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राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पंडो के अस्तित्व को खतरा:4 महीने में 20 पंडाे की मौत आखिर कब पहुंचेगी सरकार

अंबिकापुर11 दिन पहलेलेखक: लव दुबे
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केरल से जब एंबुलेंस से पंडो का शव आया तो तीन बेटियां बोलीं- उठ न दाऊ। - Dainik Bhaskar
केरल से जब एंबुलेंस से पंडो का शव आया तो तीन बेटियां बोलीं- उठ न दाऊ।
  • गरीबी, कुपोषण व अंधविश्वास ले रहे जान, योजना का लाभ नहीं, अफसर और जनप्रतिनिधि झांकते तक नहीं
  • लगातार हो रही मौत के बाद भी हाल जानने पंडो के गांव नहीं पहुंचे जिम्मेदार

बलरामपुर जिले के रामचंद्रपुर इलाके में चार महीने में विशेष संरक्षित पंडो जनजाति के 20 लोगों की मौत ने समाज को जहां झकझोर दिया है, वहीं इनके संरक्षण और कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाएं और सरकारी प्रयासों पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता के अलावा पंडो विकास अभिकरण के जरिए करोड़ों रुपए इनके नाम खर्च हुए और अब तक होते आ रहे हैं, लेकिन इन गांवों में रहने वालों के हालात बद से बदतर हैं।

समाज का एक बड़ा वर्ग अब भी जीवन की जरूरतों के लिए जूझ रहा है और इस संघर्ष में उनकी जान जा रही है। बरवाही, दोलंगी, त्रिशूली और कुर्लाडीह, सिलाजू, पीपरपान, पलगी, झारा, आनंदपुर में जिन लोगों की मौत हुई है, उसके पीछे गरीबी, अंधविश्वास कुपोषण जैसे बड़े कारण सामने आ रहे हैं। काम नहीं मिलने से वे पलायन कर रहे हैं।

वहीं बीमार पड़ने पर अस्पताल न जाकर जड़ी-बूटी से इलाज और झाड़फूंक करा रहे हैं। इस चक्कर मे उनका दम निकल जा रहा है। लोगों की जेहन में यह बात कूट-कूटकर भर गई है कि जो बीमार हो रहे हैं, उसे जादू-टोना किया है, इसलिए दवा काम नहीं करेगी। इसके पीछे का रीजन कहीं न कहीं फेल सिस्टम और कल्याणकारी योजनाओं का इन तक नहीं पहुंचना है।

खाद्यान योजना को ही लें तो एक रुपए किलो चावल का किसी का कार्ड नहीं हैं, तो कइयों के कार्ड गिरवी हैं। एक महिला ने 12 हजार में अपना राशन कार्ड इसलिए गिरवी रखा था, क्योंकि उसने सास के अंतिम संस्कार के लिए 12 हजार कर्ज लिए थे, जबकि उसका खुद का परिवार राशन जुगाड़ कर और कंद मूल खाकर पेट भर रहा था।

यह तस्वीर बदलनी चाहिए नहीं तो पंडो इसी तरह मरते रहेंगे?

कुर्लाडीह का एक युवक बीमार पिता के इलाज और बाद में मौत के बाद अपनी गिरवी रखी जमीन को छुड़ाने मजदूरी करने केरल गया था। उसकी 5 एकड़ जमीन 30 हजार में गिरवी है। इसके साथ परिवार के 7 सदस्यों का पेट चलाने का बोझ भी था। केरल से 8 माह बाद उसने 20 हजार घर भेजा। कुछ माह बाद खुद घर आने वाला था। परिवार खुश था कि अब उनकी जमीन छूट जाएगी, लेकिन घर में खुशी नहीं मातम पसरा।

एम्बुलेंस से जब उसका शव उतारा तो उसकी बेटियां अनजान थीं कि उनके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया है। वे पिता के शव को हिलाकर बार-बार कह रही थीं, दाऊ उठ न। यह देख पूरा गांव रो रहा था। बेटियां पिता के बारे पूछ रहीं हैं तो किसी को जवाब देते नहीं बन रहा है। हर मौत के पीछे यही दर्द है, लेकिन जिम्मेदारों को यह सब नहीं दिख रहा है। यह तस्वीर बदलनी चाहिए, नहीं तो पंडो इसी तरह मरते रहेंगे?

1952 में राष्ट्रपति ने लिया था गोद

पंडो जनजाति को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है। देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद 1952 में सरगुजा आए थे, तब उन्होंने पंडो जनजाति की हालत को देखते हुए गोद लिया था।

दम तोड़ रहे परिवारों की हालत

1.कमाने वाला चला गया अब परिवार बेसहारा

बलरामपुर जिले के कुर्लाडीह निवासी संदीप पंडो की मौत के बाद पूरा परिवार बेसहारा हो गया। संदीप की चार बेटियों के अलावा पत्नी और दो भाई है, जिनका संदीप ही सहारा था। अब घर में कमाऊ सदस्य कोई नहीं रह गया। एक तरफ मौत का गम तो दूसरी तरफ चिंता कि घर कैसे चलेगा।

2.पति व दो बेटों की मौत पत्नी के सहारे 2 बच्चे

दोलनगी में कुछ दिन पहले पंडो जनजाति एक युवक और उसके 2 बेटों की मौत हो गई थी। तीनों एनीमिक थे। अब उसकी पत्नी और बेटों का कोई सहारा नहीं है। महिला और बच्चे खुद कुपोषित हैं।

पंडो परिवार के उत्थान की सभी योजना कागजाें पर चल रहीं

1. सरगुजा संभाग में 31 हजार पंडो जनजाति की कुल आबादी: अधिकतर पर गरीबी, अशिक्षा, शराब जैसी बुराइयां और अंधविश्वास पड़ रही भारी।

2. विलुप्त न हों इसलिए, इनके परिवार नियोजन पर है रोक। इस चक्कर में 5 से 6 बच्चे हैं। अधिकतर की कम उम्र में विवाह हो जाता है।

3. सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता फिर भी बदहाली। 40 % लोगों के नहीं बने मकान। कई परिवार की हालत ऐसी कि छप्पर से झांक रही गरीबी।

4. योजना का लाभ नहीं: कई गांवों में पेयजल, सड़क और बिजली नहीं। अब भी पंडो जनजाति की ढोंढी का पानी पीने की मजबूरी।

4. योजना का लाभ नहीं: कई गांवों में पेयजल, सड़क और बिजली नहीं। अब भी पंडो जनजाति की ढोंढी का पानी पीने की मजबूरी।

5. पंडो अभिकरण: जन जागरूकता, शिविर, रोजगार के प्रशिक्षण के नाम पर हर साल 55 लाख खर्च, लेकिन धरातल पर अंधविश्वास और कुपोषण।

6. झाड़फूंक पर भरोसा: 3 दिन पहले एक पंडो ने अस्पताल में भर्ती बेटे को ऑक्सीजन निकाल यह कहकर ले गया कि जादू-टोना किया गया है।

जनजागरूकता कार्यक्रम चलाने की जरूरत: अध्यक्ष

अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह ने कहा कि पंडो जनजाति में जनजागरूकता का अभाव है। मां के पेट से लेकर मृत्युपर्यंत तक योजनाएं चल रही हैं, फिर भी इलाज की बजाय कोई झाड़-फूंक और जड़ी-बूटी खाएं, तो इसे क्या कहेंगे? कुपोषण की बात सामने आ रही है। गांव में बांटे पोषण आहार को अलग-अलग लैब में भेज रहा हूं। पानी सहित कई समस्याएं हैं और इसकी रिपोर्ट सरकार को देंगे।

अशिक्षा के कारण हावी है अंधविश्वास: प्रदेशाध्यक्ष

पंडो समाज के प्रदेश अध्यक्ष उदय पंडो के अनुसार समाज में अशिक्षा के कारण बीमार पड़ने पर झाड़-फूंक, जड़ी-बूटी से इलाज कराने में विश्वास कर रहे हैं। जागरूक नहीं होने के कारण उनका जाति प्रमाण-पत्र नहीं बन पता। इससे पढ़ाई-लिखाई, छात्रवृत्ति से लेकर नौकरी तक से वंचित हो रहे हैं। पण्डो परिवार को सबसे पहले शिक्षा से जोड़ा जाए। शिक्षा से जुड़ेंगे तो स्वत: अंधविश्वास समाप्त हो जाएगा।

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