मिस्ड कॉल वाले गुरुजी:सूरजपुर के इस स्कूल कैंपस में मवेशी बांधे जाते थे, नशेड़ियों का अड्डा था, गौतम की जिद ने बनाया स्मार्ट स्कूल; यहां बच्चे अब चलाते हैं मिनी बैंक

रायपुर/सूरजपुरएक महीने पहलेलेखक: सुमन पांडेय
शिक्षक गौतम शर्मा खुद बच्चों के बीच बैठकर उन्हें पढ़ाते हैं।

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में एक अनोखा स्कूल चलता है। जिला मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर स्थित है शासकीय प्राथमिक शाला झारपारा (पम्पापुर)। कभी जिस कैंपस में गांव वाले मवेशी बांधा करते थे, जो नशेड़ियों का अड्‌डा हुआ करता था, जहां गांव की महिलाएं आकर नहाती थीं, जो स्कूल के नाम पर वीरान खंडहर था, उसे बदल दिया गया है।

ये था क्लास रूम का हाल।
ये था क्लास रूम का हाल।

अपनी जिद के दम पर सहायक शिक्षक गौतम शर्मा ने इस स्कूल को इस कदर बदला कि अब जिला प्रशासन ने इनके कंधों पर 10 और सरकारी स्कूलों का इसी थीम पर कायाकल्प करने का जिम्मा सौंप दिया। ये पहला ऐसा सरकारी स्मार्ट स्कूल है, जहां बच्चे अपना बैंक चलाते हैं। कक्षा 1 से 5वीं के बच्चों में छोटी उम्र से ही बचत की समझ पैदा करने का काम भी ये स्कूल कर रहा है। पूरा गांव गौतम को मिस कॉल गुरुजी के नाम से जानता है, इसके पीछे भी कहानी दिलचस्प है।

बाहर से ऐसा दिखता था स्कूल।
बाहर से ऐसा दिखता था स्कूल।

गांधी गिरी ने बदलकर रख दिया सब कुछ
गौतम ने झारपारा का सरकारी स्कूल साल 2018 में ज्वाइन किया। बच्चे जहां बैठते थे उस क्लासरूम की फर्श पर गोबर पड़ा रहता था, मवेशियों के खुरों से जमीन उखड़ चुकी थी। स्कूल की काली पड़ चुकी दीवारें भी अव्यवस्था की कहानी कह रही थीं। सभी क्लासेस में मिलाकर कुल 22 बच्चे ही बचे थे। दूसरे स्कूलों में बच्चे एडमिशन ले रहे थे। पालकों को भी लगता था कि कभी-भी ये स्कूल बंद हो जाएगा। इसके बाद गौतम ने गांव के लोगों को, कैंपस में आकर नशा करने वाले युवकों को समझाना शुरू किया। गौतम को गांव के शरारती तत्वों ने धमकाते हुए कहा कि इससे पहले भी कई टीचर आकर जा चुके हैं, आप भी अपना काम करें और चलते बनें।

अब ऐसा दिखता है स्कूल।
अब ऐसा दिखता है स्कूल।

फिल्म मुन्ना भाई MBBS के एक सीन में दरवाजे पर पानी थूकने का विरोध एक युवक उसे हर रोज थूकने वाले के सामने ही धोकर करता है। ठीक वैसे ही अकेले ही गौतम जुट गए स्कूल की सफाई करने में। वो गांव वालों के सामने ही कुदाल लेकर स्कूल कैंपस संवारने का काम करते रहते थे। कुछ ही दिनों में गांव वालों को भी अक्ल आई। लोगों ने उनका सहयोग किया। बड़े अफसरों ने भी गौतम के हौसले को सराहा, स्कूल को टीवी स्क्रीन, माइक, ब्लैक बोर्ड दिए गए। रेनोवेशन में मदद दी गई। गौतम बताते हैं कि अब स्कूल में 80 बच्चे हैं। दूसरे गांव के बच्चे भी यहां एडमिशन ले रहे हैं। यह पहला सरकारी स्कूल है जहां हमने नवयुवक शालादूत समिति बनाई। इस समिति में वही युवक शामिल हैं जो कभी कैंपस में बैठकर नशाखोरी करते थे। अब वो स्कूल की भलाई के लिए गौतम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं।

बदल गया क्लास का लुक।
बदल गया क्लास का लुक।
मिस कॉल आने पर छात्रों को पढ़ाते गौतम।
मिस कॉल आने पर छात्रों को पढ़ाते गौतम।

इस वजह से ग्रामीण इन्हें कहते हैं मिस कॉल गुरुजी
प्रदेश में कोविड के दौर में जब स्कूल बंद हो गए, तो ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प बचा। इसके तहत पढ़ाई शुरू भी हुई। गौतम बताते हैं कि झारपारा के जिस गांव में सरकारी स्कूल हैं वहां बेहद गरीब तबके के बच्चे पढ़ते हैं। किसी के पास एंड्रॉयड फोन नहीं था। इंटरनेट की सुविधा नहीं थी कि वो पढ़ाई कर सकें। यहां तक की कीपैड वाला जो फोन हुआ करता था बहुतों के परिजन तो फोन में टॉकिंग बैलेंस तक मेंटेन नहीं कर पा रहे थे।

क्लास में कई तरह के गेम भी होते हैं।
क्लास में कई तरह के गेम भी होते हैं।

गौतम ने बताया कि तब मैंने सोचा कि क्यों न मिस कॉल के जरिए फोन पर बच्चों को गाइड किया जाए। हमने इसके लिए टाइम शेड्यूल तैयार किया। घर-घर जाकर हमनें इसकी जानकारी दी। बच्चों को रूटीन वर्क सौंपा करते थे। इसके बाद उन्हें कहा गया था कि स्टडी के दौरान जो भी कंफ्यूजन हो वो हमारे नंबर्स पर मिस कॉल करें। हमारे पास जैसे ही बच्चों के मिस कॉल आते थे। हम बच्चों से बात करके उनकी पढ़ाई पूरी करवाते रहे। इसी तरह से पूरे कोविड काल में बिना रुके बच्चों की पढ़ाई पूरी करवाई।

गांव का मंदिर बच्चों को कुछ सिखाता है।
गांव का मंदिर बच्चों को कुछ सिखाता है।

बच्चे पढ़ाई से जुड़े रहें, और उनका ध्यान न भटके हमने उनके मुहल्लों और घरों को ही स्कूल में तब्दील करने का काम किया। बच्चों को उनके घरों पर ही अल्फाबेट के पोस्टर, पहाड़ा के स्टीकर वगैरह लगाकर दिए। ताकि खाली वक्त में वो उनकी नजरों के सामने रहें और बच्चों का माइंड घर पर भी पढ़ाई को लेकर एक्टिव रहे। एक मंदिर की दीवार पर हमने गिनती, वाक्य बनाना, पर्यायवाची शब्द लिखकर पेंटिंग करवा दी। गांव में लगने वाले मोहल्ला क्लास के वक्त बच्चे यहां जुटते थे और कुछ नया सीखते थे।

बच्चों का बैंक।
बच्चों का बैंक।

स्कूल में बच्चे चलाते हैं अपना बैंक
जिस आर्थिक माहौल में गांव के लोग रहते हैं वहां अगर स्कूल में अचानक बच्चे के लिए किसी कॉपी, पेन, पेंसिल जैसी चीजों की जरुरत पड़ जाए तो रुपए नहीं होते थे। रोज मजदूरी कर परिवार का पेट पालने की इस स्थिति में बच्चों को भी तकलीफ झेलनी पड़ती है। इससे निपटने सहायक शिक्षक गौतम ने बच्चों को बचत के लिए प्रेरित किया। हर दिन पॉकेटमनी के रूप में मिलने वाले 5 से 10 रुपयों को बचाना सिखाना शुरू किया। इसके लिए स्कूल में एक मिनी बैंक शुरू हुआ। कक्षा 4 और 5वीं के बच्चों को हिसाब किताब सिखाया गया। छोटी-छोटी पासबुक तैयार की गई। इस बच्चे का इसपर नाम और पैसे जमा करने की एंट्री होती है। स्कूल में इस तरह से बच्चों ने अपने बैंक में 11 हजार रुपए जमा किए हैं। इस पैसे का इस्तेमाल बच्चे अपने स्टेशनरी, और पढ़ाई से जुड़ी चीजों में करते हैं।

जब टीचर के साथ मिलकर बच्चों ने चोर को पकड़ा
2020 के फरवरी महीने में स्कूल में लगी टीवी, माइक, साउंड सिस्टम, कैरम बोर्ड, बच्चों की दरी वगैरह चोरी हो गई। इस घटना से स्कूल के बच्चे भी उदास थे और गौतम भी। एक पल के लिए लगा कि इतनी मेहनत से जिस कैंपस को संवारा कोई इसे बर्बाद करने पर ही तुला है। पुलिस में कंप्लेन की गई। दो दिनों बाद स्कूल के बच्चों और शाला दूत समिति के गांव के युवकों के साथ गौतम ने बात-चीत की। गांव के बच्चों ने इसके बाद चोर की तलाश शुरू की।

चोरी का सामान बच्चों ने किया बरामद।
चोरी का सामान बच्चों ने किया बरामद।

कुछ बच्चों ने गौतम को आकर बताया कि स्कूल से कुछ दूर एक खेत में गेहूं की फसल दबी हुई, जैसे कोई उस पर चलकर गया हो। सभी भागकर वहां खेत में पहुंच गए जहां टीवी के बॉक्स वगैरह मिले तो पुलिस को बताया गया। इसके बाद जिसका खेत था उसके घर बच्चों के साथ पुलिस पहुंची तो कमरे से स्कूल का सारा सामान मिला। गांव के दूसरे लोगाों के यहां भी हुई चोरी का सामान जमीन में गड़ा मिला। जिसका घर था उसे पुलिस अपने साथ ले गई। उस दिन बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं था। सभी को गौतम ने गले लगा लिया था।

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