एसईसीएल के प्रयास:खदानों में लोडिंग की प्रक्रिया बदलने की तैयारी तेज

बिलासपुर2 महीने पहले
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एसईसीएल कोरबा क्षेत्र की गेवरा, कुसमुंडा और दीपका परियोजना से तेजी से कोयला निकालने के प्रयास में जुट गई है। इसके तहत खदानों में अलग-अलग तरह की व्यवस्थाएं बनाई जा रही हंै। कहीं से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू कर रहे हैं, तो एक खदान विभागीय तौर पर चलाने का निर्णय लिया गया है।

खदानों से कोयला डिस्पैच तेज करने के लिए फर्स्ट माइल परियोजना शुरू की गई है। इस संबंध में एसईसीएल के जनसंपर्क अधिकारी सनिस चंद्रा ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कोरबा क्षेत्र की गेवरा, कुसमुंडा और दीपका की खदानों से निकलने वाले कोयला का डिस्पैच तेजी से करने के लिए फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी की 9 परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं। इस परियोजना के तहत खदानों में जहां पर कोयला की खुदाई की जा रही है उससे महज डेढ़ किलोमीटर दूर यानि फर्स्ट माइल में डंपर से कोयला अपलोड कर दिया जाएगा वहां से वह कन्वेयर बेल्ट के जरिए एक बंकर में जाएगा और वहां से सीधे ट्रेन की रैक तक पहुंच जाएगा। कोयला डिस्पैच का यह सिस्टम आने वाले समय में काफी फायदेमंद साबित होगा।

कुछ खदानों में साइलो और कुछ खदानों में रैपिड लोडिंग सिस्टम शुरू किए जा रहे हैं ये भी कुछ इसी तरह से काम करेंगे। इससे लोडिंग के लिए 20 से 30 किलोमीटर की दूरी तय करने से भी बचा जा सकेगा। समय की बचत के साथ-साथ लोडिंग अधिक होगा। कुसमुंडा में एसईसीएल विभागीय माइंस शुरू करने जा रहा है। 50 मिलियन टन की इस माइंस का पूरा ऑपरेशन एसईसीएल अपने स्तर पर करेगा। वहां पर किसी भी तरह से बाहरी दखल नहीं होगा। स्वयं की मशीनरी होगी और स्वयं ही वहां से कोयला डिस्पैच करने का काम किया जाएगा।

  • इस वर्ष एसईसीएल का उत्पादन बढ़ा है इसलिए तो पिछले तीन सालों की अपेक्षा में अक्टूबर माह के पिछले चार दिनों में एसईसीएल की खदानों से 4 लाख 8 हजार टन कोयला उत्पादन कर डिस्पैच किया गया है। जबकि पिछले सालों में यह 3 लाख 50 हजार टन और 3 लाख 25 हजार टन के आसपास ही रहा है। इससे स्पष्ट है कि उत्पादन बढ़ रहा है और डिस्पैच की भी कोई समस्या नहीं है।
  • इस वर्ष अप्रैल से सितंबर माह तक लगातार बारिश होने की वजह से खदानों में उत्पादन प्रभावित हुआ। पानी तो नहीं भरा लेकिन भारी भरकम लोडर और डंपर खदानों में नहीं जा सके लिए छोटे वाहनों व कनवेयर बेल्ट के जरिए कोयला निकाला गया। बारिश खत्म होते ही अब उत्पादन उन खदानों में भी बढ़ रहा है।
  • दीपिका-गेवरा और कुसमुंडा की खदानों के लिए अधिग्रहित 100 हेक्टेयर जमीन पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। वर्ष 2012-13 में सर्वे के बाद वहां पर बसे ग्रामीणों को मुआवजा दे दिया गया है अब वहां पर नए लोग आकर बस गए हैं। इस संबंध में 23 सितंबर को रायपुर में हुई बैठक में राज्य शासन को पत्र लिखकर अतिक्रमण हटवाने में सहयोग करने कहा गया है। शासन की मदद से अतिक्रमण हटते ही नई खदानों में खुदाई शुरू की जाएगी।
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