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नई पॉलिसी का रोड़ा:12 साल चला पिटलाइन बनाने खेल अब पूरा होने की उम्मीद ही खत्म

कोरबा4 दिन पहले
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स्टेशन में बना पिटलाइन। - Dainik Bhaskar
स्टेशन में बना पिटलाइन।
  • अब तक पिटलाइन मेें कोच होल्डिंग क्षमता 250 भी नहीं, नई पाॅलिसी के तहत 500 से अधिक होनी चाहिए
  • 5 करोड़ की पिटलाइन के लिए अब 28 करोड़ की जरूरत

पिटलाइन बनने से लंबी दूरी की नई ट्रेनों के लिए 12 साल से उम्मीद लगाए जिले के लोगों को अब नाउम्मीद होना पड़ेगा। यूं कहें कि अब पिटलाइन कोरबा के लिए सपना बन कर रह गया है तो कोई गलत नहीं होगा। इस मांग को पूरा करने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मंडल में बैठे अफसरों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया।

यही कारण है कि 12 साल तक चले खेल के बाद अब 13वें साल में नई पाॅलिसी ला दी गई है। मजेदार यह कि 5 करोड़ से शुरू हुई यह परियोजना 28 करोड़ तक की हो गई है। इस राशि को मंजूरी देने डिवीजन व जोन में बैठे अफसर बोर्ड को नहीं मना पाए। रेल खंड कोरबा से 100 किलोमीटर दूर मंडल मुख्यालय में बैठे अफसरों के रिकार्ड में वर्ष 2008-09 में शुरू हुई पिटलाइन अप्रैल 2012 में पूरी हो चुकी है। यहां सेकंडरी कोच मेंटनेंस की सुविधा भी मिल रही है। सही यह है कि पिटलाइन बनने के बाद जो संसाधन वहां जुटाए गए थे, वह भी गायब है।

पिटलाइन के बाजू में दूसरा ट्रैक जरूर बना है। इसके बाद भी किसी भी ट्रेन का मेंटनेंस नहीं होता। कभी-कभी लिंक एक्सप्रेस को वहां जरूर ठहराव दे दिया जाता है। अब यह भी साफ हो गया है, जिस उद्देश्य से पिटलाइन का निर्माण शुरू कराया था, वह अब पूरा नहीं हो पाएगा। इससे यह भी स्पष्ट है कि जो भी ट्रेन कोरबा को मिली है, उससे अधिक मिलने का रास्ता भी बंद हो गया है।

पिटलाइन पर नए अफसरों ने नहीं दिया ध्यान
रेल मामलों के जानकार और चैंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज के उपाध्यक्ष रामकिशन अग्रवाल का कहना है कि जिस अफसर ने कोरबा में यात्री ट्रेनों की संभावनाओं को देखते हुए पिटलाइन की मंजूरी दिलाई, उस प्रोजेक्ट को उनके स्थानांतरित होने के बाद जितने भी अधिकारी आए, गंभीरता नहीं लिया। सभी का ध्यान सिर्फ कोयला डिस्पैच बढ़ाने में रहा। यही कारण है कि 5 करोड़ खर्च के बाद भी अफसरों का ध्यान इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की ओर नहीं गया।

नई पॉलिसी का हवाला, जोन ने ही प्रस्ताव किया खारिज
पिटलाइन को पूरा करने 2021-22 में बिलासपुर मंडल की ओर से प्रस्ताव बनाया गया, जिसे रेलवे बोर्ड दिल्ली को भेजने से पहले जोनल मुख्यालय की मंजूरी के लिए भेजा था। यह प्रस्ताव बोर्ड को भेजने के पहले ही जोनल अफसरों ने ही नई पॉलिसी का हवाला देते हुए निरस्त कर दिया है।

एक ट्रेन के लिए दिला दी थी पिटलाइन की मंजूरी
2006 में लंबी दूरी की एक मात्र ट्रेन त्रिवेंद्रेम एक्सप्रेस को मेंटेनेंस के लिए बिलासपुर न भेजना पड़े ऐसी सोच को लेकर तत्कालीन डीआरएम आरएन बरतिया ने कोरबा में पिटलाइन को मंजूरी दिला दी थी, लेकिन उनके बाद से दर्जनों अफसर आए और गए, लेकिन किसी ने इस दिशा में सही कदम नहीं उठाया।

पिटलाइन पर नए अफसरों ने नहीं दिया ध्यान
रेल मामलों के जानकार और चैंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज के उपाध्यक्ष रामकिशन अग्रवाल का कहना है कि जिस अफसर ने कोरबा में यात्री ट्रेनों की संभावनाओं को देखते हुए पिटलाइन की मंजूरी दिलाई, उस प्रोजेक्ट को उनके स्थानांतरित होने के बाद जितने भी अधिकारी आए, गंभीरता नहीं लिया। सभी का ध्यान सिर्फ कोयला डिस्पैच बढ़ाने में रहा। यही कारण है कि 5 करोड़ खर्च के बाद भी अफसरों का ध्यान इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की ओर नहीं गया।

पिटलाइन को लेकर क्या कहते हैं सीनियर डीएमई
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के सीनियर डीएमई (वरिष्ठ मंडल यांत्रिक इंजीनियर) आर रंगा राव ने एक पत्र सीनियर डीसीएम (कोआर्डिनेशन) पुलकित सिंघल को 7 सितंबर को भेजा है। इसमें पिटलाइन का काम क्यों पेंडिंग पड़ा है, आगे क्या है, इसकी जानकारी दी गई है। राव ने कहा है कि पिटलाइन को पूरा करने वर्ष 2016 से 2020-21 के बीच 5 बार बोर्ड को प्रस्ताव भेजा, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। 2021-22 में इस प्रस्ताव को बोर्ड से पहले जोन ने ही नई पॉलिसी बताकर खारिज कर दिया है। नई पाॅलिसी यह है कि कोरबा में बनी पिटलाइन 250 से भी कम कोच होल्डिंग क्षमता वाला है, जबकि नई पाॅलिसी के तहत 500 से अधिक कोच होल्डिंग की क्षमता होनी चाहिए।

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