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शुभ संक्रांति:पूरे दिन चतुर्ग्रही योग इसलिए पुण्य भी चौगुना, पतंगबाजार हुआ गुलजार

रायपुर10 दिन पहले
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फाइल फोटो। - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो।

धर्म-अध्यात्म और पर्व-उत्सव के अलग-अलग रंगों को एकाकार किए रायपुर शहर में मकर संक्रांति मनाने का भी अनोखा अंदाज है। देश में जितनी तरह से संक्रांति मनाई जाती है, सारी परंपराएं रायपुर में देखने काे मिलती हैं। गुरुवार सुबह नदी घाटों पर पुण्य स्नान करने लोगाें की भीड़ जुटेगी तो दोपहर बाद सतरंगी पतंगों की उड़ान से आसमान भी रंगीन हो जाएगा। ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान देने का सिलसिला पूरे दिन चलता रहेगा। ज्योतिषियों के मुताबिक, सूर्य सुबह 8.13 बजे मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस दौरान गुरु, शनि और चंद्र भी मकर में ही मौजूद रहेंगे। इससे एक ओर जहां चतुर्ग्रही योग का निर्माण हो रहा है, तो दूसरी ओर गजकेसरी और नीच भंग राजयोग बन रहा है। ऐसे संयोग में स्नान-दान करने से 4 गुना अधिक पुण्यफल की प्राप्ति होती है। पुण्यकाल सुबह 8.13 से 12.30 बजे तक रहेगा, वहीं महापुण्यकाल 8.13 से 8.45 बजे तक ही रहेगा।

चमका पतंगबाजार... दुकानों में अगले 5 माह रहेगी रौनक
मकर संक्रांति के साथ पतंगबाजार भी चमक चुका है। शहर में कई जगहों पर पतंग दुकानें सज चुकी हैं। बूढ़ापारा में 50 साल से भी अधिक समय से पतंग का व्यापार कर रहे शांति गोलछा बताते हैं, बरसात को छोड़कर पूरे साल पतंग की बिक्री होती है, लेकिन कोरोना और लॉकडाउन के चलते काम मार्च 2020 के बाद पूरी तरह ठप्प हो गया था। अगस्त-सितंबर में धीरे-धीरे मांग आई, लेकिन लंबे वक्त तक काम बंद रहने की वजह से पतंग और मांझे की कीमत बढ़ गई थी। बिक्री भी कम रही। मकर संक्रांति से पहले कीमत भी कम हुई और मांग भी बढ़ी है। उम्मीद है कि अब बरसात से पहले यानी 5 माह पतंग की अच्छी डिमांड रहेगी। उनके मुताबिक मकर संक्रांति पर शहर में पतंग कारोबार 5 लाख का रहा है। आगे भी इसी तरह व्यापार की उम्मीद है।

52 वर्ष बाद बना संयोग लाएगा खुशहाली
ज्योतिषाचार्य डॉ. दत्तात्रेय होस्केरे ने बताया, 52 वर्ष बाद ऐसा संयोग बन रहा है जब चतुर्ग्रही योग के साथ गजकेसरी और नीच भंग राजयोग बन रहा है जो लोगों के जीवन में समृद्धि और खुशहाली का संकेत देता है। यह संक्रांति इसलिए भी खास है क्योंकि यह यह पौष माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को पड़ रही है। आमतौर पर ऐसा कम ही होता है। तिथि तत्व और मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ के मुताबिक सूर्य जब सुबह संक्रांति करता है तो यह राजपक्ष के साथ प्रजा के लिए भी फायदेमंद साबित होता है।

पतंग का इतिहास... दुनियाभर में कहीं शकुन-अपशकुन कहीं ईश्वर तक अपना संदेश पहुंचाने का बना जरिया
मानव की महत्वाकांक्षा को आसमान की ऊंचाइयों तक ले जाने वाली पतंग कहीं शकुन अपशकुन से जुड़ी है तो कहीं ईश्वर तक अपना संदेश पहुंचाने के माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित है। जानिए ऐसे ही 4 देशों के बारे में जिनसे जुड़ा है पतंग का इतिहास...

भारत- भगवान राम से है संबंध
बालकांड में एक चौपाई है... ‘राम इक दिन चंग उड़ाई। इंद्रलोक में पहुंची जाई’। रामचरित मानस के मुताबिक एक बार मकर संक्रांति पर श्रीराम पतंग उड़ा रहे थे। उन्होंने धागा इतना ढीला कर दिया कि पतंग देवलोक पहुंच गई थी जिसे बाद में हनुमानजी वापस लेकर आए।

चीन- सेना को सूचना भेजने इस्तेमाल
चीन में पतंग का इतिहास 24 सौ साल पुराना है। तब सेना तक महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा चीन में किंग राजवंश के शासन के दौरान उड़ती पतंग को यूं ही छोड़ देना दुर्भाग्य और बीमारी को न्यौता देने के समान माना जाता था।

कोरिया - दुर्भाग्य दूर करने के लिए लिखते थे नाम
कोरिया से भी पतंग का संबंध पुराना है। इसे अंधविश्वास कहें या लोगों की आस्था लेकिन कोरिया में पतंग पर बच्चे का जन्म और उसकी जन्मतिथि लिखकर उड़ाने की परंपरा थी। माना जाता था कि ऐसा करने से उस वर्ष उस बच्चे से जुड़ा दुर्भाग्य पतंग के साथ ही उड़ जाएगा।

थाईलैंड - प्रार्थना का जरिया
थाईलैंड में पतंग एक तरह से प्रार्थना का जरिया था। मान्यताओं के अनुसार थाईलैंड में लोग भगवान तक अपनी प्रार्थना पहुंचाने के लिए बारिश के मौसम में पतंग उड़ाते थे। कटी पतंग उठाना अपशकुन माना जाता है।

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