवाला देकर लौटा दिया। तब तेजी से ऑक्सीजन लेवल डाउन हो रहा था। आईएमआई अस्पताल से बीएम शाह अस्पताल लेकर गए। वहां भी सुविधा नहीं होने की बात कहकर टाल दिए।

बीएम शाह से हाइटेक अस्पताल लेकर गए। उन्होंने बताया कि हाइटेक में बेड नहीं मिला। हाइटेक से मित्तल अस्पताल लेकर गए। मित्तल में भी वही बेड संकट की कहानी। हम मित्तल के बाद बड़े भाई को एसआर अस्पताल चिखली लेकर पहुंचे। हमें वहां भी मायूसी हाथ ली।

ऑक्सीजन लेवल 39 था, तड़प रहे थे, फिर भी इलाज नहीं

थक हारकर हम श्री शंकराचार्य अस्पताल गए। वहां पर्ची बन गई। तब हमसे कोविड रिपोर्ट मांगा गया। कोरोना जांच कराने रात 9 बजे हम सुपेला अस्पताल गए। सुपेला अस्पताल में एंटीजन टेस्ट में रिपोर्ट निगेटिव आई। तब सुपेला अस्पताल में दो इंजेक्शन लगाया। रेफर बना दिया जिला अस्पताल दुर्ग का। तब ऑक्सीजन लेवल 39 था। हम बेहतर इलाज की उम्मीद में फिर श्री शंकराचार्य अस्पताल गए। वहां ड्यूटी डॉक्टर ने एंटीजन टेस्ट की रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिए। वे आरटी-पीसीआर रिपोर्ट मांगने लगे। चूंकि लक्षण कोविड का था तो उन्होंने निगेटिव रिपोर्ट से उपचार तक शुरू नहीं किया। रात 1 बजे चंदूलाल कोविड अस्पताल लेकर गए। हमें वहां भी लौटा दिया गया। तब तक बड़े भाई एंबुलेंस में थे। थोड़ी देर में रात तकरीबन 2 बजे उनकी सांसें उखड़ गई। एंबुलेंस में ही उनकी मौत हो गई।

और भी हो चुकी है मौतें

इसके पूर्व भी इस माह बेड और वेंटिलेटर के अभाव में कई मौतें हो चुकी हैं। मरीज को समय पर इलाज मिला नहीं। एम्बुलेंस में अंतिम सांसें लेते देखा गया है। थक हारकर लोग वापस राजनांदगांव आकर जिला अस्पताल में भर्ती करवा रहे। तब तक देर हो जा रही। इलाज में देरी भी मौत की वजह बन रही है। सिस्टम की खामियां सामने आ रही है।

खबरें और भी हैं...