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गृह प्रवेश...:बस गई बया की बस्ती, यह नए घरौंदे बेहतर बारिश की उम्मीद भी हैं

राजनांदगांव2 महीने पहले
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प्राकृतिक इंजीनियर बया पक्षी ने अपना घोसला तैयार कर लिया है। बया पक्षी के घोसले को बारिश के लिहाज से शुभ संकेत माना जाता है। उम्मीद की जाती है कि इस सीजन में बेहतर बारिश होगी। ये तस्वीर डोंगरगढ़ रोड की है। जहां खेत में एक छोटे से डबरी के किनारे बया पक्षियों ने घोसला तैयार किया है।

इसका वैज्ञानिक नाम प्लोसिडाई होता है। दिग्वजय कॉलेज के प्राणीशास्त्र विभाग के प्राध्यापक डॉ. संजय ठिसके ने बताया कि बया चिड़िया के प्रजनन का समय जुलाई से सितंबर के बीच होता है। घोसले को ऐसे सुरक्षित जगह पर बनाते हैं, जहां आमतौर पर किसी की पहुंच न हों। बया पक्षी ज्यादातर घोसले के लिए किसी तालाब या कुएं के ऊपरी हिस्से में मौजूद पेड़ की डालियों का सहारा लेते हैं।

ये संरक्षित श्रेणी का पक्षी, शिकार पर रोक
वन्यजीव अधिनियम 1972 की अनुसूची 4 में बया पक्षी को संरक्षित किया गया है। इससे इस पक्षी को कैद में रखने, शिकार करने पर पाबंदी है, लेकिन इस बया चिडि़यां कोलकाता, बिहार में इन्हें रंगाकर लवबर्ड कहकर बेचा जाता है। इस वजह से इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। करीब 3 साल पहले जिले में ऐसा ही एक मामला सामने आया था। फॉरेस्ट अफसरों ने करीब 100 बया चिडिया जब्त कर जंगल में छोड़ी थी। प्रजनन काल के समय बया चिड़िया का रंग पीला होता है। बाकी समय इसका रंग भूरा होता है। 

एक महीना लगता है घोसले को बनाने में 
बया का घोंसला नर बनाता है। इसे 28 से 30 दिन का समय लगता है। नर बया करीब 1 मीटर की घास के कई टुकड़े चोंच से काटकर लाता है। आधा घोंसला बनाकर मादा को दिखाता है। पसंद आने पर ही दोनों घरौंदा बनाते हैं। समझदार इंजीनियर की तरह घोसला घास को बुनकर बनाते हैं। इनमें मौसम की समझ होती है। घोंसला पेड़ के पूर्व की ओर बनाते हैं ताकि मानसूनी हवा से बच सके। 

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