भास्कर एक्सक्लूसिवदेश के आखिरी चीते की कहानी:कोरिया के महाराजा ने 1948 में 3 मारे थे, इसके बाद भारत में खत्म हुई एशियाटिक चीतों की प्रजाति

कोरिया4 महीने पहले

भारत में 75 साल बाद चीतों की वापसी हो रही है। सन 1948 के बाद देश में चीते देखे जाने की कोई अधिकारिक सूचना नहीं है। 1952 में तो इसे शासकीय तौर पर विलुप्त अथवा भारत से प्रजाति का खत्म होना मान लिया गया था। अब अफ्रीकी देश नामीबिया से 8 चीतों को मध्यप्रदेश के कूनो पालपुर नेशनल पार्क में लाया जा रहा है।

उम्मीद है कि इसी साल 15 अगस्त तक देश में फिर चीते दिखने लगेंगे। ऐसे में यह जानना रोचक होगा कि इससे पहले आखिरी बार चीते को 1948 में छत्तीसगढ़ की कोरिया रियासत में देखा गया था। यहां के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने बैकुंठपुर से लगे जंगल में तीन चीतों का शिकार किया था। यही देश के आखिरी चीते थे। आइए इस बारे में और जानते हैं।

सरगुजा के महाराजा ने मारे थे 1170 बाघ

19वीं सदी में तत्कालीन सेंट्रल प्राविंस एंड बरार क्षेत्र की कोरिया महत्वपूर्ण रियासत थी। बैकुंठपुर इसकी राजधानी थी और शिवोमंगल सिंहदेव राजा थे। 18 नवंबर 1909 को शिवोमंगल सिंहदेव की मृत्यु के बाद उनके बड़े बेटे रामानुज प्रताप सिंहदेव रियासत के महाराज बने। बालिग होने के बाद सन 1925 से उन्होंने पूरी तरह रियासत का कामकाज संभाल लिया।

घने जंगल से घिरे इस इलाके में वन्य प्राणियों की भरमार थी। बाघ, तेंदुए, चीते जैसे खूंखार जानवरों से जंगल भरा था। राजा अपनी वीरता दिखाने के लिए इनका शिकार किया करते थे। अक्सर जंगली जानवर गांवों में आतंक मचाते, लिहाजा इनके शिकार के लिए ग्रामीण भी राजाओं से गुहार लगाते।

उस वक्त बाघों की संख्या और शिकार का सिलसिला कितना अधिक था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि, विख्यात पक्षी विशेषज्ञ सालिम अली की आत्मकथा के एक अध्याय बस्तरः1949, में उन्होंने लिखा है कि सरगुजा के महाराज ने अपने जमाने में 1170 से अधिक बाघों का शिकार किया है। सरगुजा, कोरिया से लगी हुई रियासत थी।

ऐसे किया गया था आखिरी चीतों का शिकार

कोरिया महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव भी शिकार के शौकीन थे। उन्होंने कई बाघ, तेंदुए, हिरण, चीतल, बारहसिंगा जैसे अनेक जानवर वहां के जंगलों में मारे। 1948 में वे एक रात बैकुंठपुर से लगे गांव सलखा के जंगल में शिकार करने गए थे। ग्रामीणों ने बताया था, कि वहां कोई जंगली जानवर लगातार लोगों पर हमले कर रहा था। लोग दहशत में थे।

इसी दौरान अचानक पेड़ों के बीच आंखें चमकी, महाराज निशाना लगाए हुए थे। उन्होंने उस दिशा में एक के बाद एक कई फायर किए। निशाना सटीक था। कुछ देर बाद वहां जाकर देखा गया तो तीन चीते पड़े हुए थे। तीनों नर चीते थे और पूरी तरह वयस्क भी नहीं हुए थे। महाराजा ने जैसी परंपरा थी, तीनों मृत चीतों के साथ बंदूक लिए फोटो खिंचाई।

इसी फोटो को उनके निजी सचिव ने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी में भेजा और रिकार्ड के लिए बताया कि महाराज ने तीन चीतों को मार गिराया। इसके बाद देश में कहीं भी चीते नहीं दिखे। यह अस्पष्ट, ब्लैक एंड व्हाइट फोटो ही भारत में चीतों की आखिरी तस्वीर भी है।

आखिरी चीतों पर विवाद भी

देश के तमाम दस्तावेज और वन्य प्राणियों के इतिहासकार यह मानते हैं कि आखिरी चीते वही थे, जिन्हें रामानुज प्रताप सिंहदेव ने कोरिया में मारा था। सालिम अली की आत्मकथा में भी यही तथ्य है और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी में भी। लेकिन रामानुज प्रताप सिंहदेव के पुत्र रामचंद्र सिंहदेव ऐसा नहीं मानते। उन्होंने कई अलग-अलग लोगों से बात करते हुए बताया था कि इस घटना के ढाई-तीन साल बाद उन्होंने उसी इलाके में चीते देखे थे, जहां शिकार किया गया था।

वाइल्ड लाइफ बोर्ड के पूर्व सदस्य और छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार प्राण चड्ढा बताते हैं कि रामचंद्र सिंहदेव से उनकी इस संबंध में लंबी बात हुई थी। इसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि जब मरने वाले तीनों चीते पूरी तरह वयस्क नहीं थे तो उन बच्चों के माता-पिता जंगल में क्यों नहीं मिले। रामचंद्र सिंहदेव ने यह भी कहा था कि उनके पिता को यह नहीं मालूम था कि जहां वे गोली चला रहे हैं वहां तीन चीते हैं और एक साथ मारे जाएंगे। इन चीतों के मारे जाने के स्थान और साल पर भी विवाद है। कुछ स्थानों पर उल्लेख है कि यह तीनों चीते 1947 में रामगढ़ के जंगल में मार गए थे। सलखा में महाराज ने सिर्फ एक चीते को जो आदमखोर हो गया था, उसे मारा था।

रामानुज पैलेस जहां रखी है आखिरी चीतों की ट्राफी

बैकुंठपुर के भव्य रामानुज पैलेस के अंदरूनी हिस्से के चार विशालकाय कमरे इस रियासत के महाराजाओं के अनगिनत शिकार के गवाह हैं। इस महल के वर्तमान ऑफिस वाले हिस्से में ही सामने की दीवार पर दो तेंदुए के सिर और बारहसिंगा के सिर लगे हुए हैं। अंदर के कमरों में लगी जंगली जानवरों की ट्राफियों की तो गिनती ही नहीं है।

कई बायसन, जंगली सूअर, नीलगाय, चिंकारा, हिरणों की कई प्रजातियों के दर्जनों सिर दीवार पर सजे हैं। दीवारों पर कई तेंदुए, टाइगर के सिर, उनकी खाल सहित लगे हुए हैं। इन्हीं में गैंडे, जिराफ, अफ्रीकन हाथी, लॉयन यहां तक कि हिप्पोपोटेमस तक के सिर हैं। इन जानवरों का शिकार महाराज ने देश के दूसरे हिस्सों और अफ्रीकन देशों में जाकर किया था।

यहां की विशेषता है कि सभी जानवरों की दो-दो ट्राफियां हैं। यहां साइबेरियन सफेद भालू के शरीर को पूरी तरह सुरक्षित कांच के एक बॉक्स में रखा गया है। बताया जाता है कि यहीं एक बंद कमरे में उन तीनों चीतों के सिर भी हैं, जिन्हें देश के आखिरी चीते कहा जाता है। 1952 के बाद जब यह बदनामी हुई कि कोरिया महाराज ने चीतों की पूरी नस्ल देश से खत्म कर दी तो इन ट्राफीज को फिर बाहर नहीं निकाला गया। फिलहाल इस पैलेस के एक हिस्से में रामचंद्र सिंहदेव की भतीजी अंबिका सिंहदेव निवास करती हैं। दूसरा हिस्सा बंद ही रखा जाता है।

एक समय देश में थे हजारों चीते

एक समय भारत में हजारों चीते रहा करते थे। दरअसल मुगल काल और उसके बाद भी चीतों को शिकार के लिए पाले जाने की परंपरा थी। करीब 125 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ने वाला दुनिया का सबसे तेज जानवर शिकार के काम आता था। इसे शिकार के लिए ट्रेंड किया जाता था। 16वीं सदी में अकबर के पास 1 हजार चीते होने की बात कही जाती है। इन्हें चिंकारा, काले हिरणों और मृगों के शिकार के लिए रखा गया था।

अकबर के बेटे जहांगीर ने तो इसकी संख्या 9 हजार बताई थी। उस समय के कई दस्तावेज में है कि मुगल शासक सहित सभी राजघराने शाही शिकार के लिए चीतों का इस्तेमाल करते थे। इनके खत्म होने का भी यही सबसे बड़ा कारण माना गया। ऐसा माना जाता है कि चीते किसी भी तरह कैद में रहने के दौरान वंशवृद्धि नहीं करते, लिहाजा धीरे-धीरे ये खत्म हो गए।

खाल और दांतों के लिए भी इन्हें मारा गया। हालात यह हैं कि अब ईरान और मिडिल ईस्ट व अफ्रीका के कुछ देशों के अलावा चीते कहीं नहीं बचे। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि 75 साल बाद देश में आ रहे चीते एक बार फिर यहां अपनी संख्या बढ़ाएंगे।

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