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टीके का टोटा...:18+ के लिए वैक्सीन ही नहीं, 5 लाख को टीका लगा, 35 लाख हैं कतार में

छत्तीसगढ़24 दिन पहले
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  • 20 जिलों का हाल; 84 लाख लोगों को लगनी है वैक्सीन, अभी लक्ष्य से 17 गुना पीछे

छत्तीसगढ़ में बुजुर्गों और 45+ आयु वर्ग का टीकाकरण तो पटरी पर चल रहा है। लेकिन युवा वर्ग के टीकाकरण शुरुआत से ही टोटे के बीच चल रहा है। कोरोना को हराने के लिए पूरे प्रदेश में 16 जनवरी से 65 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों के वैक्सीनेशन की शुरुआत हुई। 1 अप्रैल से 45 प्लस और 1 मई से 18 प्लस वालों का टीकाकरण शुरू हाेना था, लेकिन टीका नहीं आने से 18 प्लस वालों का टीकाकरण एक सप्ताह देर से 8 मई को शुरू हो पाया।

इस बीच टीकाकरण कई चरणों में अटका रहा। कोरोना टीका के क्लिनिकल ट्रायल को लेकर केंद्र से तनातनी तो कभी टीके की किल्लत। राज्य ने भारत बायोटेक व सीरम इंस्टीट्यूट को टीके का ऑर्डर तो किया लेकिन सप्लाई उस हिसाब से नहीं हो पाई। राज्य सरकार का केंद्र पर आरोप है कि टीकाकरण को दो भागों में बांटकर गलती की गई है। वहीं भाजपा कह रही कि राज्य ने टीका खरीदने में ही देर कर दी। नतीजा यह निकला कि किसी जिले में 18 मई तो कहीं पिछले एक सप्ताह से 18 प्लस वालों के टीकाकरण केंद्रों में ताला लटक गया है। इसकी शुरुआत कब होगी, यह अफसर भी नहीं बता पा रहे। जबकि 45 प्लस वालों के लिए टीके का भरपूर स्टॉक है।

टीके की दरकार...नहीं लगवा पा रही सरकार
18+ आयु वर्ग में राज्य में करीब 1.30 करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य है, लोग भी आ रहे लेकिन वैक्सीन ही उपलब्ध नहीं हो पा रही।

45+ में चौथे...नहीं जान सकते 18+ की रैंकिंग
45+ के वैक्सीनेशन में छत्तीसगढ़ का देश में चौथा स्थान है, लेकिन 18+ की रैंकिंग केंद्र के पास पंजीकृत नहीं हो रही इसलिए इसका हिसाब नहीं है।

45+ वाले आ नहीं रहे, 18+ को टीका नहीं
45+ से अधिक के 45 लाख 04 हजार 503 का वैक्सीनेशन हो चुका है जबकि 18+ वर्ग में 7 लाख 75 हजार 199 लोगों का टीकाकरण हुआ

सीधी बात; टीएस सिंहदेव, स्वास्थ्य मंत्री

वैक्सीनेशन भी नोटबंदी जैसा हो गया है, केंद्र की तैयारी नहीं रहती वो घोषणा कर देते हैं

18+ आयु वर्ग का टीकाकरण आखिर इतने दिनों से क्यों बंद है?
-वैक्सीनेशन की हालत वैसी ही है, जैसे देश में नोटबंदी कर दी गई थी। 2 जनवरी को वैक्सीनेशन की घोषणा हुई थी। देश की आबादी के 60% यानी 80 करोड़ लोगों के लिए 160 करोड़ डोज चाहिए लेकिन तब करीब 7 करोड़ डोज हर महीने बन रही थी। अभी साढ़े 8 करोड़ डोज महीने में बन रही है। केंद्र सरकार की कोई तैयारी ही नहीं थी।

केंद्र से समन्वय में कैसी दिक्कत है?
- देखिए मैं किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहता। दलगत भावना से ऊपर कहना चाहता हूं कि जब वैक्सीन ही नहीं है तो केंद्र क्या करेगा? सेंट्रल की प्लानिंग ठीक नहीं है, इसलिए ऐसी दिक्कत आ रही है।

क्या राज्य सरकार ने टीके के लिए समय पर ऑर्डर कर दिया था?
- देखिए यह भाजपा का रटा-रटाया आरोप है। राज्य ने समय से पहले सवा करोड़ डोज का ऑर्डर किया था। इसमें कोवैक्सीन की 50 लाख, कोविशिल्ड की 75 लाख डोज है। लेकिन वैक्सीन नहीं मिली।

आपके हिसाब से यह संकट कैसे कम हो सकता है?
-देखिए अभी जितनी वैक्सीन तैयार हो रही है उसमें 50% केंद्र ले रहा है जबकि 25 प्रतिशत राज्य को और 25 प्रतिशत निजी क्षेत्रों को मिल रहे है। मेरे हिसाब से केंद्र को 25 प्रतिशत वैक्सीन ही लेनी चाहिए। जबकि राज्य को 50 प्रतिशत वैक्सीन मिलनी चाहिए।

ऑर्डर करने में देरी राज्य सरकार ने की, किल्लत उसी का नतीजा

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि भारत सरकार वैक्सीन की सप्लाई जरूर कर रही लेकिन राज्य सरकार ने ऑर्डर करने में देरी की। बाकी राज्यों में फटाफट ऑर्डर करके रकम जमा करा दी। यहां कांग्रेस की सरकार ने बातचीत में समय खराब किया। उन्हें पता था 18 से 45 वाले वैक्सीन इनको लेना है। इसके बावजूद ऐसा नहीं किया गया। जबकि केंद्र के कोटे से 70 फीसदी वैक्सीन लग चुकी है। जब एडवांस में पेमेंट करना है, राज्य सरकार को पता था। उस समय सीएम और स्वास्थ्य मंत्री बेवजह राजनीति करते रहे कि वैक्सीन ठीक नहीं है। जब देर हो गई तो केंद्र को दोष दे रहे हैं।

हे सरकार! नहीं मांग रहे नौकरी या भत्ता जान बचाने की उम्मीद तो दिला दीजिए

भास्कर हस्तक्षेप; परीक्षित त्रिपाठी, स्टेट सैटेलाइट एडिटर

छत्तीसगढ़ का युवा कतार में है। अबकी ये कतार रोजगार, या भत्ता मांगने की नहीं है। यह है भरोसे और उम्मीद की कतार। भरोसा जो युवाओं ने अपने नीति-निर्धारकों पर उम्मीद के साथ किया था। उसे तब शायद उम्मीद नहीं थी कि जब सदी की सबसे बड़ी महामारी से बचाने का मौका आएगा, तब भी उसे देखना होगा कि उसने वोट किसे दिया था। उसे उम्मीद नहीं थी कि टीके के लिए भी अखंड भारत में विभाजन की रेखा खिंचेगी। राज्य के अधिकांश हिस्से में 18 मई से 18+ का टीकाकरण बंद है। शुरू कब होगा, ये कोई नहीं बता पा रहा है।

दुनिया के 100 से अधिक देशों में जब टीकाकरण के रूप में विश्व का सबसे बड़ा राहत कार्य शुरू हुआ तो सभी की नजरें भारत की ओर थीं। वजह थी देश में टीके की व्यापक उत्पादन क्षमता। जीर्ण-शीर्ण इलाज की व्यवस्था, निजी अस्पतालों की नोच-खसोट के घाव की हमारी टीस यह सोचकर कुछ कम हुई कि हमें टीका जल्द लगेगा। इतनी बड़ी आबादी का वैक्सीनेशन आसान नहीं होगा, ये तो हम सबको अंदाज था। लेकिन ऐसी लाचारी होगी, ये उम्मीद भी ना थी। 28 मई तक चीन (59 करोड़), अमेरिका (29 करोड़ से ज्यादा) के बाद भारत में सर्वाधिक 20 करोड़ 12 लाख से अधिक लोगों को टीके की पहली या दोनों डोज लग चुकी है। लेकिन छत्तीसगढ़ का युवा यह आंकड़े देखकर खुश नहीं है। क्योंकि वह दो सप्ताह से पंजीयन का नंबर लेकर आतुर बैठा है, मगर लाचार भी है।

आम आदमी से जब आप बात करेंगे तो उसे ग्लोबल टेंडर, वैक्सीन डिप्लोमेसी, अमेरिकन डोमिनेंस, कोवैक्स, ग्लोबल वैक्सीन अलायंस (गावी) जैसे भारी-भरकम शब्दों से मतलब नहीं रहता है। उसे सिर्फ ये पता है कि सरकार ने वादा करके टीका नहीं लगवाया। और वो दोष उसे ही देगा जो जवाबदार सामने पड़ेगा। हर व्यक्ति कतार में लगे-लगे थक चुका है। अस्पताल की कतार, दवा की कतार, श्मशान की कतार और अब जान बचाने की कतार। उसकी बस एक गुहार है कि साहब! सिर्फ कुछ वक्त के लिए वोट बैंक सिस्टम, पार्टी सिस्टम, कोटा सिस्टम काे भूलकर सिर्फ सिस्टम से काम कर लें...और जान बचाने की उम्मीद दिला दीजिए।

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