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मर्यादा महोत्सव:आज्ञा, मर्यादा, आचार्य, गण व धर्म; इन सभी की आराधना आवश्यक है: आचार्य महाश्रमण

रायपुर15 दिन पहले
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जैन मानस भवन में आचार्य महाश्रमण संबोधित करते हुए। - Dainik Bhaskar
जैन मानस भवन में आचार्य महाश्रमण संबोधित करते हुए।
  • जैन मानस भवन में तेरापंथ धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव का तीसरा दिन

जो व्यक्ति सुभाषितों को सुनकर, जिनेश्वर भगवान की वाणी को सुनकर, जानकर आचार्य गुरु के प्रति सुश्रुषा का भाव रखता है और गुरु की सेवा करता है, अनेक गुणों की आराधना करता है वह अनुत्तर सिद्धि को प्राप्त होता है।

यह बातें जैनम मानस भवन में आयोजित तेरापंथ धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव के तीसरे दिन आचार्य महाश्रमण ने कही। उन्होंने आगे कहा कि हमारा यह धर्मसंघ भी आगम के सुभाषितों का अनुसरण करता है और सभी में आचार्य के प्रति सुश्रुषा सेवा की भावना भी देखने को मिलती है।

अनेक गुणों की आराधना भी हो रही है मतलब हमारा यह धर्मसंघ भी अनुत्तर गति की ओर गतिशील है। हमारे धर्मसंघ में पांच मुख्य बातें हैं जिनकी सभी को शरण स्वीकार करनी चाहिए, अनुपालन करना चाहिए। पहली है आज्ञा, मर्यादा, आचार्य, गण और धर्म। सभी इन पांच आराधना और अनुपालन करें यह आवश्यक है। जिनेश्वर देव तीर्थंकरों की जो आज्ञा है, उनकी वाणी आगम है वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है। साधना का आगम एक बहुत बड़ा आधार है। जिस प्रकार भोजन शरीर की खुराक होती है उसी प्रकार आगम स्वाध्याय हमारे संयम जीवन की खुराक है।

गुरु के प्रति सदा समर्पण का भाव रखें
आचार्य ने कहा कि आगम जो आज्ञा है उसकी आराधना करें। गुरु आज्ञा की आराधना करें। सभी में आचार्य के इंगित व आदेश के प्रति जागरूकता होनी चाहिए। आज्ञा और मर्यादा के सम्यक अनुपालन का सभी के भीतर भाव रहना चाहिए। गुरु के प्रति सदा समर्पण का भाव रहे। गुरु जहां रखें वहां जाने को तैयार हो जाना यह भी संघ की एक मर्यादा है।

हमारे कार्य ऐसे होने चाहिए जिससे संघ का विकास हो, संघ की महिमा बड़े। गण के प्रति श्रद्धा, निष्ठा के भाव हमारे भीतर रहने चाहिए। चाहे कितनी भी कठिनाई या विपदा आ जाए परंतु धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। पांच महाव्रत, पांच समितियां और तीन गुप्ति यह तो एक साधु का मूल होते हैं। उनके पालन के प्रति सदा जागरूकता रहे। आज्ञा मर्यादा की आराधना में जितनी जागरूकता रहेगी वह हमारे लिए कल्याणकारी हो सकती है।

जो हाथ सेवा में लगते हैं वो पवित्र हो जाते हैं : आचार्य
आचार्य महाश्रमण ने बताया कि संयम पुष्ट रखने के लिए आगम स्वाध्याय बहुत महत्वपूर्ण है। साधु-साध्वियों में आगम स्वाध्याय का रुझान रहना चाहिए। आगम हमारे हाथों में रहे यह हमारे हाथों की शोभा है। सेवा भी हाथों की शोभा होती है। जो हाथ किसी की सेवा में लगते हैं वो पवित्र हो जाते हैं। रोज जितना हो सके हमारा समय स्वाध्याय में लगना चाहिए।

आगम ज्ञान से मस्तिष्क की भी शोभा हो जाती है। शास्त्र को समझने और अर्थबोध को जानने का प्रयास हो तो बहुत अच्छा हो सकता है। आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ ने जो आगम संपादन का कार्य चालू किया उसके अंतर्गत कितने आगम आज हमारे समक्ष अनुवादित है जिनका हम पाठन और स्वाध्याय कर सकते हैं। श्रावक समाज भी ध्यान दें, जितना हो सके तत्वज्ञान को समझें और अपने सम्यक्त्व को पुष्ट करें।

आचार्य महाश्रमण से मिले मंत्री सिंहदेव
आचार्य महाश्रमण से मुलाकात करने गुरुवार को स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने मुलाकात की। उन्होंने जैन मुनियों की चर्या और संयम पथ के बारे में जाना और कहा कि आपके त्याग के आगे हम नतमस्तक है। आचार्य प्रवर ने उन्हें आचार्य तुलसी के अणुव्रत नियमों के पालन के लिए प्रेरित किया। इस मौके पर मर्यादा महोत्सव समिति ने मंत्री सिंहदेव को प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया। इस दौरान समिति के अध्यक्ष महेंद्र धाड़ीवाल, महामंत्री नरेंद्र दुग्गड़, पारस लुंकड, सुनील दुग्गड़ आदि मौजूद रहे।

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