खतरे में डीपाडीह का वैभव:1200 वर्ष पुरानी पुरातात्विक धरोहरों पर अफसरों की लापरवाही के घासफूंस उगे, यहीं पर छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी नंदी की प्रतिमा

अंबिकापुर2 महीने पहलेलेखक: दिलीप जायसवाल
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पुरातात्विक स्थल डीपाडीह में इस तरह बिखरी पड़ी हैं धरोहर, संरक्षण और सुरक्षा के इंतजाम नहीं, हर तरफ घास-फूंस उग आए। - Dainik Bhaskar
पुरातात्विक स्थल डीपाडीह में इस तरह बिखरी पड़ी हैं धरोहर, संरक्षण और सुरक्षा के इंतजाम नहीं, हर तरफ घास-फूंस उग आए।
  • एक किलोमीटर क्षेत्र में फैला है 8वीं से 12वीं सदी का इतिहास, लेकिन उसे सही तरीके से रखने की चिंता नहीं
  • ग्राउंड रिपोर्ट: धरोहरों का 5 साल के लिए किया था केमिकल ट्रीटमेंट, उसमें भी लापरवाही से 3 साल में ही उगी घास

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिला में स्थित पुरातात्विक स्थल डीपाडीह में एक किलोमीटर क्षेत्र को पुरातात्विक धरोहरों की जमीन के नीचे दबे होने की संभावना पर आरक्षित किया है। वहीं यहां एक बड़े क्षेत्र में 8-12वीं सदी यानी करीब एक हजार साल पुराने मंदिरों और शिवलिंग बिखरे हुए हैं।

इन्हें कहने को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया हुआ है और खुले आसमान के नीचे रखी गई मूर्तियों और मंदिरों के भग्नावशेष का हर 5 साल में एक बार केमिकल उपचार किया जाता है, लेकिन सही तरीके से केमिकल ट्रीटमेंट नहीं होने से 3 साल में ही धरोहरों में काई लग गई है तो घास-फूंस उग आए हैं। इसके बाद भी जिम्मेदार अफसरों को इन्हें देखने तक की फुर्सत नहीं है और अब ये धरोहर अपने अस्तित्व को बचाने लापरवाह जिम्मेदारों से मानो लड़ रहे हों। बलरामपुर कलेक्टर ने डीपाडीह स्थित पुरातात्विक धरोहरों की दुर्दशा को लेकर पुरातत्व विभाग को एक पत्र भी एक माह पहले लिखा था। कहा था कि इस पुरातात्विक स्थल को संरक्षित और सुरक्षित रखने के साथ पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का काम जिला प्रशासन द्वारा किया जाएगा।

सिर्फ एक चौकीदार के भरोसे, बिजली भी नहीं

दैनिक भास्कर टीम ने डीपाडीह पुरातात्विक स्थल का जायजा लिया तो यहां सुरक्षा के नाम पर एक चौकीदार मिला। उसने बताया 15 साल पहले चोरों ने एक मूर्ति के साथ चौकीदार के साथ मारपीट की थी। इसके बाद भी यहां न सीसीटीवी कैमरा लगा, न गनधारी जवान की तैनाती की। चारों ओर के एरिया का बाउंड्रीवाल कर अंदर सौर ऊर्जा से चलने वाले बल्ब लगाए थे, ताकि सुरक्षा में चूक न हो, लेकिन 10 साल से वे खराब पड़े हुए हैं। यहां बिजली भी नहीं पहुंचाई है। यहां 100 से अधिक मूर्तियों और अन्य पुरातात्विक धरोहरों को संग्रहालय में रखा है।

डीपाडीह सामंत राजाओं की शिव आराधना का केंद्र

माना जाता है कि यहां पर सामंत राजा और पाटलीपुत्र के राजा टांगीनाथ के बीच युद्ध हुआ था। युद्ध में सामंत राजा हार गए। ये स्थानीय किवदंती पाटलीपुत्र के पालवंश के शासकों के आक्रमण व आधिपत्य का परिचायक है। डीपाडीह सामंत राजाओं की शिव आराधना का केंद्र था।

पर्याप्त बजट के बाद भी अफसर बेपरवाह

छत्तीसगढ़ में संस्कृति और पुरातत्व विभाग में अब पुरातत्व के विशेषज्ञ और जानकार अफसर अब नहीं हैं। विभाग के अफसर भी सरकार के पास पर्याप्त बजट होने के बावजूद बेहतर काम नहीं कर पा रहा है और जिम्मेदार लापरवाही बरत रहे हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के दौरान पुरातत्व विभाग में पदस्थ रहे जानकार अफसर सेवानिवृत होने के एक दशक तक विभाग का सहयोग कर रहे थे, लेकिन अब उनके हाथ-पांव भी नहीं चल रहे हैं। विभाग में आने वाले आईएएस और आईपीएस अफसर पुरातात्विक धरोहरों को सहेजने में विफल दिख रहे हैं।

एक किमी के क्षेत्र में पड़े हैं अवशेष

डीपाडीह कन्हर नदी और गलफुला नदी के किनारे स्थित महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां एक किलोमीटर क्षेत्र में प्राचीन भग्न मंदिरों के अवशेष फैले हैं। डीपाडीह में 1986 में पुरातात्विक धरोहरों को खोदाई के बाद निकाला गया। इसमें शैव, सौर, वैष्णव, शाक्त धर्म से संबंधित अवशेष मिले। यहां के शिल्प कला में शास्त्रीय परंपरा और स्थानीय प्रवृत्तियों का सामंजस्य है। डीपाडीह के शिल्पकला में तालमान, सौंदर्य भावा-व्यक्ति और मौलिकता का संतुलन है। पुरातत्व प्रमाण के आधार पर डीपाडीह का सांस्कृतिक वैभव 8वीं सदी से 12 सदी का माना गया है।

जरूरी नहीं कि केमिकल ट्रीटमेंट के बाद काई व घास-फूंस न जमे

केमिकल ट्रीटमेंट के बाद भी धरोहरों पर काई जम जाती है, हमारे आपके घर की दीवारों पर भी काई जमती है। 5 साल के लिए भले ही हम एक बार नियम के तहत ट्रीटमेंट करते हैं। अब ट्रीटमेंट के 5 साल के भीतर काई और घास-फूंस उग गए तो, यह नेचुरल बात है। जहां तक वहां की देखरेख की बात है, तो यह जिला पुरातत्व संघ और जिला प्रशासन का काम है।-विवेक आचार्य, संचालक, संस्कृति व पुरातत्व विभाग

लापरवाह अफसरों के कारण रह गए हमारे सपने अधूरे, ये बड़ा नुकसान

हमने डीपाडीह में खनन कराया था, तब बिलासपुर से अंबिकापुर बस से जाते थे और बस बदल कर डीपाडीह, इसके बाद डीपाडीह मुख्य मार्ग में उतरने के बाद साइकिल से खनन स्थल तक जाते थे। तब हमने मंदिर का ढांचा खड़ा किया। इसके बाद मंदिरों के अवशेष को जोड़कर काफी हद तक और भी स्ट्रक्चर खड़ा हो सकता था, लेकिन खनन के बाद ऐसा नहीं किया। हमने खनन के दौरान जो सपना डीपाडीह के लिए देखा था, वह अब तक अफसरों की लापरवाही, बजट के अभाव में पूरा नहीं हो सका, जबकि डीपाडीह सरगुजा ही नहीं छत्तीसगढ़ का सबसे बड़े पुरातात्विक धरोहरों में शामिल है।-जीएल रायकवाड़, सीनियर पुरातत्ववेत्ता व डीपाडीह में खननकर्ता

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