समस्या इसलिए:न अधिग्रहण में तेजी, न सही कंपनियाें काे मिले ठेके

काेरबाएक महीने पहले
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प्रह्लाद जाेशी ने एसईसीएल के तीनाें मेगा प्राेजेक्ट गेवरा, दीपका और कुसमुंडा का निरीक्षण किया। उन्हाेंने काेयला उत्पादन, लदान और प्रेषण के सभी पहलुओं काे खुद माैके पर जाकर देखा और अफसरों से बारीकियां पूछी। करीब 3 घंटे तक वे लगातार वे कई खदानाें में पहुंचकर जानकारी जुटाते रहे।

उन्हाेंने इसके बाद अफसरों की बैठक ली। एक अधिकारी ने बताया कि बारिश से उत्पन्न हुई बाधा के अलावा जाे बड़ी समस्या है, वह 3 साल से खदानाें के लिए चिन्हांकित जमीनाें का अधिग्रहण करने में नाकामी रही है। जब काेयला खदानाें के विस्तार के लिए जमीन नहीं मिलेगी, तब जाे उपलब्ध जमीन है, उसी क्षेत्र में काेयला निकालना कठिन हाे जाता है। भू-विस्थापितों की मुआवजे और नाैकरी से जुड़ी समस्याएं नीतिगत हैं, लेकिन इन्हें हल करना जरूरी है। कुसमुंडा मेगा प्राेजेक्ट के लिए 3 दशक पहले जाे जमीन चिन्हांकित की गई थी, उसका अधिग्रहण अब जाकर प्रक्रिया में है। इसी तरह से गेवरा-दीपका के लिए किए अधिग्रहण से प्रभावित किसानाें का पुर्नवास, नाैकरी व मुआवजा का मामला भी उलझते रहा है। यही वजह है कि जब तब ये भू-विस्थापित खदानाें में काम राेक देते हैं। बुधवार काे काेयला मंत्री के प्रवास के दाैरान भी बड़ी संख्या में भू-विस्थापित दीपका-गेवरा खदान में उतर गए। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी बच्चाें काे लेकर साथ थीं। ये मशीनाें के आगे खड़ी हाे गई थीं और ब्लास्टिंग और मशीन रुकवा दिया था।

राज्य सरकाराें के साथ हाे तालमेल
प्रदेश सरकाराें के साथ काेयला मंत्रालय का बेहतर तालमेल न सिर्फ एसईसीएल की खदानाें वरन प्रदेश में देने वाले नए निजी काेल ब्लाॅक के लिए भी हाेना चाहिए। राज्य सरकार अपने यहां काेल ब्लाॅक खुलने से हाेने वाले राजस्व व पर्यावरण संरक्षण काे लेकर जाे शंकाएं जाहिर करता है, उसका निराकरण त्वरित हाे। इन बिंदुओं पर यदि गंभीरता से कदम उठाए जाएं, ताे काेयला उत्पादन में तेजी आ सकती है। हालांकि ऑन रिकार्ड न एसईसीएल प्रबंधन और न ही संबंधित मंत्रालय इस पर कुछ कहने काे तैयार हाेते हैं।

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