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दहशत का दौर है... चार कांधे भी नहीं मिल रहे:टीबी से मौत हो गई, पत्नी 5 घंटे गुहार लगाती रही, कोरोना के डर से कोई नहीं आया; भतीजे ने अकेले ही शव मुक्तिधाम पहुंचाया

​​​​​​​महासमुंद4 महीने पहले
‘तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नहीं देते, हमारे गांव छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं...’ यह शेर मशहूर शायर मुनव्वर राना का है, लेकिन कोरोना के दौर ने इसे कितना बदल दिया।

कोरोना ने दिलों में इस तरह डर भर दिया है कि लोग एक-दूसरे के दुखों में भी साथ नहीं दे रहे। ये ऐसा दौर है, जब मौत पर एक कांधा भी मुश्किल से मिलता है। ये तस्वीर छत्तीसगढ़ से सटे ओडिशा के पदमपुर की है। यहां टीबी के कारण पुनऊ माझी की मौत हो गई। वो 15 दिन से अस्पताल में थे। उनकी पत्नी 5 घंटे तक लोगों से मदद की गुहार लगाती रही, लेकिन कोई नहीं आया। फिर भतीजा पहुंचा और उसने अकेले ही शव उठाकर मुक्तिधाम तक पहुंचाया।

दूसरी जाति में शादी की थी तो समाज ने भी निकाल दिया
दरअसल, खीर्सापाली के रहने वाले पुनऊ टीबी से पीड़ित थे। 15 दिन पहले उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी कोविड-19 रिपोर्ट भी निगेटिव थी। पुनऊ ने दूसरी जाति में विवाह की थी। इसके चलते उसे समाज से निकाल दिया गया था। ऐसे में बीमारी के समय कोई हालचाल पूछने भी नहीं पहुंचा। यहां तक कि पुनऊ के अपने परिजन भी न उसे देखने पहुंचे और न ही अंत्येष्ठी में शामिल हुए।

कोई संतान नहीं होने के कारण मायके से भतीजा पहुंचा, उसकी गुहार भी अनसुनी कर दी
पुनऊ की कोई संतोन नहीं है। मौत के बाद उसकी पत्नी क्षीर बरिहा ने सबसे मदद मांगी, लेकिन कोई नहीं आया। इस दौरान करीब 5 घंटे तक शव घर में पड़ा रहा। फिर उसने अपने मायके में सूचना दी तो भतीजा रामेश्वर बरिहा खीर्सापाली पहुंचा। उसने भी ग्रामीणों से कंधा देने का अनुरोध किया, पर कोई आगे नहीं आया। इसके बाद रामेश्वर ने खुद ही शव को पीठ पर लादा और मुक्तिधाम पहुंचा। वहां गढ्डा खोदकर शव को दफनाया।

रिपोर्ट : चित्रांश त्रिपाठी

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