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मन से त्यागें मृत्यु भोज:मृत्यु भोज की परंपरा निभाने में कई कर्जदार बने तो कुछ को बेचनी पड़ी जमीन

अंबिकापुर3 महीने पहले
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सगे संबंधियों की मौत का एक तरफ गम तो दूसरी ओर मृत्यु भोज का दबाव। दबाव भी ऐसा कि माली हालत अच्छी न होने पर भी समाज के चलन को निभाने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसमें न केवल साहूकारी ब्याज चुकाना पड़ता है, बल्कि कभी-कभी तो मवेशी और जमीन बेचने की भी नौबत आ जाती है। इस प्रकार के हालात समाज के हर वर्ग में बनते हैं और लोग इसे उजागर नहीं होने देते। भास्कर द्वारा मृत्यु भोज जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से ऐसे लोग अंदर ही अंदर प्रसन्न हैं, क्योंकि मृत्यु भोज का खर्च फिजूल खर्च के अलावा कुछ नहीं है। समाज के बीच से यह मांग उठने लगी है कि रूढ़िवादी यह परंपरा अब बंद होनी चाहिए। गरीबों के लिए मृत्यु भोज आर्थिक प्रताड़ना है। मृत्यु भोज बंद करना चाहिए। कई समाज आगे बढ़कर इसके लिए काम कर रहे हैं। ऐसे समाज से सभी को सीख लेनी चाहिए। इसके लिए समाज के प्रबुद्धजनों को आगे आकर लोगों को इसे बंद करने के लिए जागरूक भी करना चाहिए।

1. पति के इलाज में पैसे हो गए थे खर्च, कर्ज लेकर किया मृत्यु भोज
सूरजपुर जिले के अनतिकापुर निवासी रामचंद्र साहू का दो साल पहले निधन हो गया था। उनकी पत्नी पानपती साहू ने बताया कि पति के इलाज में परिवार टूट चुका था। उनका निधन हुआ तो मृत्यु भोज के लिए पैसे नहीं थे। लोग कहने लगे कि यह परंपरा है और मृत्यु भोज करना चाहिए। दिखावे के लिए दुकान से उधार में 15 हजार का सामान लेना पड़ा।

2. बेटे की मौत पर परिवार को समाज के डर से मृत्यु भोज देना पड़ा
सूरजपुर जिले के बिहारपुर निवासी राम शकल पंडो के बेटे की 2017 में मलेरिया से मौत हो गई थी। पूरे इलाके में मलेरिया से तब 36 लोग मर गए थे। बेटे की मौत के गम में डूबे परिवार को समाज के डर से मृत्यु भोज देना पड़ा। राम शकल ने बताया कि घर में जो कुछ था उसे बेचकर बेटे का इलाज करा दिया था। मृत्यु भोज के लिए गांव के एक व्यक्ति से पांच हजार कर्ज लेना पड़ा और हालत यह है कि तीन साल बाद भी सिर पर कर्ज है।

3. मृत्यु भोज के लिए लिया कर्ज  अब तक अदा नहीं कर सके
माझी समाज के अध्यक्ष भिंसरिया ने बताया कि लुरेना निवासी मंगला माझी और नर्मदापुर निवासी शिवनाथ ने मृत्यु भोज के लिए कर्ज लिए थे। दोनों अब तक कर्ज नहीं चुका पाए है। मंगला ने परिवार सदस्य के निधन में मृत्यु भोज के लिए 3 हजार, शिवनाथ ने दो हजार और बरिमा निवासी नइहर ने 4 हजार रुपए कर्ज लिया था।

मृत्यु भोज रूढ़िवादी परंपरा है, इस पर रोक लगाने के लिए सभी को आगे आना चाहिए
दैनिक भास्कर के अभियान से प्रभावित होकर कई लोग आगे आए हैं। उनका कहना है कि मृत्यु भोज बंद होना चाहिए। उत्तर प्रदेश ब्राह्मण समाज मनेंद्रगढ़ शाखा के मीडिया प्रभारी सतीश उपाध्याय ने कहा कि मृत्यु भोज रूढ़िवादी परंपरा है और इस पर रोक लगाने के लिए सभी को आगे आना चाहिए। अंबिकापुर निवासी बिलाल अंसारी ने कहा कि मृत्यु भोज कुप्रथा है। इसके चक्कर में गरीब और आम जनमानस को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। इसे जड़ से मिटाने की जरूरत है। नमनाकला निवासी प्रिंस चौबे भी मृत्यु भोज के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि इस पर रोक लगनी चाहिए। केदारपुर निवासी अधिवक्ता बेला कुशवाहा ने मृत्यु भोज का विरोध करते हुए कहा कि गरीबों के लिए यह आर्थिक प्रताड़ना है। मृत्यु भोज बंद होना चाहिए।

वॉट्सएप करें
यदि समाज और संगठन इस कुप्रथा को पूरी तरह बंद करने के लिए सहमत हैं तो पदाधिकारी समाज की सहमति हमें वॉट्सएप पर भेज सकते हैं। हम आपकी सहमति को प्रकाशित करेंगे जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सके। जो पदाधिकारी नहीं हैं वे भी अपनी राय दे सकते हैं। मृत्यु भोज में शामिल नहीं होने का निर्णय लेने वाले भी सिर्फ सहमत लिखकर आप हमें 9424251125 पर वॉट्सएप भेज सकते हैं।

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