वर्ल्ड रेडक्रॉस डे विशेष:जिस ब्लड बैंक में सबसे ज्यादा संसाधन, वहां प्लाज्मा व प्लेटलेट निकालने के इंतजाम नहीं

भिलाई9 दिन पहले
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10 साल से ज्यादा समय से दो प्रमुख फ्रिजर खराब, सुधारा नहीं गया - Dainik Bhaskar
10 साल से ज्यादा समय से दो प्रमुख फ्रिजर खराब, सुधारा नहीं गया

जिला अस्पताल में संचालित जिले की मदर ब्लड बैंक में सारे संसाधन होने के बाद भी इसका समुचित उपयोग नहीं किया जा रहा। इस ब्लड बैंक में 10 साल से -40 और -60 डिग्री के फ्रिजर खराब पड़े हैं, जिन्हें सुधरवाया तक नहीं गया है। इतना ही नहीं प्लाज्मा और प्लेटलेट तक यहां नहीं बन रहे। इसकी ज़रुरत पड़ने पर मरीजों या उनके परिजनों को पहले डोनर ढूंढना पड़ता है। उसके ग्रुप के डोनर मिल गए तो अगले 6 घंटे में उसे प्लेटलेट बनाकर दिया जाता है। प्लेटलेट कमी से इमरजेंसी होने पर रेफर कर दिया जाता है।

दैनिक भास्कर की पड़ताल में इसका खुलासा हुआ है। दिसंबर 2021 से अप्रैल 2022 तक यहां सिकलिंग और थैलीसीमिया के मरीजों को कुल 224 यूनिट रेड ब्लड सेल्स उपलब्ध कराए गए। इस दौरान लोगों को मात्र 21 यूनिट प्लेटलेट दी गई। बर्न मरीजों के लिए जरूरी प्लाज्मा छह महीने में एक भी यूनिट तैयार नहीं हो पाई है। जबकि इस दौरान ब्लड बैंक को कुल 2292 यूनिट ब्लड डोनेशन से मिले हैं।

दिसंबर से अब तक मिला ब्लड और अन्य कंपोनेंट की स्थिति

गर्भवती को पड़ी जरुरत, मजबूरी में अन्य अस्पताल रेफर करना पड़ा
तिरगा झोला निवासी उर्मिला देशमुख को दो दिन पहले डिलीवरी के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच करने पर प्लेटलेट निर्धारित मात्रा से कम मिली। प्रसव का दर्द शुरू होने के नाते तत्काल प्लेटलेट चाहिए थी। जिला अस्पताल में पहले से प्लेटलेट नहीं थी और एक डोनर से 40 हजार तक प्लेटलेट निकालने वाली मशीन कबाड़ हो गई थी। इसलिए इन्हें हॉयर सेंटर रेफर करना पड़ा।

7 डोनर पहुंचे तब जाकर समस्या का समाधन, फिर रेफर करना पड़ा
छावनी में रह रहे मिथलेश गायकवाड़ तेज बुखार के कारण पांच दिन पहले जिला अस्पताल भर्ती कराए गए। जांच करने पर खून की कमी के साथ ही प्लेटलेट भी कम मिली। होल ब्लड चढ़ाने के बाद भी प्लेटलेट जरूरी थी। ऐसे में उनकी बहन को 9 डोनर ढूंढने पड़े। सभी पहुंचकर ब्लड डोनेट किए तब इनके लिए प्लेटलेट मिल पाई। आगे प्लेटलेट चढ़ाने के बाद बेहतर इलाज के लिए इन्हें रायपुर भेजा गया।

इधर 224 यूनिट प्लाज्मा और प्लेटलेट का रिकार्ड नहीं
रेडक्रास सोसायटी द्वारा संचालित इस मदर ब्लड बैंक के संचालन में शनिवार को बड़ी लापरवाही भी सामने आई है। दिसबंर 21 से अप्रैल 22 के बीच 224 यूनिट प्लाज्मा और इतना ही प्लेटलेट वेस्ट हो गया। छह महीने में सिकलिंग व थैलीसीमिया के मरीजों को 224 यूनिट रेड ब्लड सेल्स दिया गया है। लेकिन रेड ब्लड सेल्स के साथ निकलने वाले इतने ही प्लाजमा व प्लेटलेट का रिकार्ड नहीं मिल रहा है। पता चला कि प्लाज्मा को एक साल तक सुरक्षित रखने वाले दोनों फ्रिजर खराब हो गए हैं। रखने का इंतजाम नहीं होने से होल ब्लड (शरीर से निकलने वाला ब्लड) से रेड ब्लड सेल निकालने के बाद बचा पार्ट बहा दिया जाता है।

जानिए हम क्यों कह रहें कि बरती गई लापरवाही

पैक्ड सेल 274 यूनिट, प्लाज्मा शून्य, संभव नहीं: कंपोनेंट या सेपरेटर मशीन एक साथ ब्लड के सभी तत्वों को अलग करती है। ऐसे में एक तत्व 274 यूनिट निकले, शेष सभी शून्य, यह हो ही नहीं सकता है।

नष्ट करने के रिकाॅर्ड में भी प्लाज्मा शामिल नहीं: ब्लड और उसके तत्वों को अलग-अलग रिकार्ड मेनटेन करना होता है। सबकी लाइफ अलग होती है। डिस्कार्ट के भी मासिक आंकड़े बनाने होते हैं। जानकारी नहीं है।

ब्लड स्टोर करने के इंतजाम नहीं हैं, यही दिक्कत
मेरी ज्वाइनिंग के पहले से प्लाज्मा स्टोर करने वाले दोनों फ्रिजर खराब हैं। इंजीनियर ने मौखिक तौर पर उन्हें कंडम घोषित कर दिया है। प्लाज्मा को फ्रिजर में रखना होता है। इंतजाम नहीं होने के कारण प्लाज्मा नहीं रखा जा सका है।
डॉ. प्रवीण अग्रवाल, नोडल ब्लड बैंक, दुर्ग

तकनीकी कारणों से प्लाज्मा दिखाया नहीं गया होगा
छह महीने में सिकलिंग व थैलीसीमिया के मरीजों को 224 यूनिट रेड ब्लड सेल हमने दिया है। हीमोग्लोबिन की कमी वाले ऐसे मरीजों को रेड ब्लड सेल ही देना होता है। तकनीकी कारणों से इसके साथ निकलने वाला प्लाज्मा हमने रिकार्ड में नहीं दिखाया है।
डॉ. नेहा बाफना, प्रभारी ब्लड बैंक दुर्ग

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