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मन से त्यागें मृत्यु भोज:मृत्यु भोज की बजाय पिता के नाम से अस्पताल में 20 बेड का वार्ड बनवाया

अंबिकापुर10 महीने पहले
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समाज में मृत्यु भोज की परंपरा धीरे-धीरे कम हो रही है, पर पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। इस कुप्रथा के खात्मे के लिए जहां एक ओर कई धार्मिक व सामाजिक संगठन पहल कर रहे हैं। वहीं समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मृत्यु भोज न कर अपनों की स्मृति में समाज के लिए उपयोगी काम करा रहे हैं। इससे न केवल समाज में लोग लाभान्वित हो रहे हैं बल्कि जिनकी याद में यह काम कराए गए हैं। उन्हें सालों साल याद किया जाता रहेगा। अपनों की याद में समाजोपयोगी कार्य कराने के साथ ही वर्तमान में मृत्यु भोज न किया जाना भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे समाज के दूसरे लोगों को मृत्यु भोज न करने की प्रेरणा मिलती है। कोरोना काल में शासन प्रशासन ने भीड़ न करने के नियम को प्रभावी किया है। इसका बड़ा फायदा मृत्यु भोज न किए जाने को लेकर हुआ है। समाजसेवियों का कहना है लॉकडाउन ने मृत्यु भोज न करने का जो रास्ता दिखाया है। उस पर अमल के लिए सभी को आगे आकर पहल करनी चाहिए। समाज सेवी बोले कि मृत्यु भोज की बजाय ऐसा काम कराया जाए, जो समाज के काम आए। इससे हमेशा अपनों की याद बनी रहेगी।

1. पिता की याद में जिला अस्पताल में बनवाया था 20 बेड का वार्ड
व्यापारी सीताराम अग्रवाल ने पिता टेकचंद्र अग्रवाल की याद में तब के जिला अस्पताल और वर्तमान में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 20 बेड का वार्ड बनवाया था। तब 12 लाख रुपए से अधिक इस पर खर्च हुए थे। जिला अस्पताल होने के कारण तब अविभाजित सरगुजा जिले का यह एक मात्र बड़ा अस्पताल था। जिसमें दूर-दूर से मरीज आते थे। सीताराम वार्ड के नाम से जिला अस्पताल का यह वार्ड जाना जाता है।

2. मृत्यु भोज न कर वृद्धा आश्रम में जरूरतमंद लोगों को बांटी सामग्री 
शहर के संगम चौक निवासी ऋषि गुप्ता ने अपने पिता गुपेश्वर प्रसाद गुप्ता के निधन पर मृत्यु भोज न कर इस राशि को समाज के हित में खर्च किया। ऋषि ने बताया कि केशरवानी समाज ने मृत्यु भोज पर रोक लगा दिया है। पिता के निधन पर हमने तय किया हम समाज के लिए जो भी जरूरी होगा वह काम करेंगे। तब वृद्धा आश्रम में रहने वाले वृद्धों को कपड़े, कंबल सहित जरूरी सामान बांटा था।

3. इस कुप्रथा का विरोध करते हुए हमें इसे मन से निकालना होगा
समाजशास्त्री व केंद्रीय जेल की कल्याण अधिकारी  बानी मुखर्जी का कहना है कि लॉकडाउन में मृत्यु भोज की परंपरा भले न निभा पाए हों लेकिन इससे एक सीख जरूरी मिली है। पुरुषार्थ उस कार्य के लिए होना चाहिए जो समाज की बेहतरी के लिए हो। मृत्यु भोज की परंपरा को दैनिक भास्कर ने प्रमुखता से उठाया है जिसकी मैं आभारी हूं। इस कुप्रथा का विरोध करते हुए हमें इसे मन से निकालना होगा।

भास्कर के अभियान को सराहा, इन लोगों ने भी किया मृत्यु भोज का विरोध
दैनिक भास्कर के मृत्यु भोज अभियान का समर्थन करते हुए कई लोग इसके विरोध में आगे आए हैं। सूरजपुर साहू समाज के अध्यक्ष जोखन लाल साहू ने कहा कि मृत्यु भोज बंद होना चाहिए। जशपुर जिले के डुमरटोली निवासी विनोद कुमार भगत ने इसका विरोध किया है। सूरजपुर के केतका रोड निवासी प्रमिला अग्रवाल ने कहा है कि मृत्यु भोज कुप्रथा है और यह बंद होना चाहिए। कायस्थ सभा के सचिव अनिल कुमार सिन्हा ने कहा कि सभी को आगे आकर इसका बहिष्कार करना चाहिए ताकि नई पीढ़ी को मार्ग प्रशस्त कर सकें। मृत्यु भोज में दुख बांटना चाहिए। भोजन नहीं करना चाहिए। मृत्यु भोज कराने की बजाय गरीब और समाज के हित में काम करना चाहिए।

वॉट्सएप करें
यदि समाज और संगठन इस कुप्रथा को पूरी तरह बंद करने के लिए सहमत हैं तो पदाधिकारी समाज की सहमति हमें वॉट्सएप पर भेज सकते हैं। हम आपकी सहमति को प्रकाशित करेंगे जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सके। जो पदाधिकारी नहीं हैं वे भी अपनी राय दे सकते हैं। मृत्यु भोज में शामिल नहीं होने का निर्णय लेने वाले भी सिर्फ सहमत लिखकर आप हमें 9424251125 पर वॉट्सएप भेज सकते हैं।

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