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निगम फेल:लार्वा कंट्रोल बंंद; 52 पार्षद बोले-फॉगिंग हो रही लेकिन मच्छरों पर असर नहीं

बिलासपुर12 दिन पहले
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  • दैनिक भास्कर ने फॉगिंग और लार्वा कंट्रोल पर सभी पार्षदों से बातचीत की

बारिश के मौसम में मलेरिया और डेंगू का खतरा खड़ा है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक जिले में जनवरी से जून 2021 तक मलेरिया के चार मरीज मिले हैं। चारों की हालत ठीक है। कोटा क्षेत्र में दो, बिल्हा में एक और एक मरीज शहरी क्षेत्र में मिला है। डेंगू की बात करें तो तीन संदेही मिले थे। तीनों का एलाइजा कराया तो रिपाेर्ट निगेटिव आई है।

साफ है कि निगम एरिया में मलेरिया और डेंगू से बचाव की जरूरत है। मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए शासन ने पहले ही अलर्ट जारी किया है, परंतु नगर निगम मक्खी, मच्छरों से बचाव के काम में पूरी तरह फेल है। मच्छरों से निबटने फाॅगिंग पर लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं, परंतु अधूरे ढंग से काम होने के कारण वह कारगर नहीं हो रहा।

अफसरों की बेफिक्री का आलम यह है कि 31 मार्च को लार्वा कंट्रोल का ठेका समाप्त हो चुका है। तब से लार्वा कंट्रोल का कार्य नहीं हो रहा है। ये बात ‘दैनिक भास्कर’ के सर्वे में निकल कर सामने आई। भास्कर टीम ने 70 वार्डों में से 65 पार्षदों से बात की।

जिसके निचोड़ यही है कि अफसरों की लापरवाही के कारण जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद हो रहा है और मच्छरों से बचाव के उपाय बेकार साबित हो रहे हैं। निगम प्रशासन की लापरवाही के चलते जनता को मच्छरों से बचाव के लिए हर महीने मच्छरनाशक अगरबत्ती एवं क्वाइल पर सैकड़ों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। राशन के साथ मच्छर से बचाव का खर्चा भी जुड़ गया है।

जानिए 56 वार्डों के पार्षदों ने क्या कहा, कैसे फेल हो गई फाॅगिंग

​​​​​​​भास्कर टीम ने नगर निगम के 70 वार्डों में से 69 से संपर्क की कोशिश की। 65 से बातचीत हुई। कांग्रेस के बहुमत वाले निगम में कांग्रेस के एक दिवंगत पार्षद को छोड़कर 37 कांग्रेस और 32 भाजपा के पार्षद हैं। 52 पार्षदों ने माना कि उनके वार्डों में फाॅगिंग मशीन का उपयोग होता है। पर पार्षदों ने यह भी बताया कि फाॅगिंग मशीन का धुआं मच्छरों पर कितना कारगर होगा, जब हफ्ते -10 दिन में एक बार नंबर लगता है।

लार्वा कंट्रोल के बारे में बहुतों को पता ही नहीं था कि ठेका 31 मार्च को समाप्त हो चुका है। सत्ता पार्टी के पार्षदों ने दलीय निष्ठा के चलते लार्वा कंट्रोल के लिए नाले, नालियों में दवा डालने की बात कही पर कईयों ने स्वीकार किया कि यह कई महीनों से बंद है। फाॅगिंग मशीन का इस्तेमाल मच्छरों को भगाने के लिए किया जाता है, यह कितना कारगर होगा?

जब 70 वार्डों के लिए निगम के पास 9 छोटी और एक बड़ी मशीन है। इसमें कुछ मशीनें वीआईपी लोगों के लिए भी जाती हैं। रेलवे के दो वार्ड को छोड़ कर हिसाब लगाएं तो एक वार्ड में फाॅगिंग मशीन हफ्ते में एक ही दिन इस्तेमाल की जा सकती है।

फाॅगिंग मशीन का फायदा तब होता जब यह हर दूसरे दिन वार्ड में इस्तेमाल होता और साथ ही साथ लार्वा कंट्रोल का काम भी चलता रहा। बिना लार्वा कंट्रोल और अधूरी फाॅगिंग से मच्छरों से बचाव की कल्पना बेमानी है।

लिक्विड, क्वाइल जनता के मासिक खर्च में जुड़ा़

मच्छरों से बचाव के लिए नगर निगम भले ही सफाई और लार्वा कंट्रोल पर भारी भरकम राशि खर्च कर रहा है। पर आम लोगों के राशन के माहवारी खर्च के साथ लिक्विड और क्वाइल अनिवार्य रूप से जुड़ गया है। बिलासपुर मर्चेंट एसोसिएशन के संरक्षक सुनील सोंथलिया के मुताबिक मच्छरों से बचाव के लिए लिक्विड और क्वाइल का शहर में 3 से 5 करोड़ माहवारी कारोबार हो रहा है। अनुमान है कि मच्छरों से बचाव के लिए हरेक परिवार को 200 से 500 रुपए महीना लिक्विड व अगरबत्ती पर खर्च करना पड़ रहा है।

फाॅगिंग का खर्च 6.71 लाख महीना

निगम कर्मी प्रदीप विश्वकर्मा के मुताबिक रेलवे के 2 वार्डों को छोड़कर शेष 68 वार्डों में फागिंग की 10 मशीनें चलाई जा रही हैं। हरेक में दवा के अतिरिक्त 6 लीटर पेट्रोल और 15 लीटर डीजल का उपयोग हो रहा है। वहीं फागिंग मशीन में डेल्टा मेथिन यूएलबी 5 परसेंट का उपयोग किया जाता है।

दवा की खपत हर महीने 40 लीटर के करीब है। इस हिसाब से डीजल, पेट्रोल व दवा पर होने वाले खर्च का हिसाब लगाएं तो हर महीने में 4500 लीटर डीजल और 1800 लीटर पेट्रोल पर क्रमश: 4.38 लाख व 1.79 लाख रुपए तथा दवा पर 56 हजार रुपए खर्च होते हैं।

3.56 करोड़ की सफाई का हिसाब, जनता की गाढ़ी कमाई में सेंध

पुराने निगम के 66 में 59 वार्डों की मैकेनिकल सफाई पर 1.50 करोड़, डोर टू डोर कचरा कलेक्शन, प्रोसेसिंग पर 1.20 करोड़ और निगम के सफाई अमले(दैनिक व टास्क कर्मी सहित) मासिक वेतन पर 80 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। यानी हर महीने 3.50 करोड़ रुपए सफाई और 6.71 लाख रुपए फॉगिंग के संचालन पर खर्च हो रहे हैं।

बावजूद इसके मच्छरों से राहत नहीं है। मच्छरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आरोप है कि फागिंग मशीन के लिए निगम के पेट्रोल पंप से दिए जाने वाले पेट्रोल व डीजल को बस कंपनियों और गैराज को बेच दिया जाता है। असल में फागिंग और दवा का छिड़काव कागजों में दिखा दिया जाता है।

लार्वा और मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए जमीनी काम हो ही नहीं रहा, इसलिए राहत की उम्मीद बेकार है? बड़ा सवाल यह है कि जब वार्ड के मुताबिक निगम के पास पर्याप्त संसाधन ही नहीं है तो मच्छरों से बचाव के नाम पर की जा रही आधी अधूरी व्यवस्था किस काम की। आखिर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा अफसरों की अदूरदर्शिता से बर्बाद हो रहा।


सीधी बात
डाॅ. ओंकार शर्मा, हैल्थ ऑफिसर, नगर निगम

लार्वा कंट्रोल मार्च से बंद

लार्वा कंट्रोल की क्या स्थिति है? -एंटी लार्वा दवा के छिड़काव का ठेका 31 मार्च के बाद नहीं हुआ। शुक्रवार को आयुक्त ने प्रत्येक जोन कमिश्नर को 1-1 लाख दवा की खरीदी के लिए स्वीकृत किए हैं। जोन कार्यालय से दवा की खरीदी के लिए टेण्डर की प्रक्रिया होगी।

फागिंग मशीन का डीजल, पेट्रोल बाजार में खप रहा?

- नहीं, ऐसा नहीं है। वार्डों में फागिंग का सत्यापन पार्षदों से कराया जाता है।

भास्कर टीम: सूर्यकांत चतुर्वेदी, अब्दुल रिजवान, दीपेंद्र शुक्ला

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