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मरम्मत की मांग:सिर्फ 4 स्टाफ के भरोसे चल रहा पटना का इकलौता पशु चिकित्सालय, आए दिन गिरते रहता है छत का प्लास्टर

पटना4 महीने पहले
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इस तरह उखड़ कर गीर चुका है छत का प्लास्टर।

पटना सहित क्षेत्र के 48 गांव के पशु पालकाें की सुविधा के लिए 37 साल पहले बने पशु चिकित्सालय भवन की मरम्मत व उन्नयन कर नया भवन बनाने जिले के अफसर ध्यान नहीं दे रहे हैं। आलम यह है कि मजबूरी में खंडहर हो चुके भवन में पशु चिकित्सालय का संचालन किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर चिकित्सालय में कई पद खाली है, जिसे भरने भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

पटना क्षेत्र का इकलौता पशु चिकित्सालय पटना से कुड़ेली जाने वाले मार्ग पर 1982 में बना है। 37 साल में अब तक यहां न तो रंग-रोगन किया गया है और न ही एक बार भी भवन की मरम्मत कराई गई है। इसी वजह से भवन खंडहर हो चुका है। जगह-जगह छत का प्लास्टर गिरते रहता है। कई बार लोग इससे घायल भी हो चुके हैं। वहीं दूसरी ओर भवन की दीवारों में कई जगह दरारें भी आ चुकी हैं। इसमें लगे लकड़ी के खिड़की-दरवाजे सड़ चुके हैं। बरसात के दिनों में जगह-जगह से भवन के भीतर पानी टपकने लगता है।

पर्याप्त स्टाफ नहीं, इससे परेशानी

पशु चिकित्सालय में क्षेत्र के 48 गांव से लगभग 40 हजार से भी अधिक पशुओं को समय-समय पर रोग निदान और इलाज के लिए लाया जाता है। इनके इलाज के लिए चिकित्सालय में 11 स्टाफ होना चाहिए, लेकिन 4 स्टाफ के भरोसे ही यह पशु चिकित्सालय संचालित हो रहा है। इस पशु चिकित्सालय में एबीएफओ, ड्रेसर, चौकीदार, स्वीपर, कंपाउंडर के पद खाली हैं। खाली पदों को भरने संबंधित विभाग के अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे हैं। इससे स्टाफ के साथ क्षेत्र के पशु पालकों को परेशानी होती है।

पोस्टमार्टम में भी होती है परेशानी

किसानों के पशुओं को यदि पोस्टमार्टम कराना होता है तो वे खुद अपनी व्यवस्था करें या स्वीपर खोजकर लाएं, क्योंकि पशु चिकित्सालय में कई साल से स्वीपर नहीं हैं। पहले गांवों में भी पशु की चीर-फाड़ करने वाले रहते थे, लेकिन अब वे भी चीर-फाड़ नहीं करते। इससे किसान परेशान हैं। यही हाल इस क्षेत्र में बने महोरा और डूमरिया के पशु कृत्रिम गर्भाधान उप केन्द्रों का है, जिनका संचालन चपरासी के भरोसे हो रहा है। क्षेत्र में अगर पशुओं में बीमारी फैलती है तो बाहर से डाक्टरों की टीम आती है या फिर प्रशिक्षित गो सेवक संघ इन मामलों में मदद करते हैं। कई बार तो पोस्टमार्टम नहीं होने से मुआवजा प्रकरण भी नहीं बन पाता है।

यहीं से गोठानों का संचालन भी

क्षेत्र के गोठानों में आने वाले पशुओं की जांच, इलाज का जिम्मा भी इसी खंडहरनुमा चिकित्सालय में पदस्थ डाॅक्टर, गो सेवक, पीएआई डब्ल्यू मैत्री, एबीएफओ के जिम्मे में है। स्टाफ की कमी और अन्य सुविधाएं नहीं होने से किसान परेशान हैं।

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