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कोरोनाकाल में किडनी के मरीज बढ़े:सिम्स में चार गुना बढ़ी डायलिसिस, बीपी, शुगर के मरीजों को किडनी की समस्या ज्यादा

बिलासपुर19 दिन पहले
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एक्सपर्ट डॉक्टर बोले- लोगों में देर से बीमारी का पता चलना और नियमित दवाइयां नहीं खाने से हो रही समस्या - Dainik Bhaskar
एक्सपर्ट डॉक्टर बोले- लोगों में देर से बीमारी का पता चलना और नियमित दवाइयां नहीं खाने से हो रही समस्या
  • मार्च 2018 से अप्रैल 2019 तक में 510 डायलिसिस हुई थी, इस वर्ष 2053 ने कराई

कोरोनाकाल में किडनी के मरीज बढ़ रहे हैं। गंभीर बात यह है कि अधिकांश मरीजों को डायलिसिस की जरूरत पड़ रही है। इसका मुख्य कारण डॉक्टर देर से बीमारी का पता चलना और नियमित दवाइयों का सेवन नहीं करना बता रहे हैं। पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले इस वर्ष चार गुना डायलिसिस ज्यादा हुई है।

मार्च 2018 से अप्रैल 2019 में सिम्स में 510 डायलिसिस हुई थी। वहीं इस वर्ष यानी मार्च 2020 से अप्रैल 2021 तक मेडिकल कॉलेज में 2053 डायलिसिस हुई। आंकड़े बता रहे हैं कि बीते वित्तीय वर्ष के मुकाबले इस वर्ष चार गुना डायलिसिस हुई। सिम्स में डायलिसिस ज्यादा होने का एक कारण ये भी है कि अब यहां पांच मशीनों पर डायलिसिस हो रही है, जबकि पहले सिर्फ दो मशीनें थीं।

जिला अस्पताल की पुरानी बिल्डिंग को जब से कोविड हॉस्पिटल बनाया गया है, तब से इस अस्पताल में डायलिसिस बंद है। अस्पताल की तीन मशीनें सिम्स में चल रही हैं। इसलिए यहां डायलिसिस ज्यादा हो रही है। जिला अस्पताल में आने वाले मरीजों की डायलिसिस सिम्स में की जा रही है।

74 कोरोना मरीजों की हुई डायलिसिस

सिम्स में तीन मशीनें एसकेज संजीवनी प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा लगाई गई हैं। जो ओपीडी में आने वाले मरीजों की निशुल्क डायलिसिस कर रहे हैं। सालभर में 1753 लोगों की डायलिसिस कर चुके हैं। 74 कोरोना मरीज भी शामिल हैं।

टेक्नीशियन हरिशंकर कश्यप और प्रवीण सोंचे ने बताया कि हमारे पास तीन मशीन हैं, दो पर सामान्य मरीजों की डायलिसिस करते हैं। एक कोविड पॉजिटिव के लिए है। बिलासपुर अकेले नहीं कोरबा, जांजगीर, मुंगेली, रायगढ़ सहित किसी भी क्षेत्र के मरीज की निशुल्क डायलिसिस करते हैं।

केमिकल युक्त फल, सब्जियों के इस्तेमाल से भी बढ़ रही बीमारी

सिम्स के एक्सपर्ट डॉ. आशुतोष कोरी का कहना है कि पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले इस वर्ष किडनी के मरीजों की संख्या बढ़ी है। कई मरीज तो ऐसे सामने आए हैं जिन्हें पता ही नहीं था कि वे किडनी पीड़ित हैं। जांच कराने पर पता चला कि वे किडनी के मरीज हैं। मरीज नियमित दवाइयां नहीं ले रहे हैं इसलिए उन्हें डायलिसिस का सहारा लेना पड़ रहा है।

बीपी और शुगर के मरीजों में किडनी की समस्या ज्यादा पाई जा रही। केमिकल युक्त फल, सब्जियां और अन्य चीजों का इस्तेमाल करने से भी परेशानी हो रही है। केमिकल के शरीर में जाने से किडनी खराब होती जाती है और अंत में हमें डायलिसिस का सहारा लेना पड़ता है।

इन निजी अस्पतालों में है डायलिसिस की सुविधा

निजी अस्पतालों में एक बार हीमोडायलिसिस कराने पर 1500 से 2000 रुपए तक का खर्चा आता है। पेरिटोनियल डायलिसिस कराने पर 25 हजार से 30 हजार तक खर्च हो जाते हैं। शहर के अपोलो, मार्क, सन साइन, लाइफ केयर, रामणी, श्री रामकेयर, कृष्णा, वंदना, रेलवे और जे-जे हॉस्पिटल में डायलिसिस की सुविधा है लेकिन सबके रेट अलग-अलग हो सकते हैं।

जानिए कब और क्यों पड़ती है डायलिसिस की जरूरत

नेफ्रोलॉजिस्ट डॉक्टर आशीष पुरोहित ने बताया कि किडनी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। डायलिसिस से हम मरीज के शरीर से अपशिष्ट पदार्थ निकालते हैं। डायलिसिस की जरूरत किडनी (गुर्दो) के खराब हो जाने या ठीक से काम नहीं करने पर पड़ती है। इस बीमारी में मरीज को लंबे समय तक डायलिसिस करानी पड़ती है।

कुछ बीमारी में एक्यूट किडनी इंज्युरी में मरीज को कम समय के लिए डायलिसिस करानी पड़ती है। डायलिसिस दो प्रकार से की जाती है। पेरिटोनियल और हीमोडायलिसिस डायलिसिस। हीमो डायलिसिस में मशीन द्वारा खून की सफाई और मूत्र बाहर निकाला जाता है। जबकि पेरिटोनियल में पेट के अंदर डायलिसिस करने वाला साल्यूट पेरिटोनियम केविटी में डालकर कुछ समय बाद निकालते हैं।

इससे डिफ्यूजियन एक्सचेंज से खून की सफाई के साथ मूत्र निकालते हैं। हीमो डायलिसिस सस्ता और आसान पड़ता है लेकिन मरीज को अस्पताल लाने की जरूरत पड़ती है। जबकि पेरिटोनियल डायलिसिस महंगा पड़ता है पर आसानी से घर पर किया जा सकता है।

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