छत्तीसगढ़ में बरसाती नाले से प्यास बुझा रहे ग्रामीण:काला पानी, पर जीने के लिए पीने की मजबूरी; इसके लिए भी कई किलोमीटर का सफर

बीजापुर3 महीने पहलेलेखक: लोकेश शर्मा
इसी नाले का गंदा पानी पी रहे हैं ग्रामीण।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में बैलाडीला की जिन पहाड़ियों से लौह उत्खनन कर सरकार करोड़ों की आमदनी कर रही है। उसी के आस-पास बसे 7 गांवों के लोग नाले का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। सैकड़ों ग्रामीण कई सालों से इसी पानी से अपनी प्यास बुझा रहे हैं। नाले का पानी इतना दूषित है कि उसका रंग भी अब काला हो गया है। हालांकि कुछ ग्रामीणों ने नाले के पास एक चुआ (झिरिया) बनाया है। सुबह शाम अब इसी से थोड़ी बहुत पूर्ति हो जाती है, पर भीषण गर्मी में ये भी सूखते जा रहे हैं।

नाले के पास एक चुआ भी बनाया है। नाला के पानी की अपेक्षा थोड़ा बहुत साफ पानी इससे मिल जाता है।
नाले के पास एक चुआ भी बनाया है। नाला के पानी की अपेक्षा थोड़ा बहुत साफ पानी इससे मिल जाता है।

दरअसल, हुर्रेपाल, तिमेनार, एटेपाल समेत आस-पास के करीब 7 गांवों में पानी की भारी किल्लत है। यह सभी गांव बीजापुर जिले के हैं। नक्सल प्रभावित इलाका होने की वजह से आज तक कोई भी प्रशासनिक अफसर इन इलाकों के ग्रामीणों की समस्या सुनने नहीं पहुंचा है। ग्रामीणों ने बताया कि करीब 15 से 20 साल पहले एक दो गांवों में हैंडपंप लगाए गए थे, जो अब खराब हो चुके हैं। पानी लेने गांव से कई किलोमीटर दूर पहाड़ियों से निकलने वाले बरसाती नाले में जाते हैं। ग्रामीणों ने कहा कि पानी गंदा है, लेकिन जीने के लिए पीना मजबूरी भी है। झिरिया का पानी नाले के पानी से थोड़ा साफ जरूर है, लेकिन पीने योग्य नहीं है।

पानी लेने पहुंचीं महिलाएं।
पानी लेने पहुंचीं महिलाएं।

झिरिया से सिर्फ 2 बार ले पाते हैं पानी
हुर्रेपाल में बरसाती नाले के पास ग्रामीणों ने जो चुआ (झिरिया) बनाया है, उसमें दिनभर में सिर्फ 2 बार ही पानी ले सकें, इतना ही इकट्ठा होता है। ग्रामीणों ने बताया कि पानी भरने के लिए आपस में सहमति बनाकर समय निर्धारित किया गया है। जो ग्रामीण चुआ से सुबह पानी भरते हैं, वे शाम के पानी लेने नहीं आते हैं। अगर एक परिवार दो बार पानी ले लेगा तो बाकी लोगों को पानी नहीं मिल पाएगा। यह सिलसिला पिछले कई सालों से चल रहा है। हालांकि, नाले के पानी का उपयोग किसी भी वक्त कोई भी ग्रामीण कर सकते हैं।

रात में भी पानी भरने जाते हैं ग्रामीण।
रात में भी पानी भरने जाते हैं ग्रामीण।

इंसान और जानवर दोनों की प्यास बुझाने का एक ही जरिया
हुर्रेपाल गांव के ग्रामीणों ने बताया कि जिस नाले के पानी का उपयोग इंसान करते हैं, उसी पानी से पालतू मवेशी सहित जंगल के कई जंगली जानवर भी प्यास बुझाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पानी की समस्या को दूर करने जिम्मेदारों के दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक गए, किसी ने समस्या का समाधान करने की दिलचस्पी नहीं दिखाई।

7 गांवों में पानी की किल्लत है।
7 गांवों में पानी की किल्लत है।

27 हैंडपंप के लिए दिया गया आवेदन
हुर्रेपाल गांव के सरपंच राजूराम ओयाम ने बताया कि, जिन 7 गांवों में पानी की किल्लत है, वहां के ग्रामीणों के साथ सालभर पहले बैठक किए थे। कुल 27 बोर उत्खनन कर हैंडपंप लगाने का प्रस्ताव बनाया गया था। अधिकारियों को प्रस्ताव देकर हैंडपंप की मांग किए थे। सालभर बीत जाने के बाद भी आज तक कोई भी अधिकारी गांव में आकर हालात नहीं देखे हैं। अधिकारी हमारी परेशानियों को दूर करने दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। यदि अब नाले का पानी सूख जाएगा तो हमें प्यासा रहना पड़ेगा।

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