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राहत:कोरोनाकाल में बच्चों की सेहत सुधरी, 10 माह में 47 फीसदी बच्चे कम बीमार पड़े

बिलासपुर12 दिन पहले
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  • एक्सपर्ट डॉक्टर बोले-मास्क और हाथ धोने की आदत ने बच्चों को सर्दी-खांसी व दूसरों से फैलने वाली बीमारियों से बचाया, बाहर का खानपान कम होने से भी सेहत सुधरी

राजू शर्मा |कोरोना काल भले ही मुश्किल रहा, लेकिन बच्चों की सेहत सुधरी है। मार्च से दिसंबर 2020 तक बिलासपुर में बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। पिछले वर्ष की तुलना इन 10 महीनों में सिम्स और जिला अस्पताल की ओपीडी के आंकड़े बता रहे हैं कि 47.07 फीसदी बच्चे कम बीमार पड़े हैं। बीते वर्ष बिलासपुर में 17 हजार 222 बच्चों का इलाज किया गया, जबकि मार्च से दिसंबर 2019 में 32 हजार 495 बच्चों का इलाज किया था। गौर करें तो पिछले वर्ष के मुकाबले कोरोना-काल में 15 हजार 273 बच्चे कम बीमार पड़े हैं। एक्सपर्ट डॉक्टर डॉ. केएस ध्रुव और डॉ. श्रीकांत गिरी के मुताबिक बच्चों के कम बीमार पड़ने का कारण हमारी आदतों और रहन-सहन के तरीकों में आया बदलाव है। चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. केएस ध्रुव का कहना है कि मार्च के बाद से बड़ों के साथ बच्चों की आदतें बदलीं। बच्चे भी मास्क का उपयोग कर रहे हैं। इसी कारण सर्दी-खांसी, छींकने-खांसने से फैलने वाली बीमारियों की चपेट में आने से बच्चे बचे हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर श्रीकांत गिरी ने बताया कि मास्क और हाथ धोने की आदत बच्चों की सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच रहा है। बच्चों में ज्यादातर बीमारियां एक-दूसरों से ही फैलती हैं। स्कूल में एक क्लास में बैठने के दौरान और पास से बातचीत करने से संक्रमण फैलता है। लेकिन मार्च के बाद से ये सब बंद है। बड़ों के साथ अधिकांश बच्चे भी सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, सेनेटाइजर और हाथ धोने के प्रोटोकॉल का पालन कर रहे हैं, इसलिए कम बीमार पड़े हैं।

भीड़ से फैलने वाली बीमारियों के केस घटे
सिम्स के बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर समीर जैन ने बताया कि कोरोनाकाल में खासकर लॉकडाउन के समय बाहर का खाना नहीं मिला। अधिकांश परिवार अब भी बच्चों को बाहर का खाना या जंक फूड नहीं खिला रहे। घर पर ही हेल्दी खाना मिल रहा है। इस कारण बच्चों की सेहत बेहतर रही। भीड़-भाड़ में जाने से बचे। एक से दूसरे में फैलने वाले संक्रामक रोग में कमी आई है। बच्चों को स्कूल नहीं जाना पड़ा। पढ़ाई पर थोड़ा प्रभाव पड़ा, लेकिन मानसिक रूप से दबाव कम हुआ। खेलते-कूदते हुए बच्चों ने अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ाई की। स्कूल में अधिकांश बच्चे अपना टिफिन भी पूरा नहीं खाते। सुबह जल्दी उठने के कारण नींद पूरी न होने जैसी समस्याओं के कारण बच्चों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

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