प्रेम विवाह करने पर समाज से जारी हुआ फतवा:बेटे के लिए प्रिंसिपल पिता की कानूनी लड़ाई;कोर्ट ने समाज के पदाधिकारियों को भेजा नोटिस

बिलासपुर5 महीने पहले
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समाज की कुरीतियों से लड़ने प्राचार्य ने ली हाईकोर्ट की शरण। - Dainik Bhaskar
समाज की कुरीतियों से लड़ने प्राचार्य ने ली हाईकोर्ट की शरण।

बिलासपुर में पदस्थ प्राचार्य के बेटे ने दूसरी जाति की युवती से प्रेम विवाह कर लिया। इससे नाराज समाज के पदाधिकारियों ने पूरे परिवार को समाज से बाहर करने का फतवा जारी कर दिया। इतना ही नहीं, इस विवाह में शामिल होने वाले उनके रिश्तेदारों पर भी 5-5 हजार रुपए जुर्माना कर दिया। इससे परेशान प्रिंसिपल ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। कोर्ट ने महाकुल समाज के पदाधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

जशपुर जिले के पत्थलगांव निवासी महाकुल समाज के डीपी नवगवाल बिलासपुर के विनोबानगर में रहते हैं। वे गुरु नानक स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अधिवक्ता अब्दुल वहाब खान के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें बताया गया है कि उनके बेटे अंकित ने 10 दिसंबर 2020 को अंतरजातीय प्रेम विवाह किया। उसकी शादी, विवाह अधिकारी के समक्ष हुई थी। प्राचार्य नवगवाल ने शादी में महाकुल समाज के अपने रिश्तेदारों को भी बुलाया था।

शादी में शामिल होने पर रिश्तेदारों पर लगाया पांच-पांच हजार रुपए का जुर्माना
याचिका में बताया गया है कि उनके बेटे के अंतरजातीय विवाह करने की जानकारी मिलने के बाद महाकुल समाज के पदाधिकारियों ने शादी में शामिल होने वाले उनके रिश्तेदारों पर पांच-पांच हजार रुपए का जुर्माना लगाया। साथ ही प्राचार्य नवगवाल को अपने बेटे की शादी दूसरे समाज की लड़की से कराने का अपराधी मानते हुए उन्हें समाज से ही बहिष्कृत कर दिया गया।

समाज ने आयोजन में शामिल होने पर लगाया बैन
याचिकाकर्ता प्राचार्य ने बताया कि समाज के ब्लॉक अध्यक्ष हिरदयानंद बारिक व पत्थलगांव के पदाधिकारी गणेशचंद्र बेहरा ने उनके रिश्तेदारों से मिलने जुलने व कार्यक्रम में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया है। सामाजिक बंधन में बंधे उनके रिश्तेदारों ने बहिष्कार के डर से अब उन्हें अपने किसी भी आयोजन में बुलाना छोड़ दिया है। साथ ही उनके रिश्तेदारों को भी उनके किसी भी कार्यक्रम में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया है।

सामाजिक कुरीति के खिलाफ कानूनी लड़ाई जरूरी: हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया है कि आज के आधुनिक समय में इस तरह से प्रतिबंध सामाजिक कुरीति और कानूनन अपराध के दायरे में आता है। यह समाज के किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन है। याचिकाकर्ता खुद प्राचार्य हैं और उन्हें इस तरह से सामाजिक बंधन से कोई सरोकार नहीं है। लेकिन, उनके रिश्तेदारों पर जिस तरह से प्रतिबंध लगाया गया है। इसे खत्म करने के लिए उन्हें हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी पड़ी है। समाज में इस तरह की कुरीतियों को खत्म करने की जरूरत है। इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।