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भास्कर खास:कोरोना के कारण बसें बंद हुईं तो कंडक्टर कराने लगा पूजा-पाठ, ड्राइवर ने खोला टिफिन सेंटर

बिलासपुर4 महीने पहले
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  • सिटी व निजी बसों से जुडे़ 2242 लोगों के सामने परिवार पालने का संकट

संजय मिश्रा | कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से सिटी बस व निजी बस बंद हो जाने के बाद सिर्फ बिलासपुर जिले से 2242 कर्मचारियों के सामने परिवार पालने का संकट पैदा हो गया है। जिन्हें काम मिला वे कम पैसे में भी संतोष कर काम कर रहे हैं। इनमें कोई पंडिताई कर रहा है तो किसी ने टिफिन सेंटर खोल लिया। जिन्हें काम नहीं मिला वे बेरोजगार हैं। मार्च में काम छूटने के बाद चाहे सिटी बस हो या निजी बस उनके कर्मचारी कर्ज में डूब गए हैं। अधिकांश कर्मचारी अपने प्रॉविडेंट फंड से पैसे निकालकर घर का खर्च चला रहे हैं। इनमें 714 रजिस्टर्ड बसों के हिसाब से 2142 कर्मचारी निजी बस के और 100 कर्मचारी सिटी बस के हैं।

निजी एसोसिएशन ने कहा- बसें बेचने को तैयार, खरीदेगा कौन
निजी बस एसोसिएशन के अध्यक्ष भंजन सिंह ने कहा कि हालत गंभीर है। दिसंबर तक यह स्थिति रहने की बात कही जा रही है। बसों के टायर, ट्यूब व बैटरी खराब हो चुके हैं। ऑयल बदलना पड़ेगा। प्रत्येक बस के पीछे कम से कम 50 हजार रुपए मरम्मत के लिए खर्च करने पड़ेंगे। स्थिति से परेशान बस मालिक बस बेचने को तैयार हैं लेकिन खरीदेगा कौन। धमतरी में एसोसिएशन के एक पदाधिकारी ने अपनी 50 में से 27 बसें बेच दी हैं।

एक कर्मचारी आर्थिक स्थिति से तंग आकर कर चुका है सुसाइड
सिटी बस में टिकट चेकर का काम करने वाले एंथोनी नाम का कर्मचारी काम छूटने के बाद इतना परेशान था कि उसके पास घर में राशन के लिए भी पैसे नहीं थे। आखिरकार उसने स्थिति से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी।

पहले जो सीखा था अब काम आ रहा
सिटी बस में चेकर का काम कर चुके वीरेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि लॉकडाउन में कोई काम नहीं मिला तो पंडिताई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। पंडिताई में जो कुछ सीखा था वह अब काम आ रहा है। वीरेंद्र ने पंडिताई 9 वर्ष पूर्व कक्षा बारहवीं के दौरान सीख ली थी। वर्तमान में पंडिताई से वह महीने में 10 हजार रुपए कमा रहा है। वर्तमान में घर में उनके अलावा एक बहन और माता-पिता हैं। वीरेंद्र ने बताया कि वह अब वह घर पैसा नहीं भेज पा रहा है। इसके अलावा अपने प्रॉविडेंट फंड से 25 हजार रुपए निकाल चुका है।
पीएफ के पैसे से चल रहा है घर का खर्च
पुराना पाॅवर हाउस तोरवा में रहने वाले टिकट चेकर वीरेंद्र बाजपेयी का कहना है कि पिता का स्वर्गवास होने के बाद परिवार की आय का मुख्य जरिया वही हैं। मार्च में काम बंद हो जाने के बाद से वे घर पर हैं। घर में मां के अलावा छोटा भाई है। घर के खर्च के लिए प्रॉविडेंट फंड से 53 हजार रुपए निकाले हैं जिससे काम चल रहा है। वीरेंद्र कहता है कि पता नहीं कब तक यह स्थिति रहेगी। चिंता तो उस वक्त की है जब घर में रखे पैसे खत्म हो जाएंगे और घर का खर्च कैसे चलेगा।
घर के लिए मोबाइल तक बेचना पड़ गया
ड्राइवर कार्तिक नामदेव ने बताया कि मार्च में लॉकडाउन के बाद कुछ दिनों तक टिफिन सेंटर चलाया। जब वह नहीं चला तो रायपुर रूट पर अब ट्रक चला रहा हूं। महीने में उसे 9 हजार रुपए मिलते हैं जो कि पहले से कम है। कम पैसा मिलने के बावजूद काम करना मजबूरी है। मैं चार माह से घर का किराया नहीं दे पाया हूं। पैसे नहीं देने की स्थिति में मकान मालिक मेरा सामान रख सकता है। घर में पत्नी के अलावा दो बच्चे हैं जिनके लिए घर खर्च बड़ी मुश्किल से चल पा रहा है। पैसे के लिए मोबाइल तक बेचना पड़ गया।

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