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अब कहां जाएं मरीज?:2700 आबादी वाले गांव में एक नर्स के सहारे अस्पताल की जिम्मेदारी, उसकी मौत हुई तो डेढ़ महीने से हॉस्पिटल भी बंद

राजिमएक महीने पहले
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राजिम के बरोण्डा गांव में ग्रामीणों की मांग पर अस्पताल तो बनाया गया, लेकिन उसकी जिम्मेदारी सिर्फ एक नर्स के ही सहारे थी। अब उस नर्स का आकस्मिक निधन हो गया है, जिसके कारण अस्पताल डेढ़ महीन से बंद है। - Dainik Bhaskar
राजिम के बरोण्डा गांव में ग्रामीणों की मांग पर अस्पताल तो बनाया गया, लेकिन उसकी जिम्मेदारी सिर्फ एक नर्स के ही सहारे थी। अब उस नर्स का आकस्मिक निधन हो गया है, जिसके कारण अस्पताल डेढ़ महीन से बंद है।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ता है, उसकी बानगी एक बार और देखने को मिली है। जहां राजधानी रायपुर से लगे हुए इलाके में ही स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। पूरा मामला राजिम के बरोण्डा गांव का है, जहां डेढ़ महीने से उप स्वास्थ्य केंद्र ही बंद पड़ा है।

इतना ही नहीं मामले में एक और हैरान कर देने वाली बात भी सामने आई है। बताया गया है कि 2700 आबादी वाले इस गांव के अस्पताल में पहले भी सिर्फ एक ही नर्स थी, जिस पर अस्पताल की जिम्मेदारी थी, लेकिन अब उसका निधन हो गया है। जिसके कारण अस्पताल ही बंद है और लोगों को इलाज करवाने भारी परशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

कोरोना संक्रमण के चलते अस्पताल में लोगों को वैक्सीन लगाया जा रहा है।
कोरोना संक्रमण के चलते अस्पताल में लोगों को वैक्सीन लगाया जा रहा है।

कोरोना का टीका लगाया जा रहा

जानकारी के मुताबिक गरियाबंद जिले में राजिम से 6 किलोमीटर दूर पर बरोण्डा गांव है, यहं की आबादी 2700 है। जिसके चलते ही लोगों ने विशेष मांग कर किसी तरह से गांव में अस्पताल बनवाया था। लेकिन अस्पताल में सिर्फ एक ही नर्स की ड्यूटी लगी थी। नर्स के सहारे ही पूरे अस्पताल की जिम्मेदारी थी। इस बीच डेढ़ महीने पहले ही उस नर्स की अचानक मृत्यु हो गई। जिसके बाद से ही अस्पताल लोगों के लिए बंद है और किसी तरह की हेल्थ सुविधाएं ग्रामीणों को नहीं मिल रही हैं। हालांकि अस्पताल में कोरोना संक्रमण के चलते कोरोना का टीका लगाने का काम जरूर किया जा रहा है।

2005 में बना था अस्पताल

वहीं ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल के बंद होने से उन्हें निजी अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है। अस्पतालों में फीस भी ज्यादा ली जाती है, जिसके चलते परेशानी है। हमारी आर्थिक स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं कि हम बार बार प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवा सकें। ग्रामीणों ने बताया कि 2005 में काफी मांग के बाद प्रशासन ने बड़ी मुश्किल से इस अस्पताल को बनाया था और एक मात्र नर्स की सुविधा मिली थी। जिससे लोगों को बीमार होने पर इधर-उधर न भटकना पड़े। पर नर्स की भी अचानक मृत्यु हो गई। गांव के पुरुषोत्तम सेन, डोमार ध्रुव, भुवनेश्वर सिन्हा समात तमाम ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग से जल्द स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति की मांग की है।

कोरोना और टीकाकरण के चलते स्टाफ की कमी

इधर पूरे मामले को लेकर BMO डॉ.पी.के कुदेशिया ने बताया कि नर्स के निधन के बाद से किसी की नियुक्ति नहीं की गई है। कोरोना और टीकाकरण के चलते कर्मचारियों की कमी थी, जिसके कारण भी गांव में नियुक्ति नहीं हो पा रही थी। लेकिन अब स्थिति सामान्य हो गई है, अब मेल और फीमेल हेल्थ वर्करों को बरोण्डा भेजा जाएगा।

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