RSS के सच्चे सिपाही थे काशीनाथ गोरे:संघ के लिए पिता ने छोड़ी रेलवे की नौकरी, किराना दुकान चलाकर संभाला परिवार, इसी से मिली प्रेरणा

बिलासपुर3 महीने पहले
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काशीनाथ गोरे - Dainik Bhaskar
काशीनाथ गोरे

बिलासपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) पूर्व विभाग संघ चालक और वरिष्ठ समाज सेवी काशीनाथ गोरे का निधन हो गया। उनका पूरा परिवार संघ से जुड़ा रहा है। स्व. गोरे खुद बचपन से ही RSS के सक्रिय सदस्य रहे। बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ खासकर अविभाजित बिलासपुर संभाग में संघ को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि संघ पदाधिकारियों के साथ ही देश के प्रमुख नेताओं के भी वे करीबी रहे। प्रदेश के भाजपा नेताओं के लिए वे आदर्श थे और उनकी कोई भी बात टाल नहीं सकते थे।

टिकरापारा में रहने वाले 71 साल के काशीनाथ मृदुभाषी और सबको साथ में लेकर चलने वाले थे। समाज के सभी वर्गों से समान भाव रखकर आगे बढ़ने वाली सोच के साथ वे लगातार काम करते रहे। उन्होंने संघ के अनुशासन, जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करना उनकी खासियत थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में सेवा प्रमुख, प्रांत व्यवस्था प्रमुख, विभाग संचालक समेत संघ की अनेक जिम्मेदारियों को उन्होंने बखूबी निभाया। उनकी खासियत थी कि वे छोटी-छोटी बातों को लेकर भी उतनी ही गंभीरता से मार्गदर्शन देते थे। किसी भी मुलाकात करने वालों को उन्होंने निराश नहीं किया। जिसने भी मुलाकात की इच्छा जताई उन्होंने उसे पूरा समय दिया। यही उनकी अद्भुत क्षमता भी थी। उनमें खास बात यह भी कि उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज थी। इस वजह से संघ के छोटी-छोटी बात वे बताना नहीं भूलते थे। संघ में प्रवास कैसे करना, समय पर कैसे पहुंचना, काम को किस तरह पूरा करना सभी बिंदुओं को वे बारीकी से समझाते थे।

संघ के लिए पिता ने छोड़ दी नौकरी
काशीनाथ गोरे का परिवार संघ से जुड़ा था। उनके पिता यशवंत नरहर गोरे भी बचपन से संघ से जुड़े थे। वे रेलवे में कार्यरत थे। जब संघ के कार्य में उनकी केंद्र सरकार की नौकरी आड़े आई, तब उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़ दी और किराना दुकान कर परिवार का गुजारा करने लगे। लेकिन, संघ को नहीं छोड़ा। अपने पिता और परिवार के सदस्यों से प्रेरणा लेकर काशीनाथ गोरे ने संघ परिवार के लिए जीवन भर काम किया।

कुष्ठ रोगियों की भी करते रहे सेवा
काशीनाथ गोरे एक अच्छे बांसुरी वादक भी थे। वे घर में भी हंसी मजाक में ही गंभीर से गंभीर बातों को समझा देते थे। वे सभी को समान दृष्टिकोण से देखते थे। उनका संघ के सभी बड़े पदाधिकारी व भाजपा के बड़े नेताओं से सीधा जुड़ाव था। उन्होंने चांपा स्थित भारतीय कुष्ठ निवारक संघ से जुड़कर कुष्ठ रोगियों की सेवा की। वहीं, सेवा भारती नाम की संस्था से भी जुड़कर जरूरतमंदों की मदद करते रहे।

बताया जाता है कि कांशीनाथ गोरे संघ से अलग हटकर भी लोगों की मदद करते रहे हैं। मुंबई के कैंसर अस्पताल में इलाज कराने के लिए जाने वाले लोगों को सहयोग करने और परिजन को वहां नानावती धर्मशाला में ठहराने की व्यवस्था करते थे। मदद करते समय उन्होंने कभी यह ध्यान नहीं दिया कि कांग्रेसी है या भाजपाई। जो भी उनके पास जाते, सभी को बराबर मदद करते थे।

संघ को मजबूत बनाने निभाई अहम भूमिका
अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर से लेकर राज्य निर्माण के बाद और अविभाजित बिलासपुर तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की नजरों में बिलासपुर नगर और विभाग संगठन के नजरिए से टॉप पर रहा है। आपातकाल के दौरान में भी बिलासपुर नगर और विभाग में संगठनात्मक ऐसा मजबूत रहा कि सरकारी बंदिशों के बाद भी संघ के पदाधिकारी व स्वयंसेवक ना केवल सक्रिय रहे बल्कि संघ परिवार से जुड़े सदस्यों व परिवार के सदस्यों की लगातार मदद भी की। इसमें काशीनाथ गोरेनाथ की अहम भूमिका रही है। संगठन के ढांचे को मजबूत करने और पदाधिकारियों से लेकर ऐसे स्वयंसेवक बनाए, जिनकी अपनी संगठनात्मक क्षमता की प्रांत के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर अलग छवि बनाई।

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