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पैसों की बर्बादी:आरडीए, नगर निगम, स्मार्ट सिटी ने 20 करोड़ की सिर्फ सलाह ली, काम कुछ नहीं

रायपुर2 महीने पहले
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रायपुर स्मार्ट सिटी (फाइल फोटो)। - Dainik Bhaskar
रायपुर स्मार्ट सिटी (फाइल फोटो)।
  • पिछली सरकार में कई प्रोजेक्ट की प्लानिंग के लिए नियुक्त किए कंसल्टेंट, सर्वे रिपोर्ट भी ली पर किसी प्रोजेक्ट में काम नहीं हुआ

ठाकुरराम यादव/असगर खान | राजधानी को बेहतर बनाने के लिए निर्माण से जुड़ी अधिकांश एजेंसियों ने अलग-अलग प्लान बनाए। ये प्रोजेक्ट किस तरह बनेंगे और कितने उपयोगी होंगे, इसके सर्वे और डिटैल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) बनाने के लिए सरकारी एजेंसियों ने देश की कई जानी-मानी कंसल्टेंट कंपनियों को नियुक्त किया और उन्हें प्रोजेक्ट की सलाह देने के लिए 50 लाख रुपए से लेकर 5 करोड़ रुपए तक की कंसल्टेंट फीस भी अदा की। लेकिन इनमें से कई प्रोजेक्ट अब तक शुरू नहीं हो पाए। कुछ प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिन्हें डीपीआर के मुताबिक शुरू तो किया गया, लेकिन ऐसी दिक्कतें आ गईं जिन्हें कंसल्टेंट की रिपोर्ट में नजरअंदाज किया गया और इनकी वजह से प्रोजेक्ट ही रोकना पड़ गया। अर्थात ऐसे काम, जिनके लिए सब मिलाकर चार-पांच साल में 20 करोड़ रुपए बतौर कंसल्टेंसी भुगतान किए गए, वह अब तक चालू ही नहीं हो सके हैं।

ऐसे किए विभाग ने खर्च

विभागप्रोजेक्टफीस
आरडीएगंज मंडी प्रोजेक्ट50 लाख
आरडीएखारुन रिवर फ्रंट12 लाख
स्मार्ट सिटी लि.स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट12 करोड़
नगर निगमजीआईएस सर्वे6 करोड़
नगर निगमभैंसथान प्रोेजेक्ट50 लाख

राजधानी में पिछले कुछ साल से हर प्रोजेक्ट में कंसल्टेंट कंपनियां नियुक्त करने का ट्रेंड है, जो केवल यही सलाह देने के लिए नियुक्त की जाती हैं कि जरूरत है या नहीं, काम होगा या नहीं, और होगा तो किस तरह। उनसे सर्वे कराया जाता है और करोड़ों रुपए का पेमेंट भी किया गया है। लेकिन ऐसे कई प्रोजेक्ट रुक गए हैं और लगभग रद्द होने की स्थिति में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बाहरी कंसलटेंट कंपनियों को बुलाना गलत नहीं है। उनकी जानकारी, योग्यता और अनुभव का फायदा लेना चाहिए, लेकिन सरकारी एजेंसियों को कम से कम किसी प्रोजेक्ट की ग्राउंड रियलिटी अपने विभाग के अधिकारियों से चेक करवानी चाहिए। प्रारंभिक सर्वे सरकारी एजेंसियों के इंजीनियर ही करें। फौरी तौर पर सारी चीजें सही मिलने के बाद जब प्रोजेक्ट शुरू होना पुख्ता हो जाए तब बाहरी कंपनियों से सर्वे व डीपीआर तैयार करवाना चाहिए। इससे प्रोजेक्ट के फेल होने का खतरा कम रहेगा। प्रोजेक्ट फेल होने की आशंका हो तो प्रारंभिक सर्वे में ही यह बात सामने आ जाएगी। इससे सरकार के लाखों-करोड़ों रुपए बच जाएंगे। रायपुर नगर निगम, स्मार्ट सिटी, रायपुर विकास प्राधिकरण सहित कई ऐसी सरकारी एजेंसियों हैं, जिनके खुद के अधिकारी इंजीनियरिंग में डिग्री और डिप्लोमाधारी होते हैं। इन एजेंसियों में मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की भर्ती की जाती है। सरकारी डिग्रीधारी इंजीनियर विभागों में बाबू का काम कर रहे हैं। जो काम विभाग के लिए उन्हें करना चाहिए, वह प्राइवेट कंसलटेंट कंपनियों से करवाया जाता है।

स्मार्ट सिटी ने ली 50 करोड़ की सलाह
रायपुर स्मार्ट सिटी ने पिछले चार साल में नियुक्त दो कंसलटेंसी कंपनियों को करीब 50 करोड़ से ज्यादा भुगतान किया है। नियुक्त दोनों कंपनियों टाटा कंसल्टेंसी और पीडबल्यूसी के स्टाफ को 12 करोड़ रुपए से ज्यादा सैलरी बांट दी गई। जो प्रोजेक्ट पूरे हो गए या शुरू हुए हैं, उनकी कंसल्टेंसी फीस के रूप में 40 करोड़ रुपए से अधिक दिया जा चुका है। स्मार्ट सिटी की इन कंसलटेंट कंपनियों ने कई ऐसे प्रोजेक्ट बनाए, उनका सर्वे किया और रिपोर्ट तैयार किए जो आज तक शुरू नहीं हो सके। इनमें रुफ टॉप सोलर पैन, स्मार्ट पार्किंग, दर्जनों बस्तियों में नाले-नालियों के बदबूदार पानी से जलभराव से रोकने के लिए स्मार्ट ड्रैन, एबीडी एरिया की 9 सड़कों को स्मार्ट रोड के रूप में डेवलप करने इत्यादि हैं।

कई सड़कों पर सर्वे में पैसे फूंके लेकिन एक का काम शुरू नहीं
लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी) ने रायपुर सहित राज्य के कई जिलों में सड़क और पुलों के लिए कंसलटेंट कंपनियां हायर कर उनसे सर्वे कराया। कंपनियों की ओर से सर्वे रिपोर्ट सौंपने के बाद कई तकनीकी दिक्कतों की वजह से प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हो रहा। रायपुर से राजनांदगांव तक मेंट्रो रेल के 6000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट पर भी पीडब्ल्यूडी ने काम शुरू कर दिया लेकिन लागत ज्यादा और कम पैसेंजर मिलने की वजह से प्रोजेक्ट पर काम ही शुरू नहीं हो सका। इसके बाद सरकार ने मोनो रेल की भी प्लानिंग की लेकिन यह प्रोजेक्ट भी जमीन पर नहीं उतर पाया।

जीआईएस सर्वे 6 करोड़ का पूरी रिपोर्ट अलमारियों में बंद
रायपुर में प्रापर्टी टैक्स को फिर से निर्धारित करने के लिए 2011-12 में राज्य सरकार ने रायपुर शहर में जीआईएस सर्वे कराया था। इस सर्वे के आधार पर लोगों का प्रापर्टी टैक्स तय होता, क्योंकि उस समय निगम जो प्रापर्टी टैक्स ले रहा था वह काफी सालों पहले के हिसाब से था। दिल्ली की एक कंपनी जीआईएस को राज्य सरकार ने छह करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया था। इस सर्वे रिपोर्ट के आधार पर जब लोगों से टैक्स वसूलना शुरू किया गया तो कई तरह की खामियां सामने आईं। दरअसल, कंपनी ने दफ्तर में बैठे-बैठे गूगल मैप से सारे मकानों का सर्वे कर दिया जो, भौतिक स्थिति से अलग था। तात्कालिक निगम कमिश्नर सर्वे रिपोर्ट को खारिज कर दिया। उस आधार पर आज तक टैक्स की वसूली नहीं हुई।

इंजीनियरों की क्षमता का पूरा उपयोग किया जाएगा
"स्मार्ट सिटी अब नियंत्रण से बाहर नहीं है। फिजूल के खर्चों पर नियंत्रण रहेगा। योजनाओं में निगम के इंजीनियरों की क्षमता का पूरा उपयोग किया जाएगा। उन्हें फील्ड पर मूल काम करना ही पड़ेगा।"
-एजाज ढेबर, महापौर रायपुर

अब आरडीए के पैसे का सही उपयोग हो रहा है
"पूर्व में जो भी हुआ, उसके बारे में कुछ नहीं कह सकते। लेकिन अब आरडीए के एक-एक पैसे का सही उपयोग हो रहा है और किसी भी ऐसे काम पर खर्च नहीं होगा, जिसके पूरा होने पर संदेह हो।"
-सुभाष धुप्पड़, चेयरमैन आरडीए

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