मौत के बाद मुक्ति का इंतजार:​​​​​​​गरियाबंद जिला अस्पताल की मोर्चुरी में न प्रभारी, न स्वीपर; शवों के लिए 5-6 घंटे इंतजार, जब सर्जन आते हैं तब खुलता है ताला

गरियाबंद7 महीने पहले
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शव पैकिंग के दौरान उपयोग में आने वाले किट, ग्लब्स, मास्क और मेडिकल वेस्ट को मोर्चरी के कैंपस में ही फेंक दिया जाता है। इससे संक्रमण का खतरा बना हुआ है।  - Dainik Bhaskar
शव पैकिंग के दौरान उपयोग में आने वाले किट, ग्लब्स, मास्क और मेडिकल वेस्ट को मोर्चरी के कैंपस में ही फेंक दिया जाता है। इससे संक्रमण का खतरा बना हुआ है। 

छत्तीसगढ़ में फैले कोरोना संक्रमण और बढ़ते मौत के आंकड़ों के बीच जुगाड़ का शव प्रबंधन चल रहा है। पढ़ने में यह थोड़ा अजीब और बुरा है, लेकिन गरियाबंद जिला अस्पताल के हालात यही हैं। अस्पताल की मोर्चरी में न कोई प्रभारी है और स्वीपर। हर ओर शवों की पैकिंग के कचरे का ढेर है। जब सर्जन आते हैं तो ताला खुलता है। ऐसे में कोई शव आता है या परिजनों को सौंपा जाता है तो CHC से स्वीपर को बुलाना पड़ता है। फिर एंबुलेंस का इंतजार। ऐसे में 5 से 6 घंटे बाद ही परिजनों को शव मिलता है।

जब सर्जन आते हैं तो ताला खुलता है। ऐसे में कोई शव आता है या परिजनों को सौंपा जाता है तो CHC से स्वीपर को बुलाना पड़ता है। फिर एंबुलेंस का इंतजार। ऐसे में 5 से 6 घंटे बाद ही परिजनों को शव मिलता है।
जब सर्जन आते हैं तो ताला खुलता है। ऐसे में कोई शव आता है या परिजनों को सौंपा जाता है तो CHC से स्वीपर को बुलाना पड़ता है। फिर एंबुलेंस का इंतजार। ऐसे में 5 से 6 घंटे बाद ही परिजनों को शव मिलता है।

शवों के साथ बढ़ती है मुश्किलें, हर बार दौड़ लगाता है CHC का स्वीपर
दरअसल, जिला अस्पताल की मोर्चरी में शवों को रखने और उठाने के लिए पीपरछेड़ी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से स्वीपर को बुलाना पड़ता है। कचना धुरवा के पास सोमवार सुबह सड़क हादसे में दो लोगों की मौत हो गई। उनके शव सुबह 9 बजे पहुंचे। उन्हें रखने के लिए CHC से स्वीपर बुलाना पड़ा। कुछ देर बाद एक नव विवाहिता का शव पहुंच गया। ऐसे में फिर स्वीपर पहुंचा। इसके चलते तीन शवों के पोस्टमार्टम ही दोपहर बाद तक हो सका।

पोस्टमार्टम के बाद शव लेने के लिए परिजन लगाते रहते हैं चक्कर
अस्पताल की मोर्चरी में शाम 5.30 बजे तक संक्रमण से मरने वाले 7 मरीजों सहित 10 शव पहुंच गए। ऐसे में सिविल सर्जन जीएस टंडन को बुलाना पड़ा। जब वे नहीं होते तो प्रबंधक व्यवस्था करते हैं। तब तक परिजन चक्कर लगाते रहते हैं। परिजन खुद ही शवों की पैकिंग भी करते थे। इसी कारण 21 अप्रैल को बरहबली के जयराम नेताम की मौत के बाद अंतिम संस्कार में 50 घंटे से ज्यादा लग गया। इसके बाद 23 अप्रैल को दो लोगों की नियुक्ति की गई।

एक मात्र शव वाहन मुक्तांजली के तहत संचालित है। इसके कारण परिजनों को जब घंटों के इंतजार के बाद शव मिलता है तो उसे ले जाने के लिए वाहन नहीं होता। यह देखकर युवाओं के एक समूह ने बोलेरो पिकअप की निशुल्क व्यवस्था की है।
एक मात्र शव वाहन मुक्तांजली के तहत संचालित है। इसके कारण परिजनों को जब घंटों के इंतजार के बाद शव मिलता है तो उसे ले जाने के लिए वाहन नहीं होता। यह देखकर युवाओं के एक समूह ने बोलेरो पिकअप की निशुल्क व्यवस्था की है।

मेडिकल वेस्टेज की मॉनिटरिंग नहीं, युवाओं ने की शव वाहन की व्यवस्था
जिला अस्पताल में एक मात्र शव वाहन मुक्तांजली के तहत संचालित है। इसके कारण परिजनों को जब घंटों के इंतजार के बाद शव मिलता है तो उसे ले जाने के लिए वाहन नहीं होता। यह देखकर युवाओं के एक समूह ने सोमवार से एक बोलेरो पिकअप की निशुल्क व्यवस्था की है। वहीं शव पैकिंग के दौरान उपयोग में आने वाले किट, ग्लब्स, मास्क और मेडिकल वेस्ट को मोर्चरी के कैंपस में ही फेंक दिया जाता है। इससे संक्रमण का खतरा बना हुआ है।

जिला अस्पताल के मोर्चरी के लिए पीपरछेड़ी के स्वीपर को व्यवस्था में रखा गया है। मोर्चरी के लिए अलग से एक जवाबदारी तय करना होगा। शव पैकिंग के लिए दो लोगो की नियुक्ति जीवनदीप समिति से की है। जल्द ही व्यवस्था को और सुधारेंगे।
- डॉ. जीएस टंडन, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल, गरियाबंद

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