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मुंह चिढ़ा रहा पड़ोसी का विकास:ओडिशा 120 लोगों के लिए बना रहा साढ़े चार करोड़ का पुल; बॉर्डर से लगते CG के 1000 आबादी के गांव में न बिजली, न रास्ते

गरियाबंद23 दिन पहले
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ग्रामीण कहते हैं कि पड़ोसी राज्य के सीमा पर मौजूद गांव के विकास को देख कर खुद को ठगा महसूस करते हैं। ओडिशा सरकार जब 100 लोगों के लिए सुविधा दे सकती है, तो हम तो 1000 हैं। - Dainik Bhaskar
ग्रामीण कहते हैं कि पड़ोसी राज्य के सीमा पर मौजूद गांव के विकास को देख कर खुद को ठगा महसूस करते हैं। ओडिशा सरकार जब 100 लोगों के लिए सुविधा दे सकती है, तो हम तो 1000 हैं।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के एक हजार की आबादी वाले कोदोमाली गांव में न बिजली है, न पानी की व्यवस्था। लोगों को हाईवे तक पहुंचने के लिए पगडंडी का सहारा लेना पड़ता है। वहीं, बॉर्डर से लगता ओडिशा का 120 की आबादी वाला खड़ूआगा गांव है। इनकी राह आसान करने ओडिशा सरकार साढ़े चार करोड़ रुपए की लागत से पुल बना रही है। पड़ोसी का विकास देख कोदोमाली गांव के लोग खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। अब कह रहे हैं कि इससे अच्छा तो हमें ओडिशा में ही शामिल कर देते।

आदिवासी बाहुल्य कोदोमाली गांव में मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। गांव में 600 वोटर हैं। यहां तक पहुंचने के लिए नेशनल हाईवे से लगे बम्हनीझोला से होकर प्रवेश करना पड़ता है। इसके लिए करीब 12 किमी का कच्चे रास्तों का सफर तय होता है। ऐसे में अगर बारिश हो जाए तो पगडंडी ही सहारा है। गांव में बिजली के नाम पर सोलर पैनल हैं, लेकिन वो भी लंबे समय से खराब पड़े हैं। पानी के लिए गांव में 4 हैंडपंप हैं। इनमें एक बंद है, एक से गंदा और दो से मुश्किल से पानी निकलता है।

ओडिशा का 120 आबादी वाला खड़ूआगा गांव है। इनकी राह आसान करने ओडिशा सरकार साढ़े चार करोड़ रुपए की लागत से पुल बना रही है।
ओडिशा का 120 आबादी वाला खड़ूआगा गांव है। इनकी राह आसान करने ओडिशा सरकार साढ़े चार करोड़ रुपए की लागत से पुल बना रही है।

350 रुपए की पेंशन के लिए जलाना पड़ता है 240 रुपए का पेट्रोल

गांव के सबसे बुजुर्ग सुलोचन ने साल भर से वृद्धावस्था पेंशन नहीं ली है। कहते हैं कि पेंशन लेने के लिए 55 किमी दूर जनपद मुख्यालय के मैनपुर बैंक जाने के लिए कोई साधन नहीं है। पहले पंचायत निकाल कर दे देती थी, लेकिन जब से बैंक में जमा होने लगा, निकाल ही नहीं पाए। सुलोचन की तरह ही गांव में 29 और लोग हैं, जिन्हें पेंशन मिलती है। ग्राम पटेल तिलक राम मरकाम बताते हैं कि पेंशन योजना में 350 रुपए मिलते हैं। गांव में पेट्रोल 120 रुपए लीटर मिलता है। ऐसे में 240 रुपए खर्च करना पड़ता है।

कांग्रेसी नेता संजय नेताम पहुंचे तो भड़के ग्रामीणों ने आप बीती बताई, साथ ही खूब खरी-खोटी भी सुनाई।
कांग्रेसी नेता संजय नेताम पहुंचे तो भड़के ग्रामीणों ने आप बीती बताई, साथ ही खूब खरी-खोटी भी सुनाई।

मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता, तो बैंक मित्र भी नहीं आते

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में कोई भी मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता है, इसलिए न तो पंचायत में इंटरनेट की व्यवस्था है और ना ही कोई बैंक मित्र भुगतान करने आ पाता है। ग्रामीण कहते हैं कि पड़ोसी राज्य के सीमा पर मौजूद गांव के विकास को देख कर खुद को ठगा महसूस करते हैं। ओडिशा सरकार जब 100 लोगों के लिए सुविधा दे सकती है, तो हम तो 1000 हैं। ग्रामीण कहते हैं कि 21वीं सदी में रहने के बावजूद हम आदिम युग में जी रहे हैं। जहां कोई सुविधा नहीं है।

पानी के लिए गांव में 4 हैंडपंप हैं। इनमें एक बंद है, एक से गंदा और दो से मुश्किल से पानी निकलता है।
पानी के लिए गांव में 4 हैंडपंप हैं। इनमें एक बंद है, एक से गंदा और दो से मुश्किल से पानी निकलता है।

सेंचुरी के बफर जोन के 30 गांवों ने सुविधाओं के लिए किया कई बार प्रदर्शन

उदंती सीता नदी अभ्यारण्य के बफर जोन में मैनपुर ब्लॉक के 30 से भी ज्यादा गांव आते हैं। रिजर्व फारेस्ट होने के कारण यहां विकास कार्य बाधित है। नागेश के अर्जुन नायक, मोतिपानी के दलसु राम मरकाम, गोना सरपंच सुनील मरकाम, कोयबा के जनपद सदस्य दीपक मंडावी कहते हैं कि सीमा से लगे ओडिशा के गांवों के विकास को देख खुद को कोसते हैं। मूलभूत सुविधा की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन किया, सरकार के सामने मांगें रखी जाती हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

उदंती सीता नदी अभ्यारण्य के बफर जोन में मैनपुर ब्लॉक के 30 से भी ज्यादा गांव आते हैं। रिजर्व फारेस्ट होने के कारण यहां विकास कार्य बाधित है।
उदंती सीता नदी अभ्यारण्य के बफर जोन में मैनपुर ब्लॉक के 30 से भी ज्यादा गांव आते हैं। रिजर्व फारेस्ट होने के कारण यहां विकास कार्य बाधित है।

अफसर बोले- ग्रामीण खुद विकास कार्य के इच्छुक नहीं

उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के उपसंचालक आयुष जैन बताते हैं कि बफर में जोन में मौजूद गांवों के विकास कार्य के लिए प्रपोजल तैयार कर वाइल्ड लाइफ बोर्ड से अनुमति लेनी होती है। साल 2010 के बाद जंगल के भीतर बदले हालात (नक्सली मूवमेंट बढ़ने) से कार्य कराने ग्रामीण खुद इच्छुक नहीं हैं। आयुष कहते हैं कि विस्थापन इसका विकल्प है। ग्राम सभा मे प्रस्ताव पारित कर जिला स्तरीय समिति को देना होगा। फिलहाल कोर जोन में मौजूद गांव जुगाड़ के ग्रामीण इसके लिए तैयार हुए हैं, प्रक्रिया जारी है।

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