मौत का कुआं:खुले कुएं का पानी पीकर हो रहे बीमार, बिना मुंडेर के कुएं ने 6 साल में 52 लोगों की ली जान, इनमें 33 बच्चे, बारिश में ज्यादा हादसे

अंबिकापुर2 महीने पहलेलेखक: लव दुबे
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सरगुजा संभाग के इलाके के हर दूसरे गांव में ऐसा खुला कुआं देखा जा सकता है, जो लोगों की मौत का बन रहा है कारण। - Dainik Bhaskar
सरगुजा संभाग के इलाके के हर दूसरे गांव में ऐसा खुला कुआं देखा जा सकता है, जो लोगों की मौत का बन रहा है कारण।
  • फंड का रोना रोते हैं अफसर; ज्यादातर गांवों में हैं ऐसे कुआं, चबूतरा नहीं होने से दिखाई नहीं देता, बच्चे ज्यादा हो रहे हादसे का शिकार
  • भास्कर पड़ताल: 3 दिन पहले रामचन्द्रपुर ब्लॉक के कलिकापुर में एक ऑटो कुआं गिर गया था, चाची-भतीजी की मौत

तीन दिन पहले रामचन्द्रपुर ब्लॉक के कलिकापुर में एक ऑटो के कुएं में गिरने से चाची और भतीजी की मौत हो गई थी। कुआं का मुंडेर नहीं था, जिससे तेज रफ्तार ऑटो अनियंत्रित होकर सीधे कुआं में गिर गया था। बिना मुंडेर के कुआं के कारण यह पहला हादसा नहीं है।

सरगुजा सूरजपुर और बलरामपुर जिले में बारिश शुरू होने के बाद इस तरह के कुआं में गिरने से 17 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि पिछले 6 साल में 52 लोग कुआं में गिरने से जान गवां चुके हैं। इनमें 33 बच्चे भी हैं। मामले की पड़ताल में पता चला है कि ज्यादातर मौतें बरसात के सीजन में हुई है। इस समय घास और झाड़ियां बढ़ने के बाद बिना चबूतरे के कुआं दिखाई नहीं देता है, जिससे लगातार हादसे हो रहे हैं। जिन लोगों की कुआं में गिरने से मौत हुई है, उनमें कई परिवारों का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया। बारिश शुरू होने के साथ सीतापुर इलाके में कुआं में गिरने से भाई-बहन की मौत हो गई थी। इसी तरह राजपुर, ओड़गी, बलरामपुर जिले में कुआं में गिरने से कई लोगों की जान जा चुकी है। मामले की पड़ताल में पता चला है कि ये सभी कुआं सुरक्षित नहीं थे।

दूर से नहीं दिखाई देता कुआं इसलिए हो रहा हादसा
लोगों ने अपनी जरूरत के लिए कुआं खोद दिया, लेकिन चबूतरे नहीं बनाए। कुआं पर लकड़ियां रख दी गई हैं। कहीं लकड़ियां भी नहीं हैं। कई कुआं ऐसे मिले, जो दूर से दिखाई नहीं देते हैं। रात के अंधेरे में कोई वहां से गुजरा तो बचना मुश्किल है। 10 से 12 हजार रुपए खर्च कर ऐसे कुओं की सुरक्षा के लिए चबूतरे बनाए जा सकते हैं, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

मनरेगा में खोदे गए कुओं के भी नहीं बने चबूतरे
मनरेगा से सरगुजा में एक हजार कुआं खोदा गया, लेकिन ज्यादातर कुओं के चबूतरे नहीं बनाए गए। 70 हजार रुपए से एक लाख रुपए तक एक कुएं के स्वीकृत हुए थे। पंचायतों के सचिव अपनी सफाई में अब कह रहे हैं कि कई जगह जमीन पथरीली थी, जिससे लागत अधिक लग गई। ऐसे कुओं के चबूतरे बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जल्द ही इस पर काम शुरू करा देंगे।

हर गांव में ऐसे दो से तीन कुएं या तो घर के पास या खेत में
पड़ताल में पता कि सरगुजा सहित सूरजपुर, बलरामपुर जिले के हर गांव में ऐसे दो से तीन कुआ हैं, जो बिना चबूतरे के हैं। चबूतरे नहीं होने से कुएं जहां जानलेवा हैं, वहीं दूषित पानी जाने से बीमारियाें का खतरा रहता है। वाड्रफनगर इलाके गैना गांव में उल्टी-दस्त से पिछले साल 4 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें खेत का पानी कुएं में जा रहा था। फसल में लोग कीटनाशक के अलावा खाद का उपयोग करते हैं, जिससे पानी दूषित होता है।

राशि का सही उपयोग नहीं होता, इसलिए ऐसी परेशानी
अधिकारियों का कहना है कि तेरहवें और चौदहवें मद की राशि का सही तरीके से उपयोग हो तो इस तरह की परेशानी नहीं होगी। हर पंचायत को सात लाख रुपए से बारह लाख रुपए मिलते हैं। कागजों में ग्राम सभा कर राशि खर्च कर दी जाती है। 8-10 पंचायतों में इस मद से कराए गए कामों की जांच कराई जाए तो स्थिति का पता चल जाएगा कि किस तरह से इस मद की राशि का उपयोग हो रहा है।

चबूतरे नहीं तो सुरक्षा के लिए लोहे की जाली से कराएं घेराव
घर के आसपास कुएं हैं, तो चबूतरे बनवाएं। जब तक चबूतरे नहीं बन जाते, तब तक ऐसे कुओं का सुरक्षा के मद्देनजर लकड़ी या फिर लोहे की जाली से घेराव कराएं। वहीं कुएं के पास घास और झाड़ियों की सफाई करते रहें, ताकि दूर से कुआं दिखाई दें। घर से बाहर जा रहे हैं, तो बच्चों को अकेले न छोड़ें। ज्यादातर घटनाओं में यह बात सामने आई है कि घर के लोग खेत में काम करने गए थे। घर में बच्चे अकेले थे, जो खेलते हुए कुंए में गिर गए।

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