खेती पर संकट:चाहिए 41 हजार टन रासायनिक खाद, जिले की 90 समितियों में सिर्फ 885 टन ही

कवर्धाएक महीने पहले
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गौठान में खरीफ फसल के लिए गोबर से जैविक खाद तैयार करती महिलाएं। - Dainik Bhaskar
गौठान में खरीफ फसल के लिए गोबर से जैविक खाद तैयार करती महिलाएं।

कबीरधाम जिले में 1 लाख से ज्यादा किसान खाद के संकट से परेशान हैं। चालू खरीफ सीजन में 41,780 टन रासायनिक खाद की जरूरत है। जबकि सरकारी नुमाइंदे इसका आधा भी नहीं जुटा पाए हैं। वर्तमान में 90 समितियों में सिर्फ 885 टन रासायनिक खाद उपलब्ध है। इधर गोबर न मिलने से सरकारी गौठानों में जैविक खाद तैयार नहीं हो पाया है।

स्टॉक में सिर्फ 8 हजार क्विंटल जैविक खाद बचा है। पखवाड़ेभर बाद यानी 15 जून से खेती जोर पकड़ने लगेगी। खेत जोताई के तुरंत बाद खाद की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में किसानों के सामने जाएं तो जाएं कहां जैसी स्थिति बन गई है। सरकारी आंकड़े देखें, तो चालू खरीफ सीजन के लिए जिले में 41,780 टन रसायनिक खाद चाहिए। इसमें यूरिया, डीएसपी, सुपर फास्फेट समेत अन्य शामिल हैं।

विपरीत इसके अभी तक सिर्फ 13,559 टन खाद का भंडारण हो पाया, जो कि कुल डिमांड का महज 32.45 फीसदी है। वहीं समितियों के जरिए 13050 टन खाद उठा चुके हैं। अब 90 समितियों में सिर्फ 885 टन खाद ही बचे हैं।

गौठानाें में सिर्फ 8 हजार क्विंटल जैविक खाद बची
किसानों को जैविक खाद (सुपर और वर्मी कंपोस्ट) उपलब्ध कराने के मामले में भी कबीरधाम जिले की स्थिति ठीक नहीं है। दुर्ग संभाग के 5 जिलों में कबीरधाम सबसे निचले पायदान पर है। चालू सीजन में किसानों को 79,587 क्विंटल जैविक खाद बांटने का लक्ष्य है। विपरीत इसके अभी तक सिर्फ 7913 क्विंटल ही बांट पाए हैं।

वहीं स्टॉक में सिर्फ 8 हजार क्विंटल जैविक खाद बचा है। यानी पूरे सीजन लक्ष्य का 20 फीसदी जैविक खाद भी किसानों को नहीं दे पाएंगे। छग सरकार की मंशा है कि किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करें। इसके लिए उन्हें जैविक खाद दिए जाएं। लेकिन जिले के 291 गौठानों में इतना जैविक खाद तैयार नहीं किए गए, जिससे कि किसानों को जैविक खाद उपलब्ध करा पाएं। अफसरों की मानें, तो गौठानों को गोबर नहीं मिल पा रहा है। क्योंकि गर्मी में लोग इसके कंडे बना रहे हैं। ताकि बरसात में उपयोग कर सके।

जैविक खाद बनाने गोबर नहीं मिल रहा: सीईओ
जिला पंचायत सीईओ संदीप अग्रवाल का कहना है कि जैविक खेती को प्रमोट करने समितियों के जरिए रसायनिक के साथ जैविक खाद किसानों को दिए जा रहे हैं। जैविक खाद का उत्पादन गोबर मिलने की मात्रा पर निर्भर है। वर्तमान में गौठानों को गोबर नहीं मिल रहा है। फिर भी अभी लगभग 8 हजार क्विंटल जैविक खाद है। हालांकि, लक्ष्य का 20 फीसदी ही किसानों को दे पाएंगे।

दो बड़ी वजह, जिससे रासायनिक खाद की किल्लत
1. रेक प्वाइंट से खाद उठाव में रुचि नहीं ले रहे अफसर: किसानों में खाद की डिमांड बढ़ गई है। समितियां खाद के लिए ऑनलाइन डिमांड भेज रहे हैं। लेकिन डीएमओ के गोदामों में पर्याप्त खाद नहीं है। ये खाद रेलवे के जरिए रेक प्वाइंट पर पहुंचता है। कवर्धा रेल लाइन से नहीं जुड़ा है। बिलासपुर, भाठापारा, तिल्दा नेवरा और राजनांदगांव रेक प्वाइंट पर खाद पहुंचा है। लेकिन अफसर उठाव में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

2. यूक्रेन युद्ध से डीएपी की सप्लाई में कमी: बताया जा रहा है कि विभिन्न तरह के रसायनिक खाद तैयार करने का फार्मूला दीगर देशों से आता है। डीएपी खाद का फार्मूला यूक्रेन से आता है। लेकिन यूक्रेन युद्ध के कारण डीएपी खाद के उत्पादन में कमी आई है। ये कमी न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि दीगर राज्यों में भी बनी हुई है। चालू सीजन में 7300 टन डीएपी चाहिए, लेकिन सप्लाई मात्र 1758 टन हुई है, जो बिक भी गई।

वह सबकुछ जो आपको जानना जरूरी है
जुताई के बाद पड़ेगी खाद की जरूरत, न मिली तो पिछड़ेगी बुआई: जून में मानसून आने के साथ ही पखवाड़ेभर बाद खेती शुरू हो जाएगी। फसल लेने खेतों की जोताई करने लगेंगे। भारतीय किसान संघ लोहारा के ब्लॉक अध्यक्ष संजय साहू बताते हैं कि जोताई के तुरंत बाद खेतों में डालने के लिए खाद की जरूरत पड़ेगी।

खाद न मिलने पर बोआई पिछड़ेगी। फसल तैयार होने में देरी होगी। इससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इससे उन किसानों को आर्थिक नुकसान होगा, जिन्होंने खेती के लिए बैंक से केसीसी ऋण लिया है। बाजार में खाद की मुनाफाखोरी बढ़ेगी: इस बार खरीफ के सीजन में खेती बचाने के किसान बाजार से खाद खरीदेंगे। सहकारी समितियों से खाद न मिलने पर व्यवसायी महंगे दाम में किसानों को रासायनिक खाद बेचेंगे। किसानों को नुकसान उठाना पड़ेगा। साथ ही इससे मुनाफाखोरी बढ़ेगी।

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