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  • 9 Thousand Families Were Rendered Homeless In Gangrel Dam, Then The Government Had Given Compensation Of Up To 50 Paise; Now The High Court Said Be Rehabilitated

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48 साल का संघर्ष:गंगरेल बांध में बेघर हुए थे 9 हजार परिवार, तब सरकार ने 50 पैसे तक का दिया था मुआवजा; अब हाईकोर्ट ने कहा- पुनर्वास हो

रायपुर । मोहम्मद निजाम/निकष परमार10 दिन पहले
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ये है वो गंगरेल जिसके डुबान में आए थे 55 गांव और 9 हजार परिवार। फोटो-भूपेश केशरवानी - Dainik Bhaskar
ये है वो गंगरेल जिसके डुबान में आए थे 55 गांव और 9 हजार परिवार। फोटो-भूपेश केशरवानी
  • भास्कर ने ग्राउंड जीरो से रिपोर्टिंग कर यह जाना कि आखिर कैसे हक की लड़ाई में 48 साल लग गए

गंगरेल बांध को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक आर्डर दिया कि जितने भी परिवार इसमें प्रभावित हुए थे, उनका व्यवस्थित पुनर्वास हो। इसका अर्थ है कि व्यवस्थित पुनर्वास हुआ ही नहीं। इस बांध को बने हुए 48 साल गुज़र गए। तब 9 हजार परिवार इसके डुबान क्षेत्र में आए थे। उनका गांव, खेत, जमीन और सबकुछ छिन गया और उस वक्त मुआवजा दिया गया किसी को 50 पैसे, किसी को 18 रुपए तो किसी को 24 रुपए। सबकुछ छिन जाने के बाद इस मुआवजे को देखकर 48 साल पहले लोगों ने संघर्ष करना शुरू किया। दो-तीन पीढ़ी बीत गई लड़ते-लड़ते, तब जाकर अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक उम्मीद का फैसला सुनाया है। अब देखना ये है कि ये व्यवस्थित पुनर्वास कैसे होता है। इस आर्डर के बाद दैनिक भास्कर की टीम ने उस ज़िंदगी की तलाश की, जिन्होंने इतने साल अपने हक की लड़ाई लड़ी। भास्कर उस हकीकत से अपने पाठकों को रू-ब-रू करा रहा है कि आखिर ये 48 साल उन्होंने कैसे बिताए, चलिए जानते हैं उन्हीं की ज़ुबानी, उनकी कहानी:-

महादेव नेताम: घर उजड़ा, सब कुछ तबाह
अरौद गांव के महादेव नेताम तब बहुत छोटे थे। उनका हंसता खेलता घर अचानक उजड़ गया। गंगरेल की तरफ इशारा करते हुए बताते हैं कि उधर मेरा घर था। नेताम का घर उजड़ जाने के कारण न तो वे खुद तालीम हासिल कर पाए। तब वे छोटे थे, तो उनके पिता-दादा लड़ रहे थे। कितना मिला, उन्हें नहीं पता और अब क्या मिलेगा ये भी समझ नहीं पा रहे।

देवीलाल: मां बेटे पर चढ़ा डेढ़ लाख का कर्ज
देवीलाल के परिवार को आज तक उनका मुआवजा 9000 रु. नहीं मिला। परिवार में मां बेटे बच गए हैं। खराब हालत है उनकी। सरकारी अनाज के भरोसे पेट भर रहे हैं। बेटा देवीलाल दिव्यांग है। दस कदम चल नहीं सकता। मां की कमर झुक गई है। अभी दो दिन पहले गणेश खापर्डे बैठक लेने अरौद पहुंचे तो मां रोने लगी। बताया कि डेढ़ लाख रुपया कर्ज हो गया है।

सुखित: पानी में डूब गए सुख के दिन
अरौद के चौक पर बिस्कुट चाकलेट की एक छोटी सी दुकान है। इसे सुखित राम नेताम चलाते हैं। उनके बुजुर्गों की बटरेल गांव में घर-बाड़ी थी। वह डूब में आई तो सात हजार रुपया मुआवजा मिला। वहां से उजड़कर वे अरौद में आकर बस गए। यहां अभी उनके पास आधा एकड़ जमीन है। उसी में खेतीबाड़ी करते हैं। दुकान है जिससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती है। और इसी के सहारे उनका आठ लोगों का परिवार है।

अपेक्षा: घर के साथ नौकरी भी मिले
कोर्ट का फैसला आने के बाद गंगरेल डूबान क्षेत्र से करीब 25 किमी दूर जोगीडीह में ग्रामीणों के व्यवस्थापन की चर्चा है। गांव वालों ने 15 फीसदी अतिरिक्त मुआवजे के लिए भी केस लगाया है। इसके अलावा वे अपेक्षा कर रहे हैं कि डूब के गांवों के बेरोजगार युवाओं को योग्यता के अनुसार भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी दी जाए क्योंकि गंगरेल का पानी भिलाई स्टील प्लांट के लिए जाता है।

कुछ तथ्य

  • 48 साल पहले डूबे 9 हजार परिवार प्रभावित हुए थे गंगरेल से
  • 55 गांव के लोगों का संघर्ष अब तक चल रहा है
  • 22 लोगों ने 1972 में जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की
  • 22 परिवारों समेत 170 लोगों को गंगरेल से 45 किमी दूर जगह मिली
  • 05 -05 एकड़ खेत मिलने की उम्मीद हाईकोर्ट के फैसले से

उम्र और वक्त के साथ बढ़ती गई फाइलों की ऊंचाई

ये हैं गणेशराम खापर्डे, जो इस लड़ाई के अगुवा रहे हैं
ये हैं गणेशराम खापर्डे, जो इस लड़ाई के अगुवा रहे हैं

गणेशराम खापर्डे, ये वो नाम है, जिन्होंने हक की आवाज बुलंद की। 70-71 में दसवीं पास की। गंगरेल से 2 किलोमीटर दूर ठेमली गांव में उनका छोटा सा परिवार था। पांच एकड़ खेत था। जिंदगी ठीकठाक कट रही थी। घर में मां थी, भाई भाभी और उनके पांच बच्चे थे। 73-74 में बांध बनना शुरू हुआ। बांध बनाने के लिए मिट्टी ठेमली गांव ली जा रही थी। गणेश के परिवार को अचानक सबकुछ छोड़कर वहां से निकलना पड़ा। ये लोग भोयना आ गए। हालांकि तब इन्हें मुआवजा मिला था करीब साढ़े चार हजार, उस दौर में यह रकम इतनी थी कि इसी पैसे से दो एकड़ जमीन खरीद ली। गुजारा मुश्किल से होता है। इसी के बाद उन्होंने सोचा कि लड़ाई लड़नी होगी। 2007 में ऐसे लोगों को तलाश किया, जो प्रभावित हुए। उन्हें इकट्ठा किया। इस तरह 866 लोगों को साथ रखकर समिति बनाई। 2008 से इस समिति ने व्यवस्थापन और वाजिब मुआवजे की मांग को लेकर केस किया। इसमें तेरह साल लग गए।

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