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  • Oops, Fear Of Corona And How We Have Spent Those 17 Days, We Only Know That My Daughters Supported, The Courage Was Not Lost And The Whole Family Won.

जन संकल्प से हारेगा कोरोना:उफ कोरोना का खौफ और वो 17 दिन हमने कैसेे गुजारे हैं हम ही जानते हैं मेरी बेटियों ने साथ दिया, हौसला नहीं खोया और जीत गया पूरा परिवार

बिलासपुर6 महीने पहले
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अनामिका राय, पति व बेटियों के साथ। - Dainik Bhaskar
अनामिका राय, पति व बेटियों के साथ।
  • गंभीर कोरोना संक्रमण होने के बावजूद अपनी इच्छाशक्ति से कोरोना को हराने वालों की जांबाज कहानियां पढ़िए आज तीसरी कड़ी- पति अस्पताल में स्वयं बच्चों सहित घर पर थीं

कोरोना। यह शब्द ऐसा है कि सुनते ही दिलो-दिमाग पर डर छा जाता। कोरोना का खौफ इतना बढ़ चुका था कि जहां एक मरीज मिलता उस पूरे क्षेत्र को ही पुलिस और स्वास्थ्य विभाग मिलकर कंटेनमेंट जोन बना देते थे, जहां न कोई आ सकता और न कोई कहीं जा सकता। कोरोना संक्रमित परिवार से लोग दूरी बना लेते। बात तक नहीं करते।

इसके बीच मेरे परिवार को भी यह वायरस अपनी जकड़ में ले लेगा सोचा भी नहीं था। पर ऐसा हुआ और मेरा पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आ गया। अनामिका राय, मेरे पति तथा मेरी दोनों बेटियां जिनकी उम्र महज 13 और 6 वर्ष की थी। सोच सकते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी? पति को कोविड अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। मुझे तथा मेरी बेटियों को पहले एक कोविड सेंटर में ले जाने की बात की गई। उसके बाद बताया गया कि एम्स में भर्ती करवाएंगे।

हालात ऐसे बन चुके थे कि कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करना है और कैसे करना है? लेकिन मैने स्वास्थ्य विभाग को अपनी हालत बताई कि अगर मैं किसी हॉस्पीटल में एडमिट हुई तो फिर मेरी बेटियों को बहुत परेशानी हो जाएगी। उन्होंने मेरे हालात को समझा और मुझे तथा मेरी बेटियों को घर पर ही क्वारेंटाइन कर दिया। मन में नेगेटिविटी छाने लगी थी, लेकिन मैं नर्स भी हूं इसलिए प्रण लिया कि अगर मैं ही इस तरह सोचूंगी तो फिर मेरे परिवार का क्या होगा, इसलिए नकारात्मकता को सबसे पहले अपने मन से दूर किया। लेकिन असल परीक्षा तो अब होनी थी।

क्योंकि जैसे ही घर के बाहर कोविड का पर्चा चिपकाया गया वैसे ही सारे पड़ोसियों ने ऐसे दूरी बना ली कि मानों हम लोग अचानक से अछूत हो गए हों। हालांकि हम लोग घर से बाहर नहीं निकलते थे पर पड़ोसियों ने किसी प्रकार की मदद नहीं की। मैं उनकी भी गलती नहीं मानती क्योंकि उस समय कोरोना को लेकर इतना ज्यादा डर लोगों के मन में बैठा हुआ था कि कोई चाह कर भी मदद नहीं कर सकता था। हमने कोरोना संक्रमित होने के बाद वो 17 दिन कैसे गुजारे हैं हम ही जानते हैं।

बेटियों को समझाया

बड़ी बेटी शुभांगी तो समझ रही थी लेकिन छोटी बेटी शुमोना को इसके बारे में पता नहीं था। इसलिए उसे समझाया कि कहीं बाहर नहीं जाना है। मुंह पर मास्क लगाकर रहना है। हाथ धोने हैं तथा कुछ भी चाहिए हो तो मुझे बताना है। कोरोना को लेकर लंबी-चौंड़ी गाइड लाइन थी उसका पालन करना भी जरुरी था। इसलिए सुबह से काम में लगना पड़ता था। पर मेरी दोनों बेटियों ने काफी मदद की। बड़ी बेटी खाना बनाने में मदद करती तो छोटी बेटी घर के पूरे सामान को जहां तक उसका हाथ पहुंच जाता उसे सेनेटाइज कर देती थी।

डिस्चार्ज के बाद पति ऊपरी मंजिल पर रहे सिर्फ फोन पर बात करते थे

कोविड अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मेरे पति शुभांकर राय घर पहुंचे तो उन्हें ऊपरी मंजिल पर क्वारेन्टाइन कर दिया गया। छोटी बेटी उनसे मिलने की जिद करती थी, पर मैने जाने नहीं दिया। सिर्फ पति से फोन पर ही बात करती थी। पति का खाना सीढ़ियों पर रख देती थी वह आकर ले जाते। वह अपने बर्तन गर्म पानी से धोकर वापस सीढ़ियों पर रख देते थे। हमने एक-दूसरे से कह रखा था कि गाइडलाइन का पालन पूरी तरह से करना फिर चाहे जो हो। गाइडलाइन का पालन किया तो इस कोरोना वायरस से भी जीत गए।

पिता घर के गेट पर सामान रखते और चले जाते

जब कोरोना हुआ तो कोई मदद को नहीं आया सिर्फ मेरे पिता एसआर मित्रा के अलावा। हमें कोई सामान चाहिए होता तो हम उन्हेंं बता देते थे।

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