विश्व परिवार दिवस पर विशेष:भेड़ापाली, डंगबोरा, पनारी गांवों में लोगों के घर अलग पर रहते हैं सब परिवार की तरह

जांजगीर8 दिन पहले
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पहाड़ों के बीच बसा है गांव पनारी, जहां लोग खुद विवाद सुलझा लेते हैं। - Dainik Bhaskar
पहाड़ों के बीच बसा है गांव पनारी, जहां लोग खुद विवाद सुलझा लेते हैं।

जिला मुख्यालय जांजगीर से करीब 70 किमी दूर सक्ती के पास स्थिति तीन गांवों भेड़ापाली, डंगबोरा और पहाड़ों के बीच बसे गांव पनारी की अपनी विशेषता है। इन तीनों गांवों में अलग अलग जातियों के लोग निवास करते हैं। अलग अलग मान्यताएं, संस्कृति व रहन सहन, पूजा कर्म है। छोटे- छोटे मिट्‌टी के घरों के बीच कुछ लेंटर के भी घर इन दिनों बन गए हैं।

घर अलग अलग हैं तो चूल्हे भी अलग अलग जलते हैं, लेकिन खासियत यह है कि अलग- अलग जाति, धर्म के होते हुए भी यहां के लोग किसी संगठित परिवार की तरह रहते हैं। आदिवासी बाहुल्य व कम पढ़े लिखे लोगों के इस गांव में सामंजस्य ऐसा है कि चोरी, छेड़छाड़, दुष्कर्म, बलवा, हत्या जैसे गंभीर अपराध तो छोड़िए आपस में कोई विवाद तक नहीं होता, मारपीट की नौबत नहीं आती।

कभी किसी के बीच मनमुटाव हो गया तो गांव के लोग ही इसे सुलझा लेते हैं। बात अपने गांव से बाहर तक नहीं जाती है। विवाह या मृतक कर्म जैसे सुख दुख के काम में गांव वालों की संयुक्त बैठक बुलाकर संभालने की जिम्मेदारी गांव वालों को ही दे दी जाती है और जब भी किसी के यहां ऐसा कुछ हो तो पूरा गांव उस काम में लग जाता है।

न शराब पीते और ना दिवाली में जुआ खेलते
नहर के रास्ते से नीचे उतर कपर बेलाचुआ के आश्रित ग्राम डंगबोरा जब हम पहुंचे तो अपने घर के सामने हेतराम सिदार (65 साल) और सावित्री बाई बैष्णव (60 साल) बैठे थे। उन्होंने बताया कि 3 वार्डों का यह आश्रित ग्राम है, यहां घरों की संख्या करीब डेढ़ सौ होगी। आबादी लगभग 500 बताई गई। उनके अनुसार यहां मौवार जाति के लोग अधिक हैं।

इनके अलावा धनुहार, कंवर, सिदार, गोंड़, साहू, चन्नाहू और चौहान जाति के भी लोग हैं। हेतराम सिदार मूलत: डिक्सी के रहने वाले हैं। डंगबोरा उनका ससुराल है, 1984 से वे अपने परिवार के साथ यहीं रहते हैं। गांव में कभी पुलिस आई है, सा सुना तक नहीं है। सभी एक साथ मिलकर रहते हैं।

दिवाली जैसे त्योहार में जुआ नहीं खेलते। कोई इस गांव में शराब तक नहीं पिता है। सावित्री बाई ने बताया कि किसी के घर भी काम हो तो पूरा गांव सार्वजनिक रूप से मदद करता है। आप अपनी बाइक बिना ताला लगाए छोड़ दीजिए, वैसी ही पड़ी रहेगी।

पहाड़ पर बसा पनारी, तेंदू,व चार पर आश्रित
जुड़गा का आश्रित ग्राम पनारी है। यह गांव दो पहाड़ों के बीच बसा है। इस गांव तक पहुंचने के लिए पहाड़ों को काटकर सीसी रोड बनाया है। जुड़गा से पांच किमी दूर बसे इस गांव की विशेषता यह है कि यहां के लोग पहाड़ पर उगने वाले पौधों की फसल तेंदू, चार व महुआ पर आश्रित रहते हैं। इन दिनों यहां के लोग तेंदूपत्ता तोड़कर इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन आपराधिक गतिविधियां यहां बिल्कुल भी नहीं है।

प्रेमसिंह राठिया यहां सबसे अधिक पढ़े लिखे हैं। उन्होंने बीएससी तक पढ़ाई की है और वे इस गांव के मिडिल स्कूल में प्रधान पाठक हैं। उन्होंने बताया कि वे बचपन से पनारी गांव में ही रहते हैं। यहां दो वार्ड हैं करीब 60 घरों वाले इस गांव की आबादी 350 से अधिक होगी। यहां कंवर आदिवासियों की संख्या अधिक है। इनके अलावा यादव व अनुसूचित जाति के भी लोग रहते हैं। इस गांव के दोनों ओर पहाड़ है। महिलाओं ने बताया कि स्थानीय स्तर पर एक पहाड़ को पीढ़ारानी और दूसरे पहाड़ को भालूडोंगरी पहाड़ के नाम से जाना जाता है

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