शिक्षक दिवस पर विशेष:कोरबा का ऐसा स्कूल, जहां एक शिक्षक तीन फीट के दूसरे नेत्रहीन, पर दोनों का हौसला हिमालय से भी ऊंचा

बिलासपुर3 महीने पहलेलेखक: चंद्रकुमार दुबे
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बच्चों को पढ़ा रहे रामकुमार देवांगन जिन्हें जन्म से ही नहीं दिखाई देता। - Dainik Bhaskar
बच्चों को पढ़ा रहे रामकुमार देवांगन जिन्हें जन्म से ही नहीं दिखाई देता।
  • दर्रीपारा स्कूल में 2 दिव्यांग शिक्षक जगा रहे शिक्षा की अलख

कोरबा जिले के एक सरकारी स्कूल के दो शिक्षक बच्चों को शिक्षा की रोशनी दिखा रहे हैं। दरअसल, कोरबा जिले के विकासखंड पोड़ी उपरोड़ा के ग्राम दर्रीपारा स्थित शासकीय प्राथमिक स्कूल में दो दिव्यांग अध्यापक पदस्थ हैं। इनमें से एक रंजीत कुमार (52) का कद केवल तीन फीट चार इंच है। वे हेड मास्टर हैं। वे ठीक से खड़े नहीं हो पाते हैं। चलने के लिए दोनों पैरों पर हाथों का सहारा लेना पड़ता है। वे शरीर से दिव्यांग जरूर हैं, लेकिन उनके इरादे हिमालय से भी ऊंचे हैं।

स्कूल में गणित व अंग्रेजी खुद ही पढ़ाते हैं। पिछले 26 साल से यहां पदस्थ हैं। वहीं दूसरे शिक्षक रामकुमार देवांगन (50) हैं। वे जन्म से ही नहीं देख पाते हैं। 9 साल से यहां पदस्थ हैं। उन्हें सभी किताबों का ज्ञान है। बच्चों को ब्रेललिपि की मदद से पढ़ाते हैं। दोनों की पढ़ाई का तरीका ही अलग है। इसके कारण यहां हर साल पांचवीं बोर्ड में बच्चे 80-90% तक अंक लाते हैं।

उनकी रुचि ने विद्यालय के वातावरण को उत्तम शिक्षा के अनुकूल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बच्चों को स्कूल आने के बाद नियमित प्रार्थना, व्यायाम आदि के साथ पढ़ाई और फिर बागवानी की शिक्षा दी जा रही है। यह स्कूल किसी निजी विद्यालय के मानिंद सुंदर और आकर्षक नजर आता है।

दर्रीपारा के रामकुमार लोधी बताते हैं कि रंजीत कुमार जब 26 साल पहले उनके गांव में आए तो स्कूल की इमारत तक नहीं थी। नाममात्र बच्चे थे पर अब यहां 66 बच्चे पढ़ते हैं। पढ़ाई में सभी अव्वल दर्जे के हैं। रंजीत कुमार की ऊंचाई कम होने के कारण उन्हें पढ़ाने व ब्लैक बोर्ड में लिखने के लिए टेबल की जरूरत पड़ती है पर वे आसानी से यह काम कर लेते हैं।

पहले तबेला में लगता था स्कूल
रंजीत कुमार प्रजापति के अनुसार जब उन्होंने यहां ज्वाइन किया तो तबेला में स्कूल लगता था। इससे बच्चे पढ़ने के लिए नहीं आते थे। उन्होंने बताया कि वे सरपंच के पास गए। शिक्षा विभाग व प्रशासन के अधिकारियों से मिले और स्कूल भवन पास कराया। इस काम में दो साल लग गए। धीरे-धीरे ही सही मगर शिक्षा के स्तर में अब पूरी तरह सुधार हो चुका है। उनके स्कूल को आदर्श स्कूल का खिताब मिल चुका है।

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